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अंग 857

अंग
857
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसनु पवन दूरि करि बवरे ॥
छोडि कपटु नित हरि भजु बवरे ॥1॥ रहाउ ॥
जिह तू जाचहि सो त्रिभवन भोगी ॥
कहि कबीर केसौ जगि जोगी ॥2॥8॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे बावरे जोगी ! योगाभ्यास व प्राणायाम को छोड़ दे। इस पाखण्ड को छोड़। और सदा प्रभू की बँदगी कर। 1। रहाउ। (योग-अभ्यास व प्राणायाम के नाटक-चेटक दिखा के) जो माया आप माँगता फिरता है। उसको सारे जगत के जीव भोग रहे हैं। कबीर कहता है- हे जोगी ! जगत में माँगने के लायक एक प्रभू का नाम ही है। 2। 8।
बिलावलु ॥
इनि॑ माइआ जगदीस गुसाई तुम॑रे चरन बिसारे ॥
किंचत प्रीति न उपजै जन कउ जन कहा करहि बेचारे ॥1॥ रहाउ ॥
ध्रिगु तनु ध्रिगु धनु ध्रिगु इह माइआ ध्रिगु ध्रिगु मति बुधि फंनी ॥
इस माइआ कउ द्रिड़ु करि राखहु बांधे आप बचंनी ॥1॥
किआ खेती किआ लेवा देई परपंच झूठु गुमाना ॥
कहि कबीर ते अंति बिगूते आइआ कालु निदाना ॥2॥9॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु ॥ हे जगत के मालिक ! हे जगत के पति ! (आपकी पैदा की हुई) इस माया ने (हम जीवों के दिलों में से) आपके चरणों की याद भुला दी है। जीव भी बेचारे क्या करें। (इस माया के कारण) जीवों के अंदर (आपके चरणों का) रक्ती भर भी प्यार पैदा नहीं होता है। 1। रहाउ। लाहनत है इस शरीर और धन-पदार्थों को; धिक्कारयोग्य है (मनुष्य की यह) बुद्धि। जो (जो धन-पदार्थों की खातिर) औरों को धोखा देती है। हे जगदीश ! आपके हकम के मुताबिक ही ये माया जीवों को अपने मोह में बाँध रही है। सो। आप खुद ही इसको अच्छी तरह अपने काबू में रख। 1। कबीर कहता है- क्या खेती क्या व्यापार। जगत के इस पसारे का गुमान झूठा है। क्योंकि आखिर में जब मौत आती है तब (इस पसारे के मोह-मान में फसे हुए) जीव आखिर में सिसकियां भरते हैं। 2। 9।
बिलावलु ॥
सरीर सरोवर भीतरे आछै कमल अनूप ॥
परम जोति पुरखोतमो जा कै रेख न रूप ॥1॥
रे मन हरि भजु भ्रमु तजहु जगजीवन राम ॥1॥ रहाउ ॥
आवत कछू न दीसई नह दीसै जात ॥
जह उपजै बिनसै तही जैसे पुरिवन पात ॥2॥
मिथिआ करि माइआ तजी सुख सहज बीचारि ॥
कहि कबीर सेवा करहु मन मंझि मुरारि ॥3॥10॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु ॥ हे मन ! उस प्रभू की बरकति से हृदय-रूपी कमल फूल सुंदर खिला रहता है। जिस उक्तम पुरुष प्रभू की परम जोति की रूप-रेखा बताई नहीं जा सकती। वह प्रभू इस शरीर रूपी सुंदर सर (शरीर-सरोवर) के अंदर ही है।1। हे मेरे मन ! (माया के पीछे) भटकना छोड़ दे। और उस परमात्मा का भजन कर। जो सारे जगत का आसरा है। 1। रहाउ। वह ईश्वरीय ज्योति ना कभी पैदा होती है। और ना कभी मरती दिखाई देती है। पर ये माया की खेल जल-कुमद्नी के पक्तों जैसी। उसी (प्रभू में से) पैदा होती है और उसी में लीन हो जाती है। 2। सहज अवस्था के सुख की विचार करके (भाव। ये समझ के कि माया का मोह छोड़ने से। माया में डोलने से हट के। सुख बन जाएगा) कबीर ने इस माया को नाशवंत जान के (इसका मोह) छोड़ दिया है और अब कहता है- हे मन ! अपने अंदर ही (टिक के) परमात्मा का सिमरन कर। 3। 10।
बिलावलु ॥
जनम मरन का भ्रमु गइआ गोबिद लिव लागी ॥
जीवत सुंनि समानिआ गुर साखी जागी ॥1॥ रहाउ ॥
कासी ते धुनि ऊपजै धुनि कासी जाई ॥
कासी फूटी पंडिता धुनि कहां समाई ॥1॥
त्रिकुटी संधि मै पेखिआ घट हू घट जागी ॥
ऐसी बुधि समाचरी घट माहि तिआगी ॥2॥
आपु आप ते जानिआ तेज तेजु समाना ॥
कहु कबीर अब जानिआ गोबिद मनु माना ॥3॥11॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु ॥ (मेरे अंदर) सतिगुरू जी की शिक्षा से ऐसी बुद्धि जाग उठी है कि मेरे जनम-मरण की भटकना समाप्त हो गई है। प्रभू चरणों में मेरी सुरति जुड़ गई है। और मैं जगत में विचरता हुआ ही उस हालत में टिका रहता हूँ जहाँ माया के विचार नहीं उठते। 1। रहाउ। हे पंडित ! जैसे कांसे के बर्तन को ठनकाने से उसमें से आवाज़ निकलती है। यदि (ठनकाना) छोड़ दें तो वह आवाज़ कांसे में ही समाप्त हो जाती है। वैसे ही शारीरिक मोह का हाल है। (जब से बुद्धि का प्रकाश हुआ है) मेरे शरीर से मोह समाप्त हो गया है (मेरा यह मायावी पदार्थों से ठनकाने वाला बर्तन टूट गया है)। अब पता ही नहीं कि वह तृष्णा की आवाज कहाँ जा के गुम हो गई है। 1। (सतिगुरू की शिक्षा से बुद्धि जागने पर) मैंने अंदरूनी खिझ (बौखलाहट) दूर कर ली है। अब मुझे हरेक घट में प्रभू की ज्योति जगती दिखाई दे रही है; मेरे अंदर ऐसी मति पैदा हो गई है कि मैं अंदर से विरक्त हो गया हूँ। 2। अब अंदर से मुझे अपने आप की समझ पैदा हैं गई है। मेरी ज्योति। रॅबी-ज्योति में जा मिली हे। हे कबीर ! कह-अब मैंने गोबिंद के साथ जान-पहिचान बना ली है। मेरा मन गोबिंद के साथ रम गया है। 3। 11।
बिलावलु ॥
चरन कमल जा कै रिदै बसहि सो जनु किउ डोलै देव ॥
मानौ सभ सुख नउ निधि ता कै सहजि सहजि जसु बोलै देव ॥ रहाउ ॥
तब इह मति जउ सभ महि पेखै कुटिल गांठि जब खोलै देव ॥
बारं बार माइआ ते अटकै लै नरजा मनु तोलै देव ॥1॥
जह उहु जाइ तही सुखु पावै माइआ तासु न झोलै देव ॥
कहि कबीर मेरा मनु मानिआ राम प्रीति कीओ लै देव ॥2॥12॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु ॥ हे देव ! जिस मनुष्य के हृदय में आपके सुंदर चरण बसते हैं। वह माया के हाथों में नहीं नाचता। वह अडोल अवस्था में टिका रह के आपकी सिफत सालाह करता है। उसके अंदर। मानो। सारे सुख और जगत के नौ खजाने आ जाते हैं। रहाउ। (सिमरन की बरकति से) जब मनुष्य अपने अंदर से कुटिलता (टेढ़-मेढ़) निकाल देता है। तो उसके अंदर ये मति उपजती है कि उसको हर जगह प्रभू ही दिखाई देता है। वह मनुष्य बार बार अपने मन को माया की ओर से रोकता है। और तराजू ले के तोलता रहता है (भाव। हमेशा आत्म चिंतन करके मन के अवगुणों को पड़तालता रहता है)। 1। जहाँ भी वह मनुष्य जाता है। वहीं सुख पाता है। उसे माया नहीं भरमाती। कबीर कहता है- मैंने भी अपने मन को प्रभू की प्रीति में लीन कर दिया है। अब ये मेरा मन प्रभू के साथ पतीज गया है। 2। 12।
बिलावलु बाणी भगत नामदेव जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सफल जनमु मो कउ गुर कीना ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु बाणी भगत नामदेव जी की सतिगुर प्रसादि ॥ मुझे मेरे सतिगुरू ने सफल जीवन वाला बना दिया है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे बावरे जोगी ! योगाभ्यास व प्राणायाम को छोड़ दे।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।