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- ब्रहमु बिंदहि ते ब्राहमणा जे चलहि सतिगुर भाइ ॥
- सतिगुर की सेव न कीतीआ सबदि न लगो भाउ ॥
- सभ वडिआईआ हरि नाम विचि हरि गुरमुखि धिआईऐ ॥
- सतिगुर ते खाली को नही मेरै प्रभि मेलि मिलाए ॥
- गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
- गुर सतिगुर विचि नावै की वडी वडिआई हरि करतै आपि वधाई ॥
- ध्रिगु एह आसा दूजे भाव की जो मोहि माइआ चितु लाए ॥
ब्रहमु बिंदहि ते ब्राहमणा जे चलहि सतिगुर भाइ ॥
सलोक मः 3 ॥
ब्रहमु बिंदहि ते ब्राहमणा जे चलहि सतिगुर भाइ ॥
जिन कै हिरदै हरि वसै हउमै रोगु गवाइ ॥
गुण रवहि गुण संग्रहहि जोती जोति मिलाइ ॥
इसु जुग महि विरले ब्राहमण ब्रहमु बिंदहि चितु लाइ ॥
नानक जिन॑ कउ नदरि करे हरि सचा से नामि रहे लिव लाइ ॥1॥
ब्रहमु बिंदहि ते ब्राहमणा जे चलहि सतिगुर भाइ ॥
जिन कै हिरदै हरि वसै हउमै रोगु गवाइ ॥
गुण रवहि गुण संग्रहहि जोती जोति मिलाइ ॥
इसु जुग महि विरले ब्राहमण ब्रहमु बिंदहि चितु लाइ ॥
नानक जिन॑ कउ नदरि करे हरि सचा से नामि रहे लिव लाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! वह मनुष्य हैं (असल) ब्राहमण। जो मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाले रखते हैं। सतिगुरू की रज़ा में जीवन व्यतीत करते हैं (अपने अंदर से) अहंकार (का) रोग दूर करके जिनके हृदय में सदा परमात्मा बसता है (वह ब्राहमण) परमात्मा की ज्योति में (अपनी) सुरति जोड़ के परमात्मा के गुण याद करते रहते हैं और परमात्मा के गुण (अपने अंदर) इकट्ठे करते रहते हैं। पर। हे भाई ! इस मनुष्य जीवन में (ऐसे) ब्राहमण दुर्लभ (विरले) ही होते हैं जो मन लगा के ब्रह्म के साथ गहरी सांझ डाले रखते हैं। हे नानक ! जिन (इस प्रकार के ब्राहमणों) पर सदा कायम रहने वाला परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करता है वह सदा परमात्मा के नाम में सुरति जोड़े रखता है। 1।
सतिगुर की सेव न कीतीआ सबदि न लगो भाउ ॥
मः 3 ॥
सतिगुर की सेव न कीतीआ सबदि न लगो भाउ ॥
हउमै रोगु कमावणा अति दीरघु बहु सुआउ ॥
मनहठि करम कमावणे फिरि फिरि जोनी पाइ ॥
गुरमुखि जनमु सफलु है जिस नो आपे लए मिलाइ ॥
नानक नदरी नदरि करे ता नाम धनु पलै पाइ ॥2॥
सतिगुर की सेव न कीतीआ सबदि न लगो भाउ ॥
हउमै रोगु कमावणा अति दीरघु बहु सुआउ ॥
मनहठि करम कमावणे फिरि फिरि जोनी पाइ ॥
गुरमुखि जनमु सफलु है जिस नो आपे लए मिलाइ ॥
नानक नदरी नदरि करे ता नाम धनु पलै पाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू की बताई हुई सेवा-कमाई नहीं की। जिसका प्यार (गुरू के) शबद से ना बना (अपने ही मन का मुरीद रह के उसने) अनेकों चस्कों की ओर प्रेरने वाला बहुत लंबा अहंकार का रोग ही कमाया; अपने मन के हठ के आसरे (और ही और) काम करते रहने के कारण वह मनुष्य बार-बार जूनियों (के चक्कर) में पड़ता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का जीवन कामयाब हो जाता है (पर। वही मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है) जिसको (परमात्मा) स्वयं ही (गुरू के चरणों में) जोड़ता है। हे नानक ! जब मेहर की निगाह करने वाला प्रभू (किसी मनुष्य पर मेहर की) निगाह करता है तब वह परमात्मा का नाम-धन प्राप्त कर लेता है। 2।
सभ वडिआईआ हरि नाम विचि हरि गुरमुखि धिआईऐ ॥
पउड़ी ॥
सभ वडिआईआ हरि नाम विचि हरि गुरमुखि धिआईऐ ॥
जि वसतु मंगीऐ साई पाईऐ जे नामि चितु लाईऐ ॥
गुहज गल जीअ की कीचै सतिगुरू पासि ता सरब सुखु पाईऐ ॥
गुरु पूरा हरि उपदेसु देइ सभ भुख लहि जाईऐ ॥
जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो हरि गुण गाईऐ ॥3॥
सभ वडिआईआ हरि नाम विचि हरि गुरमुखि धिआईऐ ॥
जि वसतु मंगीऐ साई पाईऐ जे नामि चितु लाईऐ ॥
गुहज गल जीअ की कीचै सतिगुरू पासि ता सरब सुखु पाईऐ ॥
गुरु पूरा हरि उपदेसु देइ सभ भुख लहि जाईऐ ॥
जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो हरि गुण गाईऐ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने में सारे गुण हैं (अगर मनुष्य नाम सिमरे तो उसके अंदर सारे आत्मिक गुण पैदा हो जाते हैं। पर) परमात्मा (का नाम) गुरू की शरण पड़ने से ही सिमरा जा सकता है। हे भाई ! अगर परमात्मा के नाम में चित्त जोड़े रखें तो (उसके दर से) जो भी चीज मांगी जाती है वही मिल जाती है। हे भाई ! जब दिल की घुण्डी सतिगुरू के आगे खोली जाती है तो हरेक किस्म का सुख मिल जाता है। पूरा सतिगुरू परमात्मा (के सिमरन) का उपदेश देता है (और सिमरन की बरकति से) सारी तृष्णा मिट जाती है। पर। हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर आदि से (सिफत-सालाह के संस्कारों के) लेख लिखे होते हैं वह ही परमात्मा के गुण गाता है (बाकी सारी लुकाई तो माया के जाल में ही फसी रहती है)। 3।
सतिगुर ते खाली को नही मेरै प्रभि मेलि मिलाए ॥
सलोक मः 3 ॥
सतिगुर ते खाली को नही मेरै प्रभि मेलि मिलाए ॥
सतिगुर का दरसनु सफलु है जेहा को इछे तेहा फलु पाए ॥
गुर का सबदु अंम्रितु है सभ त्रिसना भुख गवाए ॥
हरि रसु पी संतोखु होआ सचु वसिआ मनि आए ॥
सचु धिआइ अमरा पदु पाइआ अनहद सबद वजाए ॥
सचो दह दिसि पसरिआ गुर कै सहजि सुभाए ॥
नानक जिन अंदरि सचु है से जन छपहि न किसै दे छपाए ॥1॥
सतिगुर ते खाली को नही मेरै प्रभि मेलि मिलाए ॥
सतिगुर का दरसनु सफलु है जेहा को इछे तेहा फलु पाए ॥
गुर का सबदु अंम्रितु है सभ त्रिसना भुख गवाए ॥
हरि रसु पी संतोखु होआ सचु वसिआ मनि आए ॥
सचु धिआइ अमरा पदु पाइआ अनहद सबद वजाए ॥
सचो दह दिसि पसरिआ गुर कै सहजि सुभाए ॥
नानक जिन अंदरि सचु है से जन छपहि न किसै दे छपाए ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! गुरू के दर से (कभी) कोई ख़ाली (निराश) नहीं गया। (दर पर आए सभी को) प्यारे प्रभू में (गुरू) पूरी तौर पर मिला देता है। गुरू का दीदार भी फलदायक है। जैसी किसी की भावना होती है वैसा ही उसको फल मिल जाता है। हे भाई ! गुरू का शबद आत्मिक जीवन देने वाला (मानो) जल है (जैसे जल पी के प्यास मिटा ली जाती है। वैसे ही शबद-जल की बरकति से मनुष्य के अंदर से माया की) प्यास (तृष्णा) भूख सब मिट जाती है। (गुरू के शबद से) परमात्मा का नाम-रस पी के (मनुष्य के अंदर) संतोष पैदा होता है। और सदा कायम रहने वाला प्रभू उसके मन में आ बसता है। हे भाई ! जो गुरू के द्वारा अडोल अवस्था में प्यार अवस्था में पहुँचता है उसे दसों ही दिशाओं में सदा कायम रहने वाला परमात्मा व्यापक दिखता है। सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को सिमर के उसको ऐसा आत्मिक दर्जा मिल जाता है जो कभी नाश नहीं होता। वह (अपने अंदर सिफत-सालाह के) एक-रस बाजे बजाता है (आत्मिक जीवन देने वाली अवस्था उसके अंदर सदा प्रबल रहती है)। हे नानक ! जिन मनुष्यों के हृदय में सदा-स्थिर प्रभू टिका रहता है वह मनुष्य किसी के छुपाए नहीं छुपते (कोई मनुष्य उनकी शोभा को मिटा नहीं सकता)। 1।
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
मः 3 ॥
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
मानस ते देवते भए सची भगति जिसु देइ ॥
हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि सुचेइ ॥
नानक सहजे मिलि रहे नामु वडिआई देइ ॥2॥
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
मानस ते देवते भए सची भगति जिसु देइ ॥
हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि सुचेइ ॥
नानक सहजे मिलि रहे नामु वडिआई देइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! गुरू के बताए हुए काम करने से परमात्मा मिल जाता है (पर मिलता उसको है) जिस पर (परमात्मा स्वयं) मेहर करता है। (गुरू के द्वारा बताया हुआ काम करने से मनुष्य)। मनुष्य से देवते बन जाते हैं। (पर। वही मनुष्य देवता बनता है) जिसको प्रभू सदा कायम रहने वाली भक्ति (की दाति) देता है। गुरू के शबद के द्वारा जो मनुष्य पवित्र जीवन वाले बन गए। परमात्मा ने (उनके अंदर से) अहंकार मिटा के (उनको अपने साथ) मिला लिया। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा) नाम (जपने का) गुण बख्शता है। (वह मनुष्य) आत्मिक अडोलता में टिक के (प्रभू चरणों में) जुड़ा रहता है। 2।
गुर सतिगुर विचि नावै की वडी वडिआई हरि करतै आपि वधाई ॥
पउड़ी ॥
गुर सतिगुर विचि नावै की वडी वडिआई हरि करतै आपि वधाई ॥
सेवक सिख सभि वेखि वेखि जीवनि॑ ओन॑ा अंदरि हिरदै भाई ॥
निंदक दुसट वडिआई वेखि न सकनि ओन॑ा पराइआ भला न सुखाई ॥
किआ होवै किस ही की झख मारी जा सचे सिउ बणि आई ॥
जि गल करते भावै सा नित नित चड़ै सवाई सभ झखि झखि मरै लोकाई ॥4॥
गुर सतिगुर विचि नावै की वडी वडिआई हरि करतै आपि वधाई ॥
सेवक सिख सभि वेखि वेखि जीवनि॑ ओन॑ा अंदरि हिरदै भाई ॥
निंदक दुसट वडिआई वेखि न सकनि ओन॑ा पराइआ भला न सुखाई ॥
किआ होवै किस ही की झख मारी जा सचे सिउ बणि आई ॥
जि गल करते भावै सा नित नित चड़ै सवाई सभ झखि झखि मरै लोकाई ॥4॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे भाई ! गुरू के अंदर (परमात्मा का) नाम (जपने-जपाने) का बड़ा गुण है। परमात्मा ने स्वयं (यह गुण गुरू में) बढ़ाया है। (सतिगुरू के) सारे सिख सेवक (गुरू के) इस गुण को देख के आत्मिक जीवन हासिल करते हैं। उनको (गुरू का ये गुण अपने) हृदय में प्यारा लगता है। (गुरू की) निंदा करने वाले और बुरे लोग (सतिगुरू की) महिमा देख के बर्दाश्त नहीं कर पाते। उन्हें किसी और की भलाई अच्छी नहीं लगती। पर जब गुरू का प्यार सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ बना हुआ है। तो किसी (निंदक दुष्ट) के झख मारने से गुरू का कुछ नहीं बिगड़ सकता। जो बात ईश्वर को अच्छी लगती है वह दिन-ब-दिन बढ़ती है (और निंदा करने वाली) सारी लुकाई खिझ-खिझ के आत्मिक मौत सहेड़ती रहती है। 4।
ध्रिगु एह आसा दूजे भाव की जो मोहि माइआ चितु लाए ॥
सलोक मः 3 ॥
ध्रिगु एह आसा दूजे भाव की जो मोहि माइआ चितु लाए ॥
हरि सुखु पल॑रि तिआगिआ नामु विसारि दुखु पाए ॥
ध्रिगु एह आसा दूजे भाव की जो मोहि माइआ चितु लाए ॥
हरि सुखु पल॑रि तिआगिआ नामु विसारि दुखु पाए ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो मनुष्य माया के मोह में (अपने) चित्त को जोड़ता है उसकी ये माया से प्यार बढ़ाने वाली आस (और आदत) (उसके लिए) धिक्कार ही कमाने वाली (साबित) होती है (क्योंकि वह मनुष्य) परमात्मा के नाम के आनंद को पराली के बदले में त्याग देता है। परमात्मा का नाम भुला के वह दुख (ही) पाता है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य आत्मिक जीवन की समझ से वंचित रहते हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 850 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।