मनमुख अगिआनी अंधुले जनमि मरहि फिरि आवै जाए ॥ कारज सिधि न होवनी अंति गइआ पछुताए ॥ जिसु करमु होवै तिसु सतिगुरु मिलै सो हरि हरि नामु धिआए ॥ नामि रते जन सदा सुखु पाइनि॑ जन नानक तिन बलि जाए ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: जीवन का सही रास्ता उन्हें नहीं दिखाई देता (इसलिए वे) जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। मनमुख बंदा बारंबार पैदा होता मरता रहता है। (प्रभू को बिसार के मनमुख ने और ही कई तरह के धंधे बुने होते हैं। उन) कामों में (उसको) सफलताएं नहीं मिलतीं। आखिर यहाँ से आहें भरता ही जाता है। जिस मनुष्य पर प्रभू की मेहर होती है उसको गुरू मिलता है। वह सदा प्रभू का नाम सिमरता है। नाम में रंगे हुए मनुष्य सदा आत्मिक आनंद का सुख पाते हैं। हे दास नानक ! (कह-) मैं उनसे सदके जाता हूँ। 1।
मः 3 ॥ आसा मनसा जगि मोहणी जिनि मोहिआ संसारु ॥ सभु को जम के चीरे विचि है जेता सभु आकारु ॥ हुकमी ही जमु लगदा सो उबरै जिसु बखसै करतारु ॥ नानक गुर परसादी एहु मनु तां तरै जा छोडै अहंकारु ॥ आसा मनसा मारे निरासु होइ गुर सबदी वीचारु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! (हर वक्त माया की) आशा (हर समय माया की ही) चितवनी जगत में (जीवों को) मोह रही है। इसने सारे जगत को अपने वश में किया हुआ है। जितना भी जगत दिखाई दे रहा है (इस आशा-मनसा के कारण जगत का) हरेक जीव आत्मिक मौत के पंजे में है। (पर) ये आत्मिक मौत (परमात्मा के) हुकम में ही व्यापती है (इस वास्ते इससे) वही बचता है जिस पर करतार मेहर करता है (और। परमात्मा कृपा करता है गुरू के माध्यम से)। हे नानक ! जब गुरू की कृपा से मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार दूर करता है। जब गुरू के शबद में सुरति जोड़ता है तब मनुष्य आसा-मनसा को खत्म कर लेता है (दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही) आशाओं से ऊपर रहता है। तब मनुष्य का मन (आसा-मनसा के चक्र-व्यूह में से। बवंडर में से) पार लांघ जाता है। 2।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे भाई ! संसार में जिस जगह भी जाएं। वहीं मालिक प्रभू हाजिर है। परलोक में भी हर जगह सच्चा न्याय करने वाला परमात्मा स्वयं ही काम-काज चला रहा है। (उसकी हजूरी में) माया-ग्रसित जीवों को धिक्कारें पड़ती हैं। (पर जिनके हृदय में) सदा-स्थिर हरी-नाम बसता है प्रभू की भक्ति टिकी हुई है। उनको सम्मान मिलता है। हे भाई ! मालिक-प्रभू सदा कायम रहने वाला है उसका इन्साफ भी अटल है। (उसके न्याय के अनुसार ही गुरमुखों की) निंदा करने वालों के सिर पर राख पड़ती है। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर सदा-स्थिर प्रभू को सिमरा है उनको आत्मिक आनंद मिला है। 5।
सलोक मः 3 ॥ पूरै भागि सतिगुरु पाईऐ जे हरि प्रभु बखस करेइ ॥ ओपावा सिरि ओपाउ है नाउ परापति होइ ॥ अंदरु सीतलु सांति है हिरदै सदा सुखु होइ ॥ अंम्रितु खाणा पैन॑णा नानक नाइ वडिआई होइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ हे भाई ! अगर परमात्मा मेहर करे तो (मनुष्य को) बड़ी किस्मत से गुरू मिल जाता है। (गुरू का मिलना ही) सारे उपायों से बढ़िया उपाय है (जिसके द्वारा परमात्मा का) नाम हासिल होता है। (नाम की बरकति से मनुष्य का) मन ठंडा शीतल हो जाता है (मनुष्य के) हृदय में सदा आनंद बना रहता है। हे नानक ! (सतिगुरू के मिलने से जिस मनुष्य की) खुराक और पोशाक (भाव। जिंदगी का आसरा) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस बन जाता है उसको नाम के द्वारा (हर जगह) आदर मिलता है। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे मन ! गुरू की शिक्षा अपने अंदर बसा (इस तरह) आप गुणों के खजाने परमात्मा को ढूँढ लेगा। (सारे) सुख देने वाला परमात्मा आपको आपके अंदर बसता दिख पड़ेगा (आपके अंदर से) अहंकार दूर हैं जाएगा। हे नानक ! आत्मिक जीवन देने वाला और सारे गुणों का खजाना परमात्मा (गुरू के द्वारा अपनी) मेहर की निगाह से (ही) मिलता है। 2।
पउड़ी ॥ जितने पातिसाह साह राजे खान उमराव सिकदार हहि तितने सभि हरि के कीए ॥ जो किछु हरि करावै सु ओइ करहि सभि हरि के अरथीए ॥ सो ऐसा हरि सभना का प्रभु सतिगुर कै वलि है तिनि सभि वरन चारे खाणी सभ स्रिसटि गोले करि सतिगुर अगै कार कमावण कउ दीए ॥ हरि सेवे की ऐसी वडिआई देखहु हरि संतहु जिनि विचहु काइआ नगरी दुसमन दूत सभि मारि कढीए ॥ हरि हरि किरपालु होआ भगत जना उपरि हरि आपणी किरपा करि हरि आपि रखि लीए ॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई ! जगत में) जितने भी शाह। बादशाह। राजे। ख़ान। अमीर और सरदार हैं। वह सारे परमात्मा के (ही) पैदा किए हुए हैं। जो कुछ परमात्मा (उनसे) करवाता है वही वह करते हैं। वह सारे परमात्मा के (दर पर ही) मांगते हैं। हे भाई ! ऐसी समर्था वाला सब जीवों का मालिक वह परमात्मा (सदा) सतिगुरू के पक्ष में रहता है। उस परमात्मा ने चारों वर्णों चारों खाणियों के सारे जीव सारी ही सृष्टि (के जीव) (गुरू के) सेवक बना के गुरू के दर पर सेवा करने के लिए खड़े किए हुए हैं। हे संतजनो ! देखो। परमात्मा की भक्ति करने का ये गुण है कि उस (परमात्मा) ने (भगती करने वाले अपने सेवक के) शरीर-नगर में से (कामादिक) सारे वैरी दुश्मन मार के (बाहर) निकाल दिए हैं। हे भाई ! परमात्मा अपने भक्तों पर (सदा) दयावान होता है। परमात्मा मेहर करके (अपने भक्तों को कामादिक वैरियों से) स्वयं बचाता है। 6।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के मन में खोट टिका रहता है (इस वास्ते उसको) सदा (आत्मिक) कलेश रहता है। उसकी सुरति (परमात्मा में) नहीं जुड़ती। उस मनुष्य की सारी किरत-कार दुख-कलेश में ही होती है (उसको हर वक्त) कलेश ही बना रहता है। परलोक में भी उसके वास्ते कलेश ही है। हे नानक ! (जब परमात्मा की) मेहर से (मनुष्य को) गुरू मिलता है तब सदा-स्थिर हरी-नाम में उसकी लगन लग जाती है। आत्मिक अडोलता में (टिकने के कारण उसको आत्मिक) आनंद मिला रहता है और उसके मन में से भटकना दूर हो जाती है सहम दूर हो जाता है। 1।
मः 3 ॥ गुरमुखि सदा हरि रंगु है हरि का नाउ मनि भाइआ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है (उसके अंदर) सदा परमात्मा के नाम की रंगत चढ़ी रहती है। उसको परमात्मा का नाम (अपने) मन में प्यारा लगता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जीवन का सही रास्ता उन्हें नहीं दिखाई देता (इसलिए वे) जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।