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- वखतु वीचारे सु बंदा होइ ॥
- गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥
- सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥
- कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥
- नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥
- हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥
- कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥
- होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥
- हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥
- हउ हउ करती सभ मुई संपउ किसै न नालि ॥
वखतु वीचारे सु बंदा होइ ॥
वखतु वीचारे सु बंदा होइ ॥
कुदरति है कीमति नही पाइ ॥
जा कीमति पाइ त कही न जाइ ॥
सरै सरीअति करहि बीचारु ॥
बिनु बूझे कैसे पावहि पारु ॥
सिदकु करि सिजदा मनु करि मखसूदु ॥
जिह धिरि देखा तिह धिरि मउजूदु ॥1॥
कुदरति है कीमति नही पाइ ॥
जा कीमति पाइ त कही न जाइ ॥
सरै सरीअति करहि बीचारु ॥
बिनु बूझे कैसे पावहि पारु ॥
सिदकु करि सिजदा मनु करि मखसूदु ॥
जिह धिरि देखा तिह धिरि मउजूदु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: यहाँ जो मनुष्य (मानस जनम) के समय को विचारता है (भाव, जो यह सोचता है कि इस जगत में मनुष्य का शरीर किस लिए मिला है) वह (उस प्रभू का) सेवक बन जाता है। प्रभू (अपनी रची) कुदरति में व्यापक है, उसका मूल्य नहीं पड़ सकता; जो कोई मुल्य डालने का यत्न भी करे, तो भी उसका मूल्य बताया नहीं जा सकता। जो मनुष्य निरी शरा आदि (अर्थात, बाहरी धार्मिक रस्मों) की ही विचार करते हैं, वह (जीवन के सही मनोरथ को) समझे बिना (जीवन का) दूसरा छोर कैसे ढूँढ सकते हैं? (हे भाई !) ईश्वर पे भरोसा रख - ये है उसके आगे सिर झुकाना, अपने मन को ईश्वर में जोड़ना - इसको जिंदगी का निशाना बना। फिर जिस तरफ देखें, उस तरफ रॅब दिखता है।1।
गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥
मः 3 ॥
गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥
नानक सतिगुरु तां मिलै जा मनु रहै हदूरि ॥2॥
गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥
नानक सतिगुरु तां मिलै जा मनु रहै हदूरि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (शरीर से) गुरू के नजदीक या दूर बैठने से गुरू का संग प्राप्त नहीं होता। हे नानक ! सतिगुरू तभी मिलता है जब (सिख का) मन (गुरू की) हजूरी में रहता है।2।
सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥
पउड़ी ॥
सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥
हरि सभना विचि तूं वरतदा हरि सभना भाणा ॥
सभि तुझै धिआवहि जीअ जंत हरि सारग पाणा ॥
जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन हउ कुरबाणा ॥
तूं आपे आपि वरतदा करि चोज विडाणा ॥4॥
सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥
हरि सभना विचि तूं वरतदा हरि सभना भाणा ॥
सभि तुझै धिआवहि जीअ जंत हरि सारग पाणा ॥
जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन हउ कुरबाणा ॥
तूं आपे आपि वरतदा करि चोज विडाणा ॥4॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सात द्वीप, सात समुंद्र, नौ खण्ड, चार वेद; आठारह पुराण, इन सब में आप ही बस रहे हैं, और सभी को प्यारे लगते हैं। हे धर्नुधारी प्रभू ! सारे जीव जंतु आपका ही सिमरन करते हैं। मैं सदके हूँ उन पे से, जो गुरू के सन्मुख हो के आपको जपते हैं । (हलांकि) आप आश्चर्यजनक लीला रच के खुद ही खुद सब में व्यापक हैं।4
कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥
सलोक मः 3 ॥
कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥
सदा साहिब कै रंगि रहै कबहूं न तूटसि नेहु ॥
कलउ मसाजनी जाइसी लिखिआ भी नाले जाइ ॥
नानक सह प्रीति न जाइसी जो धुरि छोडी सचै पाइ ॥1॥
कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥
सदा साहिब कै रंगि रहै कबहूं न तूटसि नेहु ॥
कलउ मसाजनी जाइसी लिखिआ भी नाले जाइ ॥
नानक सह प्रीति न जाइसी जो धुरि छोडी सचै पाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ कलम दवात मंगाने का क्या लाभ? (हे सज्जन !) हृदय में ही (हरि का नाम) लिख ले। (इस तरह यदि) मनुष्य सदा सांई के प्यार में (भीगा) रहे (तो) ये प्यार कभी नहीं टूटेगा। (वरना) कलम दवात तो नाश होने वाली (चीज) है और (इसका) लिखा (कागज) भी नाश हो जाना है। पर, हे नानक ! जो प्यार सच्चे प्रभू ने अपने दर से (जीव के हृदय में) बीज दिया है उसका नाश नही होंगे।1।
नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥
मः 3 ॥
नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥
सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ सचि रहहु लिव लाइ ॥
नानक सबदी सचु है करमी पलै पाइ ॥2॥
नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥
सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ सचि रहहु लिव लाइ ॥
नानक सबदी सचु है करमी पलै पाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ बेशक निर्णय करके देख लो, जो कुछ (इन आँखों से) दिखता है (जीव के) साथ नही जा सकता, (इस करके) सतिगुरू ने निश्चय कराया है (कि) सच्चा प्रभू (साथ निभने योग्य है), (इसलिए) प्रभू में बिरती जोड़ी रखो। हे नानक ! जो प्रभू की मेहर हो तो गुरू के शबद से सच्चा हरी हृदय में बसता है।2।
हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥
पउड़ी ॥
हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥
जो कीचै सो हरि जाणदा मेरे मन हरि चेतु ॥
सो डरै जि पाप कमावदा धरमी विगसेतु ॥
तूं सचा आपि निआउ सचु ता डरीऐ केतु ॥
जिना नानक सचु पछाणिआ से सचि रलेतु ॥5॥
हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥
जो कीचै सो हरि जाणदा मेरे मन हरि चेतु ॥
सो डरै जि पाप कमावदा धरमी विगसेतु ॥
तूं सचा आपि निआउ सचु ता डरीऐ केतु ॥
जिना नानक सचु पछाणिआ से सचि रलेतु ॥5॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी ! आप हर जगह (अंदर-बाहर) (व्यापक) हैं, (इस करके जीवों के) हृदयों को आप ही जानते हैं। हे मेरे मन ! जो कुछ करते हैं (सब जगह व्यापक होने के कारण) वह हरि जानता है, (इसलिए) उसका सिमरन कर। पाप करने वाले को (ईश्वर से) डर लगता है, और धर्मी (देख के) खुश होता है। हे हरी ! डरें भी क्यूँ? (जब जैसा) आप स्वयं सच्चे हैं (तैसे ही) आपका न्याय भी सच्चा है। (डरना तो कहीं रहा), हे नानक ! जिन्हें सच्चे हरी की समझ पड़ी है, वह उसमें ही घुल मिल जाते हैं (भाव, उसके साथ ही एक-रूप हो जाते हैं)।5।
कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥
सलोक मः 3 ॥
कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥
लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥1॥
कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥
लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जल जाए वह कलम, समेत दवात के, और वह कागज भी जल जाए, लिखने वाला भी जल मरे, जिसने (निरा) माया के प्यार का लेखा लिखा है, (क्यूँकि) हे नानक ! (जीव) वही कुछ कमाता है, जो (संस्कार अपने अच्छे-बुरे किए हुए कर्मों के अनुसार) पहिले से (अपने हृदय पर) लिखे जाता है; (जीव) इस के उलट कुछ नहीं कर सकता।1।
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥
मः 3 ॥
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥
नानक विणु नावै को थिरु नही पड़ि पड़ि होइ खुआरु ॥2॥
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥
नानक विणु नावै को थिरु नही पड़ि पड़ि होइ खुआरु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ और (माया संबंधी) पढ़ना व्यर्थ का उद्यम है, और बोलना (भी) व्यर्थ (क्योंकि ये उद्यम) माया के साथ प्यार (बढ़ाते हैं)। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना कोई भी सदा नहीं रहेगा (भाव, सदा साथ नहीं निभेगा), (इस वास्ते) यदि कोई अन्य पढ़ाईआं ही पढ़ता है ख्वार होता है।2।
हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥
पउड़ी ॥
हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा निआउ है धरम का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा फलु है जीअ का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा न सुणई कहिआ चुगल का ॥
हरि की वडिआई वडी है अपुछिआ दानु देवका ॥6॥
हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा निआउ है धरम का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा फलु है जीअ का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा न सुणई कहिआ चुगल का ॥
हरि की वडिआई वडी है अपुछिआ दानु देवका ॥6॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ उसकी सिफत सलाह और उसका कीरतन करना - यही (जीव के लिए) बड़़ी (उक्तम करनी) है। प्रभू की सिफत करनी बड़ा कर्म है, जो धर्म का न्याय है, हरी की उपमा करनी सबसे अच्छा काम है (क्योंकि) जीव का (असली) फल (यह ही) है (भाव, जीवन का उद्देश्य ही यही है)। जो प्रभू चुगली की बात पर कान नहीं धरता, उस (प्रभू की) सिफत करनी बड़ा कर्म है। जो प्रभू किसी को पूछ के दान नही देता उसकी उपमा उक्तम काम है।6।
हउ हउ करती सभ मुई संपउ किसै न नालि ॥
सलोक मः 3 ॥
हउ हउ करती सभ मुई संपउ किसै न नालि ॥
दूजै भाइ दुखु पाइआ सभ जोही जमकालि ॥
हउ हउ करती सभ मुई संपउ किसै न नालि ॥
दूजै भाइ दुखु पाइआ सभ जोही जमकालि ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ धन किसी के साथ नही (निभता, परंतु धन की टेक रखने वाले सारे जीव अहंकारी हो हो के खपते हैं, आत्मिक मौत मरे रहते हैं। माया के प्यार में सब ने दुख ही पाया है (क्योंकि) जमकाल ने (ऐसे) सभी को घूरा है (भाव, माया के मोह में फंसे जीव मौत से थर थर काँपते हैं, मानों, उन्हें जमकाल घूर रहा है)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 84 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।