कुदरति है कीमति नही पाइ ॥
जा कीमति पाइ त कही न जाइ ॥
सरै सरीअति करहि बीचारु ॥
बिनु बूझे कैसे पावहि पारु ॥
सिदकु करि सिजदा मनु करि मखसूदु ॥
जिह धिरि देखा तिह धिरि मउजूदु ॥1॥
गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥
नानक सतिगुरु तां मिलै जा मनु रहै हदूरि ॥2॥
सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥
हरि सभना विचि तूं वरतदा हरि सभना भाणा ॥
सभि तुझै धिआवहि जीअ जंत हरि सारग पाणा ॥
जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन हउ कुरबाणा ॥
तूं आपे आपि वरतदा करि चोज विडाणा ॥4॥
कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥
सदा साहिब कै रंगि रहै कबहूं न तूटसि नेहु ॥
कलउ मसाजनी जाइसी लिखिआ भी नाले जाइ ॥
नानक सह प्रीति न जाइसी जो धुरि छोडी सचै पाइ ॥1॥
नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥
सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ सचि रहहु लिव लाइ ॥
नानक सबदी सचु है करमी पलै पाइ ॥2॥
हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥
जो कीचै सो हरि जाणदा मेरे मन हरि चेतु ॥
सो डरै जि पाप कमावदा धरमी विगसेतु ॥
तूं सचा आपि निआउ सचु ता डरीऐ केतु ॥
जिना नानक सचु पछाणिआ से सचि रलेतु ॥5॥
कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥
लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥1॥
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥
नानक विणु नावै को थिरु नही पड़ि पड़ि होइ खुआरु ॥2॥
हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा निआउ है धरम का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा फलु है जीअ का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा न सुणई कहिआ चुगल का ॥
हरि की वडिआई वडी है अपुछिआ दानु देवका ॥6॥
हउ हउ करती सभ मुई संपउ किसै न नालि ॥
दूजै भाइ दुखु पाइआ सभ जोही जमकालि ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “यहाँ जो मनुष्य (मानस जनम) के समय को विचारता है (भाव, जो यह सोचता है कि इस जगत में मनुष्य का शरीर किस लिए मिला है) वह (उस प्रभू का) सेवक बन जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।