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अंग 84

अंग
84
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
वखतु वीचारे सु बंदा होइ ॥
कुदरति है कीमति नही पाइ ॥
जा कीमति पाइ त कही न जाइ ॥
सरै सरीअति करहि बीचारु ॥
बिनु बूझे कैसे पावहि पारु ॥
सिदकु करि सिजदा मनु करि मखसूदु ॥
जिह धिरि देखा तिह धिरि मउजूदु ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: यहाँ जो मनुष्य (मानस जनम) के समय को विचारता है (भाव, जो यह सोचता है कि इस जगत में मनुष्य का शरीर किस लिए मिला है) वह (उस प्रभू का) सेवक बन जाता है। प्रभू (अपनी रची) कुदरति में व्यापक है, उसका मूल्य नहीं पड़ सकता; जो कोई मुल्य डालने का यत्न भी करे, तो भी उसका मूल्य बताया नहीं जा सकता। जो मनुष्य निरी शरा आदि (अर्थात, बाहरी धार्मिक रस्मों) की ही विचार करते हैं, वह (जीवन के सही मनोरथ को) समझे बिना (जीवन का) दूसरा छोर कैसे ढूँढ सकते हैं? (हे भाई !) ईश्वर पे भरोसा रख – ये है उसके आगे सिर झुकाना, अपने मन को ईश्वर में जोड़ना – इसको जिंदगी का निशाना बना। फिर जिस तरफ देखें, उस तरफ रॅब दिखता है।1।
मः 3 ॥
गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥
नानक सतिगुरु तां मिलै जा मनु रहै हदूरि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (शरीर से) गुरू के नजदीक या दूर बैठने से गुरू का संग प्राप्त नहीं होता। हे नानक ! सतिगुरू तभी मिलता है जब (सिख का) मन (गुरू की) हजूरी में रहता है।2।
पउड़ी ॥
सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥
हरि सभना विचि तूं वरतदा हरि सभना भाणा ॥
सभि तुझै धिआवहि जीअ जंत हरि सारग पाणा ॥
जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन हउ कुरबाणा ॥
तूं आपे आपि वरतदा करि चोज विडाणा ॥4॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सात द्वीप, सात समुंद्र, नौ खण्ड, चार वेद; आठारह पुराण, इन सब में आप ही बस रहा है, और सभी को प्यारा लगता है। हे धर्नुधारी प्रभू ! सारे जीव जंतु आपका ही सिमरन करते हैं। मैं सदके हूँ उन पे से, जो गुरू के सन्मुख हो के आपको जपते हैं । (हलांकि) आप आश्चर्यजनक लीला रच के खुद ही खुद सब में व्यापक है।4
सलोक मः 3 ॥
कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥
सदा साहिब कै रंगि रहै कबहूं न तूटसि नेहु ॥
कलउ मसाजनी जाइसी लिखिआ भी नाले जाइ ॥
नानक सह प्रीति न जाइसी जो धुरि छोडी सचै पाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ कलम दवात मंगाने का क्या लाभ? (हे सज्जन !) हृदय में ही (हरि का नाम) लिख ले। (इस तरह यदि) मनुष्य सदा सांई के प्यार में (भीगा) रहे (तो) ये प्यार कभी नहीं टूटेगा। (वरना) कलम दवात तो नाश होने वाली (चीज) है और (इसका) लिखा (कागज) भी नाश हो जाना है। पर, हे नानक ! जो प्यार सच्चे प्रभू ने अपने दर से (जीव के हृदय में) बीज दिया है उसका नाश नही होंगे।1।
मः 3 ॥
नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥
सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ सचि रहहु लिव लाइ ॥
नानक सबदी सचु है करमी पलै पाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ बेशक निर्णय करके देख लो, जो कुछ (इन आँखों से) दिखता है (जीव के) साथ नही जा सकता, (इस करके) सतिगुरू ने निश्चय कराया है (कि) सच्चा प्रभू (साथ निभने योग्य है), (इसलिए) प्रभू में बिरती जोड़ी रखो। हे नानक ! जो प्रभू की मेहर हो तो गुरू के शबद से सच्चा हरी हृदय में बसता है।2।
पउड़ी ॥
हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥
जो कीचै सो हरि जाणदा मेरे मन हरि चेतु ॥
सो डरै जि पाप कमावदा धरमी विगसेतु ॥
तूं सचा आपि निआउ सचु ता डरीऐ केतु ॥
जिना नानक सचु पछाणिआ से सचि रलेतु ॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी ! आप हर जगह (अंदर-बाहर) (व्यापक) है, (इस करके जीवों के) हृदयों को आप ही जानता है। हे मेरे मन ! जो कुछ करते हैं (सब जगह व्यापक होने के कारण) वह हरि जानता है, (इसलिए) उसका सिमरन कर। पाप करने वाले को (ईश्वर से) डर लगता है, और धर्मी (देख के) खुश होता है। हे हरी ! डरें भी क्यूँ? (जब जैसा) तूं स्वयं सच्चा है (तैसे ही) आपका न्याय भी सच्चा है। (डरना तो कहीं रहा), हे नानक ! जिन्हें सच्चे हरी की समझ पड़ी है, वह उसमें ही घुल मिल जाते हैं (भाव, उसके साथ ही एक-रूप हो जाते हैं)।5।
सलोक मः 3 ॥
कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥
लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जल जाए वह कलम, समेत दवात के, और वह कागज भी जल जाए, लिखने वाला भी जल मरे, जिसने (निरा) माया के प्यार का लेखा लिखा है, (क्यूँकि) हे नानक ! (जीव) वही कुछ कमाता है, जो (संस्कार अपने अच्छे-बुरे किए हुए कर्मों के अनुसार) पहिले से (अपने हृदय पर) लिखे जाता है; (जीव) इस के उलट कुछ नहीं कर सकता।1।
मः 3 ॥
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥
नानक विणु नावै को थिरु नही पड़ि पड़ि होइ खुआरु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ और (माया संबंधी) पढ़ना व्यर्थ का उद्यम है, और बोलना (भी) व्यर्थ (क्योंकि ये उद्यम) माया के साथ प्यार (बढ़ाते हैं)। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना कोई भी सदा नहीं रहेगा (भाव, सदा साथ नहीं निभेगा), (इस वास्ते) यदि कोई अन्य पढ़ाईआं ही पढ़ता है ख्वार होता है।2।
पउड़ी ॥
हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा निआउ है धरम का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा फलु है जीअ का ॥
हरि की वडिआई वडी है जा न सुणई कहिआ चुगल का ॥
हरि की वडिआई वडी है अपुछिआ दानु देवका ॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ उसकी सिफत सलाह और उसका कीरतन करना – यही (जीव के लिए) बड़़ी (उक्तम करनी) है। प्रभू की सिफत करनी बड़ा कर्म है, जो धर्म का न्याय है, हरी की उपमा करनी सबसे अच्छा काम है (क्योंकि) जीव का (असली) फल (यह ही) है (भाव, जीवन का उद्देश्य ही यही है)। जो प्रभू चुगली की बात पर कान नहीं धरता, उस (प्रभू की) सिफत करनी बड़ा कर्म है। जो प्रभू किसी को पूछ के दान नही देता उसकी उपमा उक्तम काम है।6।
सलोक मः 3 ॥
हउ हउ करती सभ मुई संपउ किसै न नालि ॥
दूजै भाइ दुखु पाइआ सभ जोही जमकालि ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ धन किसी के साथ नही (निभता, परंतु धन की टेक रखने वाले सारे जीव अहंकारी हो हो के खपते हैं, आत्मिक मौत मरे रहते हैं। माया के प्यार में सब ने दुख ही पाया है (क्योंकि) जमकाल ने (ऐसे) सभी को घूरा है (भाव, माया के मोह में फंसे जीव मौत से थर थर काँपते हैं, मानों, उन्हें जमकाल घूर रहा है)।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “यहाँ जो मनुष्य (मानस जनम) के समय को विचारता है (भाव, जो यह सोचता है कि इस जगत में मनुष्य का शरीर किस लिए मिला है) वह (उस प्रभू का) सेवक बन जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।