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अंग 85

अंग
85
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक गुरमुखि उबरे साचा नामु समालि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का नाम हृदय में संभाल के आत्मिक मौत से बचे रहते हैं।1।
मः 1 ॥
गलंी असी चंगीआ आचारी बुरीआह ॥
मनहु कुसुधा कालीआ बाहरि चिटवीआह ॥
रीसा करिह तिनाड़ीआ जो सेवहि दरु खड़ीआह ॥
नालि खसमै रतीआ माणहि सुखि रलीआह ॥
होदै ताणि निताणीआ रहहि निमानणीआह ॥
नानक जनमु सकारथा जे तिन कै संगि मिलाह ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 1 II हम बातों में सुचॅजी (है, पर) आचरन की बुरी हैं, मन से खोटी और काली (हैं, पर) बाहर से साफ सुथरी। (फिर भी) हम नकल उनकी करती हैं जो सावधान हो के पति के प्यार में भीगी हुई हैं और आनन्द, सुख माणती हैं, जो ताकत के होते हुए भी विनम्रता में रहती हैं। हे नानक ! (हमारा) जनम सफल (तभी हो सकता है) यदि उनकी संगति में रहें।2।
पउड़ी ॥
तूं आपे जलु मीना है आपे आपे ही आपि जालु ॥
तूं आपे जालु वताइदा आपे विचि सेबालु ॥
तूं आपे कमलु अलिपतु है सै हथा विचि गुलालु ॥
तूं आपे मुकति कराइदा इक निमख घड़ी करि खिआलु ॥
हरि तुधहु बाहरि किछु नही गुर सबदी वेखि निहालु ॥7॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी II (हे प्रभू !) आप स्वयं ही (मछली का जीवन-रूप) जल है, स्वयं ही (जल में) मछली है, और स्वयं ही जाल है। आप खुद ही जाल बिछाता है और खुद ही जल में जाला है, आप खुद ही गहरे जल में सुंदर निर्लिप कमल है। (हे हरी !) जो (जीव) एक पलक मात्र (आपका) ध्यान धरे (उसे) आप स्वयं ही (इस जाल में से) छुड़ाता है। हे हरी ! आपसे परे और कुछ नही है, सतिगुरू के शबद से (आपको हर जगह) देख के (कमल के फूल की तरह) प्रसन्न अवस्था में रह सकते हैं।
सलोक मः 3 ॥
हुकमु न जाणै बहुता रोवै ॥
अंदरि धोखा नीद न सोवै ॥
जे धन खसमै चलै रजाई ॥ दरि घरि सोभा महलि बुलाई ॥
नानक करमी इह मति पाई ॥
गुर परसादी सचि समाई ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (जिस मनुष्य को प्रभू के) भाणे की (रजा की, मर्जी की) समझ नहीं पड़ती, उसे बहुत रोना-धोना लगा रहता है, उसका मन चिंता में रहता है, (इस करके) सुख की नींद नहीं सो सकता। (भाव कभी शांति नही मिलती)। अगर (जीव) स्त्री (प्रभू) पति की रजा में चले,तो दरगाह में और इस संसार में उसकी शोभा होती है और (प्रभू की) हजूरी में उसको आदर मिलता है। (पर, हे नानक !) प्रभू मेहर करे तो (रजा मानने वाली ये) समझ मिलती है, और गुरू की कृपा से (रजा के मालिक) सदा स्थिर सांई में जीव लीन हो जाता है।1।
मः 3 ॥
मनमुख नाम विहूणिआ रंगु कसुंभा देखि न भुलु ॥
इस का रंगु दिन थोड़िआ छोछा इस दा मुलु ॥
दूजै लगे पचि मुए मूरख अंध गवार ॥
बिसटा अंदरि कीट से पइ पचहि वारो वार ॥
नानक नाम रते से रंगुले गुर कै सहजि सुभाइ ॥
भगती रंगु न उतरै सहजे रहै समाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे नाम से वंचित मनमुख ! कुसंभ का (माया का) रंग देख के मोहित ना हो जा, इसका रंग (आनंद) थोड़े दिन ही रहता है, और इसका मुल्य भी तुच्छ सा ही होता है। मूर्ख (अकल से) अंधे और मति हीन जीव माया के मोह में फंस के मुड़ मुड़ के दुखी होते हैं, जैसे बिष्ठा में पड़े हुए कीड़े करल-बरल करते हैं हे नानक ! जो जीव गुरू के ज्ञान और स्वाभाव में (अपनी मति और स्वाभाव लीन कर देते हैं), वे नाम में भीगे हुए और संदर हैं, सहज अवस्था में लीन रहने के कारण उनकी भक्ति का रंग कभी नहीं उतरता।2।
पउड़ी ॥
सिसटि उपाई सभ तुधु आपे रिजकु संबाहिआ ॥
इकि वलु छलु करि कै खावदे मुहहु कूड़ु कुसतु तिनी ढाहिआ ॥
तुधु आपे भावै सो करहि तुधु ओतै कंमि ओइ लाइआ ॥
इकना सचु बुझाइओनु तिना अतुट भंडार देवाइआ ॥
हरि चेति खाहि तिना सफलु है अचेता हथ तडाइआ ॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे हरी !) तूने स्वयं (सारा) संसार रचा है, और सबको रिजक पहुँचा रहा है। (फिर भी) कई जीव (तूझे राजक नहीं समझते हुए) छल-कपट करके पेट भरते हैं, और मुंह से झूठ-तूफान बोलते हैं। (हे हरी !) जो आपकी रजा है सो ही वो करते हैं, तूने उन्हें वैसे ही कामों (छल-कपट) में ही लगा रखा है। जिन्हें हरी ने अपने सच्चे नाम की सूझ बख्शी है, उन्हें इतने खजाने (संतोष के) उसने दिए हैं कि कमी नहीं आती। (असल बात ये है कि) जो जीव प्रभू को याद करके माया का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें फलती है। (भाव, वे तृष्णातुर नहीं होते) और रॅब की याद से वंचित लोगों के हाथ (सदा) फैले रहते हैं (भाव, उनकी तृष्णा नहीं मिटती)।8।
सलोक मः 3 ॥
पड़ि पड़ि पंडित बेद वखाणहि माइआ मोह सुआइ ॥
दूजै भाइ हरि नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥
जिनि जीउ पिंडु दिता तिसु कबहूं न चेतै जो देंदा रिजकु संबाहि ॥
जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवै जाइ ॥
मनमुखि किछू न सूझै अंधुले पूरबि लिखिआ कमाइ ॥
पूरै भागि सतिगुरु मिलै सुखदाता नामु वसै मनि आइ ॥
सुखु माणहि सुखु पैनणा सुखे सुखि विहाइ ॥
नानक सो नाउ मनहु न विसारीऐ जितु दरि सचै सोभा पाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 II (जीभ से) पढ़ पढ़ के (पर) माया के मोह के स्वाद में पंडित लोग वेदों की व्याख्या करते हैं। (वेद पाठी होते हुए भी) जो मनुष्य माया के प्यार में हरी का नाम विसारता है, उस मन के मूर्ख को दण्ड मिलता है। (क्योंकि) जिस हरी ने जिंद और शरीर (भाव, मनुष्य जन्म) बख्शा है और जो रिजक पहॅुंचाता है उसे वह कभी याद भी नहीं करता, जम की फांसी उसके गले से कभी काटी नहीं जाती और मुड़ मुड़ के वह पैदा होता मरता है। अंधे मनमुख को कुछ समझ नहीं आती, और (पहले किए कर्मों के अनुसार जो संस्कार अपने हृदय से) लिखता रहा है, (उनके अनुसार ही अब भी) वैसे काम किए जाता है। (जिस मनुष्य को) सौभाग्यवश सुखदाता सतिगुरू मिल जाता है, नाम उसके मन में आ बसता है। (गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य) आत्मिक आनंद का सुख भोगते हैं। (दुनिया का खाना) माणना (उनके वास्ते) आत्मिक आनंद ही है, और (उनकी उम्र) पूरी तरह सुख में ही व्यतीत होती है।जिस से सच्ची दरगाह में शोभा मिलती है।1।
मः 3 ॥
सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ सचु नामु गुणतासु ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (जिस ने) सत्गुरू की बताई सेवा की है (उसे) गुणों का खजाना सच्चा नाम (रूपी) सुख प्राप्त होता है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का नाम हृदय में संभाल के आत्मिक मौत से बचे रहते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।