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अंग 848

अंग
848
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुख सागर प्रभ भेटिऐ नानक सुखी होत इहु जीउ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अगर वह सुखों का समुंद्र प्रभू मिल जाए। तो यह जिंद सुखी हो जाती है। 1।
छंत ॥
सुख सागर प्रभु पाईऐ जब होवै भागो राम ॥
माननि मानु वञाईऐ हरि चरणी लागो राम ॥
छोडि सिआनप चातुरी दुरमति बुधि तिआगो राम ॥
नानक पउ सरणाई राम राइ थिरु होइ सुहागो राम ॥1॥
सो प्रभु तजि कत लागीऐ जिसु बिनु मरि जाईऐ राम ॥
लाज न आवै अगिआन मती दुरजन बिरमाईऐ राम ॥
पतित पावन प्रभु तिआगि करे कहु कत ठहराईऐ राम ॥
नानक भगति भाउ करि दइआल की जीवन पदु पाईऐ राम ॥2॥
स्री गोपालु न उचरहि बलि गईए दुहचारणि रसना राम ॥
प्रभु भगति वछलु नह सेवही काइआ काक ग्रसना राम ॥
भ्रमि मोही दूख न जाणही कोटि जोनी बसना राम ॥
नानक बिनु हरि अवरु जि चाहना बिसटा क्रिम भसमा राम ॥3॥
लाइ बिरहु भगवंत संगे होइ मिलु बैरागनि राम ॥
चंदन चीर सुगंध रसा हउमै बिखु तिआगनि राम ॥
ईत ऊत नह डोलीऐ हरि सेवा जागनि राम ॥
नानक जिनि प्रभु पाइआ आपणा सा अटल सुहागनि राम ॥4॥1॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: छंत- हे गौरवमयी जीव सि्त्रये ! जब (माथे के) भाग्य जागते हैं तब सुखों का समुंद्र प्रभू मिल जाता है (पर उसको मिलने के लिए अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लेना चाहिए। हे जीव-स्त्री ! (गुमान त्याग के) प्रभू के चरणों में जुड़ी रह। समझदारी चतुराई छोड़ दे। खोटी मति-बुद्धि (अपने अंदर से) दूर कर। अपनी अक्लमंदी एवं चतुराई को छोड़कर खोटी मति वाली बुद्धि को त्याग दीजिए। हे नानक ! (कह-हे जीव स्त्री !) प्रभू पातशाह की शरण पड़ी रह। (तो ही आपके सिर पर आपके सिर का) साई (पति-प्रभू) सदा टिका रहेगा। 1। हे भाई ! जिस (परमात्मा की याद) के बिना आत्मिक मौत सहेड़ ली जाती है। उसको भुला के किसी और जगह लीन नहीं होना चाहिए। पर जिस मनुष्य की मति आत्मिक जीवन की ओर से कोरी है (प्रभू की याद को भुला के) उसको शर्म नहीं आती। वह मनुष्य बुरे लोगों में खचित रहता है। हे भाई ! विकारियों को पवित्र करने वाले प्रभू को भुला के और शांति कहाँ आ सकती है। प्रभू से प्यार डाले रख (इस तरह) आत्मिक जीवन वाला (ऊँचा) दर्जा मिल जाता है। 2। हे (निंदा-ईष्या की आग में) जल रही (जीभ !) (निंदा करने के) बुरे काम में व्यस्त हे जीभ ! आप सृष्टि के पालनहार प्रभू (का नाम) याद नहीं करती। हे जिंदे ! जो प्रभू भगती से प्यार करने वाला है। आप उसकी सेवा-भक्ति नहीं करती। (आपके इस) शरीर को (कामादिक) कौऐ (अंदर ही अंदर से) खाए जा रहे हैं। हे जिंदे ! भटकना के कारण आप (आत्मिक सरमाया) लुटाए जा रही है। (नाम भुला के) करोड़ों जूनियों में पड़ना पड़ता है। आप इन दुखों को नहीं समझती ! हे नानक ! (कह- हे जिंदे !) परमात्मा के बिना किसी और को प्यार करना जो है। (वह इस तरह है जैसे) विष्ठा के कीड़े का (विकारों के गंद में पड़े रह के) आत्मिक जीवन (जल के) राख हो जाता है। 3। हे सहेलिये ! भगवान से प्रीति बनाए रख। (दुनियावी पदार्थों की ओर से) वैरागिन हो के (मोह तोड़ कर प्रभू के चरणों में) जुड़ी रह। (जो जीव-सि्त्रयां प्रभू चरणों में जुड़ी रहती हैं। वह) चंदन। सुंदर कपड़े। सुगन्धियां। स्वादिष्ट भोजन (आदि से पैदा होने वाली) आत्मिक मौत लाने वाले अहंकार के जहर को त्याग देती हैं। (हे सहेलिए ! इन रसों की खातिर) इधर-उधर डोलना नहीं चाहिए। (पर इनकी तरफ से) वही सचेत रहती हैं जो प्रभू की सेवा-भक्ति में लीन रहती हैं। हे नानक ! जिस (जीव-स्त्री) ने अपने प्रभू (का मिलाप) हासल कर लिया। वह सदा के लिए पति वाली (सोहागिन) हो जाती है। 4। 1। 4।
बिलावलु महला 5 ॥
हरि खोजहु वडभागीहो मिलि साधू संगे राम ॥
गुन गोविद सद गाईअहि पारब्रहम कै रंगे राम ॥
सो प्रभु सद ही सेवीऐ पाईअहि फल मंगे राम ॥
नानक प्रभ सरणागती जपि अनत तरंगे राम ॥1॥
इकु तिलु प्रभू न वीसरै जिनि सभु किछु दीना राम ॥
वडभागी मेलावड़ा गुरमुखि पिरु चीन॑ा राम ॥
बाह पकड़ि तम ते काढिआ करि अपुना लीना राम ॥
नामु जपत नानक जीवै सीतलु मनु सीना राम ॥2॥
किआ गुण तेरे कहि सकउ प्रभ अंतरजामी राम ॥
सिमरि सिमरि नाराइणै भए पारगरामी राम ॥
गुन गावत गोविंद के सभ इछ पुजामी राम ॥
नानक उधरे जपि हरे सभहू का सुआमी राम ॥3॥
रस भिंनिअड़े अपुने राम संगे से लोइण नीके राम ॥
प्रभ पेखत इछा पुंनीआ मिलि साजन जी के राम ॥
अंम्रित रसु हरि पाइआ बिखिआ रस फीके राम ॥
नानक जलु जलहि समाइआ जोती जोति मीके राम ॥4॥2॥5॥9॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे बड़े भाग्य वालियो ! गुरू की संगति में मिल के परमात्मा की तलाश करते रहो। हे भाई ! परमात्मा के प्यार-रंग में (टिक के) उसके गुण गाए जाने चाहिए। हे भाई ! सदा ही उस प्रभू की सेवा भक्ति करनी चाहिए (उसकी भगती की बरकति से) मुँह-मांगे फल मिल जाते हैं। हे नानक ! (सदा) प्रभू की शरण पड़ा रह। उस अनेकों लहरों के मालिक प्रभू का नाम जपा कर। 1। हे भाई ! जिस (प्रभू) ने हरेक पदार्थ दिया है। उसको पल भर के समय के लिए भी नहीं भूलना चाहिए। (पर उससे) मिलाप बड़े भाग्यों से ही होता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह उस प्रभू-पति के साथ गहरी सांझ डालता है। (सांझ डालने वाले की) बाँह पकड़ के (उसको माया के मोह के) अंधेरे में से निकाल लेता है। और उसको अपना बना लेता है। हे नानक ! (परमात्मा का) नाम जपते हुए (मनुष्य) आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। (नाम जपने वाले का) मन हृदय शीतल रहता है। 2। हे प्रभू ! आप सब जीवों के दिल की जानने वाला है। मैं आपके कौन-कौन से गुण बता सकता हूँ। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के जीव संसार-समुंद्र से पार लांघने-योग्य हो जाते हैं। परमात्मा के गुण गाते हुए सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। हे नानक ! जो परमात्मा सब जीवों का मालिक है। उसका नाम जप के जीव विकारों से बच जाते हैं। 3। हे भाई ! वह आँखें ही सुंदर हैं। जो परमात्मा के नाम-रस में भीगी रहती हैं। हे भाई ! प्राणों के मित्र प्रभू को मिल के प्रभू के दर्शन करने से हरेक इच्छा पूरी हो जाती है। जिस मनुष्य ने परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस प्राप्त कर लिया। उसको माया के सारे स्वाद फीके प्रतीत होते हैं। हे नानक ! (नाम-रस प्राप्त कर लेने वाले की) जीवात्मा परमात्मा की ज्योति में (इस प्रकार) एक-मेक हो जाती है। (जैसे) पानी पानी में मिल जाता है। 4। 2। 5। 9।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर वह सुखों का समुंद्र प्रभू मिल जाए।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।