सुख सागर प्रभु पाईऐ जब होवै भागो राम ॥
माननि मानु वञाईऐ हरि चरणी लागो राम ॥
छोडि सिआनप चातुरी दुरमति बुधि तिआगो राम ॥
नानक पउ सरणाई राम राइ थिरु होइ सुहागो राम ॥1॥
सो प्रभु तजि कत लागीऐ जिसु बिनु मरि जाईऐ राम ॥
लाज न आवै अगिआन मती दुरजन बिरमाईऐ राम ॥
पतित पावन प्रभु तिआगि करे कहु कत ठहराईऐ राम ॥
नानक भगति भाउ करि दइआल की जीवन पदु पाईऐ राम ॥2॥
स्री गोपालु न उचरहि बलि गईए दुहचारणि रसना राम ॥
प्रभु भगति वछलु नह सेवही काइआ काक ग्रसना राम ॥
भ्रमि मोही दूख न जाणही कोटि जोनी बसना राम ॥
नानक बिनु हरि अवरु जि चाहना बिसटा क्रिम भसमा राम ॥3॥
लाइ बिरहु भगवंत संगे होइ मिलु बैरागनि राम ॥
चंदन चीर सुगंध रसा हउमै बिखु तिआगनि राम ॥
ईत ऊत नह डोलीऐ हरि सेवा जागनि राम ॥
नानक जिनि प्रभु पाइआ आपणा सा अटल सुहागनि राम ॥4॥1॥4॥
हरि खोजहु वडभागीहो मिलि साधू संगे राम ॥
गुन गोविद सद गाईअहि पारब्रहम कै रंगे राम ॥
सो प्रभु सद ही सेवीऐ पाईअहि फल मंगे राम ॥
नानक प्रभ सरणागती जपि अनत तरंगे राम ॥1॥
इकु तिलु प्रभू न वीसरै जिनि सभु किछु दीना राम ॥
वडभागी मेलावड़ा गुरमुखि पिरु चीन॑ा राम ॥
बाह पकड़ि तम ते काढिआ करि अपुना लीना राम ॥
नामु जपत नानक जीवै सीतलु मनु सीना राम ॥2॥
किआ गुण तेरे कहि सकउ प्रभ अंतरजामी राम ॥
सिमरि सिमरि नाराइणै भए पारगरामी राम ॥
गुन गावत गोविंद के सभ इछ पुजामी राम ॥
नानक उधरे जपि हरे सभहू का सुआमी राम ॥3॥
रस भिंनिअड़े अपुने राम संगे से लोइण नीके राम ॥
प्रभ पेखत इछा पुंनीआ मिलि साजन जी के राम ॥
अंम्रित रसु हरि पाइआ बिखिआ रस फीके राम ॥
नानक जलु जलहि समाइआ जोती जोति मीके राम ॥4॥2॥5॥9॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर वह सुखों का समुंद्र प्रभू मिल जाए।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।