अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 छंत सतिगुर प्रसादि ॥ हे सहेलिए ! आएँ (मिल के बैठें) हे सहेलिए ! आएँ प्रभू की रजा में चलें। और प्रभू-पति की सिफत सालाह का गीत गाएं। हे सहेलिए ! (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर। शायद (इस तरह) हम अपने प्रीतम प्रभू को अच्छी लग सकें। हे सहेलिए ! (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर। मोह दूर कर। माया के प्यार वाला विकार दूर कर। सिर्फ निर्लिप प्रभू की शरण पड़ी रह। सारे पापों के नाश करने वाले दया के श्रोत प्रीतम प्रभू के चरणों की औट पकड़े रख। मैं (प्रभू के) दासों की दासी बन के। (सिफत सालाह की ओर से) उपरामता त्याग के बार-बार और तरफ ना भटकता फिरूँ। नानक बिनती करता है- हे सहेलिए ! (मेरे ऊपर भी) मेहर कर। (आप मेहर करे)। तब ही मैं (भी) सिफत-सालाह के गीत गा सकूँगा। 1। हे भाई ! परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम मेरे जीवन के लिए सहारा है जैसे अंधे को छड़ी का सहारा होता है। (क्योंकि) वह मन को फसाने वाली सुंदरी माया कई तरीकों से (जीवों को) ताड़ती (ताकती) रहती है (और अपने मोह में अंधा कर लेती है)। हे भाई ! कई रंगों वाली और मन को मोहने वाली चंचल माया (जीवों को) अनेकों नखरे दिखाती रहती है। ढीठ बन के (भाव। बार-बार अपने हाव-भाव दिखा के। आखिर जीवों को) प्यारी लगने लग जाती है। (इस मोहनी माया के असर तले परमात्मा का) नाम नहीं जपा जा सकता। हे भाई ! गृहस्त में (गृहस्तियों को) जंगलों में (त्यागियों को)। तीर्थों के किनारे (तीर्थ-स्नानियों को)। व्रत (रखने वालों को) देव-पूजा (करने वालों को)। राहों में। पक्तनों पर (हर जगह माया अपनी) ताक में रहती है। नानक विनती करता है- (हे प्रभू ! मेरे पर) मेहर कर (इस माया की ताक से बचने के लिए) मुझे अपना नाम (का सहारा दिए रख। जैसे) अंधे को छड़ी का सहारा होता है। 2। हे प्यारे पति-प्रभू ! जैसे हो सके। (इस मोहनी माया के पंजे से) मुझ निमाणे को (बचा के) रख। मेरे अंदर कोई समझदारी नहीं कि मैं (कुछ) मुँह से कह के आपको प्रसन्न कर सकूँ। हे प्यारे नाथ ! मैं चतुर नहीं। मैं उक्तम मानिसक घाड़त वाली नहीं। मैं समझदार नहीं। मैं बढ़िया सूझ वाली नहीं। मुझ गुण-हीन में (कोई भी) गुण नहीं। ना मेरा सुंदर रूप है। ना (मेरे अंदर अच्छे गुणों वाली) सुगंधि है ना ही मेरे बाँके नयन हैं – जहाँ आपकी रज़ा हैं वहां ही मुझे (इस मोहनी माया से) बचा ले। हे तरस के मालिक प्रभू ! (आप ऐसा है) जिसकी सारे जीव जै-जैकार करते हैं। आप कैसा है- किसी ने भी यह भेद नहीं समझा। नानक बिनती करता है- हे प्रभू ! (मैं आपका) सेवक हूँ (मुझे अपनी) सेवा-भक्ति (दे) जैसे भी हैं सके। मुझे (इस मोहनी माया से) बचाए रख। 3। हे प्रभू ! मुझ मछली (के लिए) आप (आपका नाम) पानी (के तुल्य) है। आपके बिना (आपकी याद के बग़ैर) मेरा जीवन संभव नहीं। हे प्रभू ! मुझ पपीहे (के लिए) आप (आपका नाम) बरखा की बूँद है। मुझे (तब) शांति आती है (जब नाम-बूँद मेरे) मुँह में पड़ती है। (जैसे बरसात की बूँद पपीहे के मुँह में पड़ती है तो वह बूँद उसकी प्यास दूर कर देती है। वैसे ही जब आपके नाम की बूँद मेरे) मुँह में पड़ती है तो वह (मेरे अंदर से माया की) तृष्णा दूर कर देती है। हे मेरी जिंद के मालिक ! हे मेरे दिल के साई ! हे मेरे प्राणों के नाथ ! हे प्यारे ! प्यार भरे करिश्मे करके आप सारी सृष्टि में (बस रहा है। हे प्यारे ! मुझे) मिल। ताकि मेरी उच्च आत्मिक अवस्था बन सके। हे प्रभू ! जैसे चकवी आस बनाए रखती है कि दिन चढ़ रहा है। वैसे मैं भी (आपका मिलाप ही) चितारती रहती है (और। कहती रहती है-) हे अंधकार ! (माया के मोह के अंधेर ! मेरे अंदर से) दूर हो जा। नानक विनती करता है- हे प्यारे (मुझे अपने) साथ मिला ले। (मैं) मछली को (आपका नाम-) पानी भूल नहीं सकता। 4। हे सहेलिए ! (मेरे हृदय-) घर में मेरा (प्रभू) पति आ बसा है। मेरे भाग्य जाग पड़े हैं। (मेरे इस शरीर-घर के) दरवाजे (सारी ज्ञान इन्द्रियां) सुंदर बन गए हैं (भाव। अब ये ज्ञानेन्दियां विकारों की ओर नहीं खींचतीं। मेरा) सारा हृदय-जंगल आत्मिक जीवन वाला हो गया है। हे सहेलिए ! आत्मिक जीवन से भरपूर और सुखों की दाति देने वाला मालिक-प्रभू (मेरे हृदय-घर में आ बसा है। जिसके सदका मेरे अंदर) आनंद की अनुभूति बन गई है। खुशियों ने डेरा डाल दिया है। बहुत मजे बन गए हैं। मेरा सुकुमार पति सदैव नवीन एवं बड़ा सुन्दर है, फिर मैं अपनी जीभ से उसके कौन-से गुण बखान करूँ ? हे सहेलिए ! मेरा पति-प्रभू हर वक्त नया है जवान है (भाव। उसका प्यार कभी कमजोर नहीं पड़ता)। मैं (अपनी) जीभ से (उसके) कौन-कौन से गुण बताऊँ। नानक विनती करता है- (हे सहेलिए ! पति-प्रभू के मेरे हृदय में आ बसने से) मेरी हृदय-सेज सज गई है। (उस प्रभू-पति का) दर्शन करके मैं मस्त हो रही हूँ (उसने मेरे अंदर से) हरेक सहम और दुख दूर कर दिया है। मुझे बेअंत मालिक-प्रभू मिल गया है। मेरी हरेक आशा पूरी हो गई है। 5। 3।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 छंत मंगल सतिगुर प्रसादि ॥ सलोक- हे नानक ! प्रभू-पति सुंदर है शांति-रूप है। दया का श्रोत है और सारे सुखों का खजाना है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “बिलावलु महला 5 छंत सतिगुर प्रसादि ॥ हे सहेलिए ! आएँ (मिल के बैठें) हे सहेलिए ! आएँ प्रभू की रजा में चलें।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।