गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: सारे सुख देने वाला आप (खुद ही उनको अपने चरणों में) मिला लेता है। हे भाई ! एक परमात्मा के बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह इस बात को समझ लेता है। (उसको आत्मिक जीवन की सूझ आ जाती है)। 9। हे भाई ! (जैसे) पंद्रह तिथियाँ और सात वार। महीने। ऋतुएं। बार बार आते रहते हैं। रात-दिन। जैसा यह संसार है करतार ने (खुद ही जीवों के वास्ते) जनम-मरण का चक्कर बना दिया है। अटल रहने वाला सदा-स्थिर प्रभू ही है जो (सारी सृष्टि में अपनी) सक्ता टिका रहा है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई (भाग्यशाली) मनुष्य (गुरू के) शबद को (अपने) मन में बसा के (इस बात को) समझ लेता है। 10। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 3 ॥ हे भाई ! सारे जगत का मूल अकाल पुरख स्वयं ही जगत को पैदा करता है। (किए कर्मों के अनुसार) जीवों को (उसने) माया के मोह में जोड़ा हुआ है। (जीव परमात्मा को भुला के) और प्यार में दिखाई देते जगत के मोह में फंसे रहते हैं। (ऐसे) भाग्यहीन जीव जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। आत्मिक मौत सहेड़े रखते हैं। अगर (किसी भाग्यशाली को) गुरू मिल जाए। तो वह (आत्मिक जीवन की) समझ हासिल कर लेता है। (उसके अंदर से) जगत का मोह समाप्त हो जाता है। (वह मनुष्य) सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की) याद में लीन रहता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे पर (मनुष्य के किए कर्मों के अनुसार परमात्मा की ओर से) लेख लिखा होता है। उस (मनुष्य) के मन में एक परमात्मा (ही) टिका रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जगत पैदा करके (परमात्मा) स्वयं ही हरेक की संभाल करता है। (हे प्रभू ! जीव के किए कर्मों के अनुसार उसके माथे पर जो लेख आप लिखता है) आपके (उस लिखे) लेख को कोई जीव (अपने उद्यम से) मिटा नहीं सकता। हे भाई ! (अपने अहंकार के आसरे) अगर कोई मनुष्य (अपने आप को) सिद्ध कहलवाता है। साधक कहता कहलवाता है। वह मनुष्य (अहंकार की) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। हे भाई ! जो मनुष्य (अपने अहंकार का आसरा छोड़ के) गुरू की शरण पड़ता है। वह मनुष्य (जीवन का) सही रास्ता समझ लेता है। जब मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को मिटाता है। तब (उसको परमात्मा का) दर दिखाई दे जाता है। 2। हे भाई ! (परमात्मा से) अलग दिख रहा ये सारा जगत एक परमात्मा से ही बना है। (सारे जगत में) एक प्रभू ही मौजूद है। (उसके बिना) कोई और दूसरा नहीं। अगर (मनुष्य) इस अलग दिखाई दे रहे जगत (के मोह) से (ऊँचा हो के) एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाले रखें। तो गुरू के शबद की बरकति से राहदारी समेत (बिना रोक-टोक के) प्रभू के दर पर (पहुँच जाता है)। अगर (मनुष्य को) गुरू मिल जाए। तो वह उस परमात्मा का मिलाप प्राप्त कर लेता है। और (अपने) अंदर से अलग दिख रहे जगत का मोह रोके रखता है। 3। हे भाई ! (माया के कामादिक सूरमे हैं तो बड़े बली। पर) जिस मनुष्य के सिर पर रक्षक सबसे बलशाली मालिक-प्रभू स्वयं हो। उसको कोई (कामादिक वैरी) परास्त नहीं सकता। (क्योंकि) सेवक (अपने) मालिक प्रभू की शरण पड़ा रहता है। वह स्वयं ही (उस पर) बख्शिश करता है। (और। उसको) आदर देता है। हे भाई ! उस (परमात्मा) से बड़ा और कोई नहीं है (सेवक को ये यकीन बन जाता है। इस वास्ते) किसी से नहीं डरता। उसको किसी (कामादिक वैरी) का डर-दबाव नहीं रहतां4। हे भाई ! गुरू की मति पर चल के (भाग्यशाली मनुष्य के) हृदय में शांति पैदा हो जाती है। गुरू के शबद के साथ सांझ डाल के उसको (कामादिक वैरी से कोई) कलेश नहीं छू सकता। वह मनुष्य जनम मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। वह (इस चक्कर के) दुख नहीं सहता। हे भाई ! परमात्मा के नाम में रंगे हुए मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (परमात्मा को अपने) अंग-संग बसता देखता है (और कहता है कि) मेरा परमात्मा सदा हर जगह मौजूद है। 5। कई (जीवों को उसने अपने) सेवक बनाया हुआ है। और कई जीवों को भटकना में (डाल के) गलत राह पर डाला हुआ है। हे भाई ! (सब जीवों में व्यापक हो के) परमात्मा खुद ही (सब कुछ) करता है। स्वयं ही (जीवों से) करवाता है। (हर जगह) परमात्मा खुद ही मौजूद है। (उसके बिना) और कोई नहीं। (किसी को गुरमुख और किसी को मनमुख देख के) मन में गिला तो ही किया जाए अगर (परमात्मा के बिना कहीं) कोई और हो। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़े रहते हैं। वे मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के दर पर सुर्ख-रू होते हैं। विचारवान (माने जाते) हैं (गुरू की शरण पड़े रहना ही) सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य है। 6। हे भाई ! (लोग खास-खास तिथियों और वारों को पवित्र मान के खास-खास धार्मिक कर्म करते हैं और खास-खास फल मिलने की आशा रखते हैं। पर) सारी तिथियाँ और सारे वार (तब ही) सुंदर हैं (उक्तम हैं) (अगर मनुष्य गुरू के) शबद में (जुड़े रहें)। (मनुष्य) गुरू की शरण पड़े। तब ही (मानस जीवन का श्रेष्ठ फल) हासिल करता है। यह तिथियाँ ये वार सारे आते हैं और गुज़र जाते हैं। गुरू का शबद (ही) अटल रहने वाला है (शबद की बरकत से मनुष्य) सदा कायम रहने वाले परमात्मा में सदा लीन रह सकते हैं। (यह) तिथियाँ और वार तब ही (मानवता के भले के लिए होते हैं) जब मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा के नाम से टूटे हुए सारे जीव कमजोर आत्मिक जीवन वाले (होने के कारण) भटकते रहते हैं। 7। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। आत्मिक मौत मर के (जगत से) खराब आत्मिक हालत में ही जाते हैं (क्योंकि) वह (कभी) परमातमा का सिमरन नहीं करते; और माया के मोह में ही फसे रहते हैं। हे भाई ! मूर्ख मति वाला मनुष्य। आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझ मनुष्य। माया के मोह में अंधा हुआ मनुष्य (विकारों भरे संसार-समुंद्र का) उस पार का किनारा नहीं पा सकता (वह सदा विकारों में ही डूबा रहता है)। (पर। जीव के वश की बात नहीं)। (जीवों को) पैदा करने की समर्था वाले परमात्मा ने खुद (ही जीवों को) पैदा किया है। (उसने) स्वयं ही (सही जीवन के बारे में) गुरू का (बताया) विचार बनाया हुआ है (गुरू के बताए रास्ते पर वह खुद ही जीवों को चलाता है)। 8। हे भाई ! सिर्फ धार्मिक पहरावे का आसरा लेने वाले मनुष्य अनेकों भेष करते रहते हैं। (तीर्थों आदि कई जगहों पर) भटक-भटक के चलते-फिरते हैं। (ऐसे मनुष्य) कच्ची नरदों (की तरह विकारों से मार खाते ही रहते हैं) उनको आत्मिक आनंद ना तो इस लोक में मिलता है ना ही परलोक में मिलता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारे सुख देने वाला आप (खुद ही उनको अपने चरणों में) मिला लेता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।