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अंग 83

अंग
83
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीराग की वार महला 4 सलोका नालि ॥
सलोक मः 3 ॥
रागा विचि स्रीरागु है जे सचि धरे पिआरु ॥
सदा हरि सचु मनि वसै निहचल मति अपारु ॥
रतनु अमोलकु पाइआ गुर का सबदु बीचारु ॥
जिहवा सची मनु सचा सचा सरीर अकारु ॥
नानक सचै सतिगुरि सेविऐ सदा सचु वापारु ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्री राग की वार महला 4 श्लोकों साथ ॥ श्लोक महला 3 ॥ (सभ) रागों में से श्री राग (तभी श्रेष्ठ) है, यदि (इससे जीव) सदा स्थिर नाम में प्यार (लिव) जोड़े, हरी सदा मन में बसे और अपार प्रभू (को याद करने वाली) बुद्धि अचॅल हो जाए। (इसका नतीजा ये होता है कि) गुरबाणी की विचार रूपी अमोलक रत्न प्राप्त होता है, जीभ सच्ची, मन सच्चा और मानस जनम ही सफल हो जाता है। पर, हे नानक ! ये सच्चा व्यापार तब ही किया जा सकता है अगर सदा स्थिर प्रभू के रूप गुरू के हुकम में चलें।1।
मः 3 ॥
होरु बिरहा सभ धातु है जब लगु साहिब प्रीति न होइ ॥
इहु मनु माइआ मोहिआ वेखणु सुनणु न होइ ॥
सह देखे बिनु प्रीति न ऊपजै अंधा किआ करेइ ॥
नानक जिनि अखी लीतीआ सोई सचा देइ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ जब तक मालिक के साथ प्रीति (उत्पन्न) नहीं होती, और प्यार सब माया (का प्यार) है, और माया में मोहा ये मन (प्रभू को) देख और सुन नहीं सकता। अंधा (मन) करे भी क्या? (प्रभू) पति को देखे बगैर प्रीति पैदा नहीं हो सकती। हे नानक ! (माया में फंसा के) जिस प्रभू ने अंधा किया है, वही सदा स्थिर प्रभू फिर आँखें देता है।2
पउड़ी ॥
हरि इको करता इकु इको दीबाणु हरि ॥
हरि इकसै दा है अमरु इको हरि चिति धरि ॥
हरि तिसु बिनु कोई नाहि डरु भ्रमु भउ दूरि करि ॥
हरि तिसै नो सालाहि जि तुधु रखै बाहरि घरि ॥
हरि जिस नो होइ दइआलु सो हरि जपि भउ बिखमु तरि ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे भाई ! एक ही प्रभू (सबका) करणहार व आसरा है, एक प्रभू का हुकम (चल रहा है), (इसलिए) उसको हृदय में संभाल। उस परमात्मा का कोई शरीक नहीं, (इस वास्ते) किसी और का डर व भरम दूर कर दे। (हे जीव !) उसी हरी की उस्तति कर जो आपकी सभ जगह रक्षा करता है। जिस पर परमात्मा दयाल होता है, वह जीव उस को सिमर के मुश्किल (संसार के) डर से पार होता है।
सलोक मः 1 ॥
दाती साहिब संदीआ किआ चलै तिसु नालि ॥
इक जागंदे ना लहंनि इकना सुतिआ देइ उठालि ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (सारी) दातें मालिक की हैं, उससे कोई जोर नहीं चल सकता। कई जागते जीवों को भी नहीं मिली, और कई सोये हुओं को भी उठा के (दातें) दे देता है।1।
मः 1 ॥
सिदकु सबूरी सादिका सबरु तोसा मलाइकां ॥
दीदारु पूरे पाइसा थाउ नाही खाइका ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ सिदक वालों के पास भरोसे और शुक्र की, और गुरमुखों के पास सब्र (संतोष) की राशि होती है। (इस करके) वे पूरे प्रभू के दर्शन कर लेते हैं। (पर) निरी बातें करने वालों को जगह भी नहीं मिलती।2।
पउड़ी ॥
सभ आपे तुधु उपाइ कै आपि कारै लाई ॥
तूं आपे वेखि विगसदा आपणी वडिआई ॥
हरि तुधहु बाहरि किछु नाही तूं सचा साई ॥
तूं आपे आपि वरतदा सभनी ही थाई ॥
हरि तिसै धिआवहु संत जनहु जो लए छडाई ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे हरि !) तूने स्वयं ही सारी (सृष्टि) रच के स्वयं ही काम-धंधों में लगा दी है, अपनी ये बुर्जुगी देख के भी आप स्वयं ही प्रसन्न हैं रहा है, आप सदा कायम रहने वाला प्रभू है आपसे परे कुछ भी नहीं। सभ जगह आप खुद ही व्याप रहा है। हे गुरमुखो ! उस प्रभू का सिमरन करो जो (विकारों से) छुड़ा लेता है।
सलोक मः 1 ॥
फकड़ जाती फकड़ु नाउ ॥
सभना जीआ इका छाउ ॥
आपहु जे को भला कहाए ॥
नानक ता परु जापै जा पति लेखै पाए ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जाति (का अहंकार) के नाम (बड़प्पन का अहंकार) वयर्थ हैं, (असल में) सारे जीवों की एक ही नुहार होती है (भाव, सबकी आत्मा एक ही है)। (जाति या बड़प्पन के आसरे) यदि कोई जीव अपने आप को अच्छा कहलवाए (तो वह अच्छा नहीं बन जाता)। हे नानक ! (जीव) तो ही अच्छा जाना जाता है, यदि लेखे में (भाव सच्ची दरगाह के लेखे के समय) आदर हासिल करे।1।
मः 2 ॥
जिसु पिआरे सिउ नेहु तिसु आगै मरि चलीऐ ॥
ध्रिगु जीवणु संसारि ता कै पाछै जीवणा ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ जिस प्यारे के साथ प्यार (हो), (जाति आदि का) अहंकार छोड़ के उसके सन्मुख रहना चाहिए। संसार में उससे बेमुख हो के जीना- इस जीवन को धिक्कार है।2।
पउड़ी ॥
तुधु आपे धरती साजीऐ चंदु सूरजु दुइ दीवे ॥
दस चारि हट तुधु साजिआ वापारु करीवे ॥
इकना नो हरि लाभु देइ जो गुरमुखि थीवे ॥
तिन जमकालु न विआपई जिन सचु अंम्रितु पीवे ॥
ओइ आपि छुटे परवार सिउ तिन पिछै सभु जगतु छुटीवे ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (हे परमात्मा !) तूने स्वयं ही धरती रची है और (इसके वास्ते) चंद्रमा व सूरज (जैसे) दो दिऐ (बनाए हैं), (जीवों के सच्चा) व्यापार करने के लिए चौदह (लोक जैसे) दुकानें बना दी हैं। जो जीव गुरू के सन्मुख हो गए हैं, उन्हें हरि लाभ प्रदान करता है (भाव, उनका जन्म सफल करता है) और जिन्होंने आत्मिक जीवन देने वाला सदा स्थिर नाम जल पीया है, जमकाल उनपे प्रभाव नहीं डाल सकता। वे (जमकाल से) बच जाते हैं, और उनके पद्चिन्हों पे चल के सारा संसार बच जाता है।3।
सलोक मः 1 ॥
कुदरति करि कै वसिआ सोइ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ सृष्टि (पैदा करने वाला प्रभू) स्वयं ही (इस में) बस रहा है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।