अंग
839
बिलावल
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जो देखि दिखावै तिस कउ बलि जाई ॥
जो देखि दिखावै तिस कउ बलि जाई ॥
गुर परसादि परम पदु पाई ॥1॥
किआ जपु जापउ बिनु जगदीसै ॥
गुर कै सबदि महलु घरु दीसै ॥1॥ रहाउ ॥
दूजै भाइ लगे पछुताणे ॥
जम दरि बाधे आवण जाणे ॥
किआ लै आवहि किआ ले जाहि ॥
सिरि जमकालु सि चोटा खाहि ॥
बिनु गुर सबद न छूटसि कोइ ॥
पाखंडि कीन॑ै मुकति न होइ ॥2॥
आपे सचु कीआ कर जोड़ि ॥
अंडज फोड़ि जोड़ि विछोड़ि ॥
धरति अकासु कीए बैसण कउ थाउ ॥
राति दिनंतु कीए भउ भाउ ॥
जिनि कीए करि वेखणहारा ॥
अवरु न दूजा सिरजणहारा ॥3॥
त्रितीआ ब्रहमा बिसनु महेसा ॥
देवी देव उपाए वेसा ॥
जोती जाती गणत न आवै ॥
जिनि साजी सो कीमति पावै ॥
कीमति पाइ रहिआ भरपूरि ॥
किसु नेड़ै किसु आखा दूरि ॥4॥
चउथि उपाए चारे बेदा ॥
खाणी चारे बाणी भेदा ॥
असट दसा खटु तीनि उपाए ॥
सो बूझै जिसु आपि बुझाए ॥
तीनि समावै चउथै वासा ॥
प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥5॥
पंचमी पंच भूत बेताला ॥
आपि अगोचरु पुरखु निराला ॥
इकि भ्रमि भूखे मोह पिआसे ॥
इकि रसु चाखि सबदि त्रिपतासे ॥
इकि रंगि राते इकि मरि धूरि ॥
इकि दरि घरि साचै देखि हदूरि ॥6॥
झूठे कउ नाही पति नाउ ॥
कबहु न सूचा काला काउ ॥
पिंजरि पंखी बंधिआ कोइ ॥
छेरीं भरमै मुकति न होइ ॥
तउ छूटै जा खसमु छडाए ॥
गुरमति मेले भगति द्रिड़ाए ॥7॥
खसटी खटु दरसन प्रभ साजे ॥
अनहद सबदु निराला वाजे ॥
जे प्रभ भावै ता महलि बुलावै ॥
सबदे भेदे तउ पति पावै ॥
करि करि वेस खपहि जलि जावहि ॥
साचै साचे साचि समावहि ॥8॥
सपतमी सतु संतोखु सरीरि ॥
सात समुंद भरे निरमल नीरि ॥
मजनु सीलु सचु रिदै वीचारि ॥
गुर कै सबदि पावै सभि पारि ॥
मनि साचा मुखि साचउ भाइ ॥
सचु नीसाणै ठाक न पाइ ॥9॥
असटमी असट सिधि बुधि साधै ॥
सचु निहकेवलु करमि अराधै ॥
पउण पाणी अगनी बिसराउ ॥
तही निरंजनु साचो नाउ ॥
तिसु महि मनूआ रहिआ लिव लाइ ॥
प्रणवति नानकु कालु न खाइ ॥10॥
नाउ नउमी नवे नाथ नव खंडा ॥ घटि घटि नाथु महा बलवंडा ॥
गुर परसादि परम पदु पाई ॥1॥
किआ जपु जापउ बिनु जगदीसै ॥
गुर कै सबदि महलु घरु दीसै ॥1॥ रहाउ ॥
दूजै भाइ लगे पछुताणे ॥
जम दरि बाधे आवण जाणे ॥
किआ लै आवहि किआ ले जाहि ॥
सिरि जमकालु सि चोटा खाहि ॥
बिनु गुर सबद न छूटसि कोइ ॥
पाखंडि कीन॑ै मुकति न होइ ॥2॥
आपे सचु कीआ कर जोड़ि ॥
अंडज फोड़ि जोड़ि विछोड़ि ॥
धरति अकासु कीए बैसण कउ थाउ ॥
राति दिनंतु कीए भउ भाउ ॥
जिनि कीए करि वेखणहारा ॥
अवरु न दूजा सिरजणहारा ॥3॥
त्रितीआ ब्रहमा बिसनु महेसा ॥
देवी देव उपाए वेसा ॥
जोती जाती गणत न आवै ॥
जिनि साजी सो कीमति पावै ॥
कीमति पाइ रहिआ भरपूरि ॥
किसु नेड़ै किसु आखा दूरि ॥4॥
चउथि उपाए चारे बेदा ॥
खाणी चारे बाणी भेदा ॥
असट दसा खटु तीनि उपाए ॥
सो बूझै जिसु आपि बुझाए ॥
तीनि समावै चउथै वासा ॥
प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥5॥
पंचमी पंच भूत बेताला ॥
आपि अगोचरु पुरखु निराला ॥
इकि भ्रमि भूखे मोह पिआसे ॥
इकि रसु चाखि सबदि त्रिपतासे ॥
इकि रंगि राते इकि मरि धूरि ॥
इकि दरि घरि साचै देखि हदूरि ॥6॥
झूठे कउ नाही पति नाउ ॥
कबहु न सूचा काला काउ ॥
पिंजरि पंखी बंधिआ कोइ ॥
छेरीं भरमै मुकति न होइ ॥
तउ छूटै जा खसमु छडाए ॥
गुरमति मेले भगति द्रिड़ाए ॥7॥
खसटी खटु दरसन प्रभ साजे ॥
अनहद सबदु निराला वाजे ॥
जे प्रभ भावै ता महलि बुलावै ॥
सबदे भेदे तउ पति पावै ॥
करि करि वेस खपहि जलि जावहि ॥
साचै साचे साचि समावहि ॥8॥
सपतमी सतु संतोखु सरीरि ॥
सात समुंद भरे निरमल नीरि ॥
मजनु सीलु सचु रिदै वीचारि ॥
गुर कै सबदि पावै सभि पारि ॥
मनि साचा मुखि साचउ भाइ ॥
सचु नीसाणै ठाक न पाइ ॥9॥
असटमी असट सिधि बुधि साधै ॥
सचु निहकेवलु करमि अराधै ॥
पउण पाणी अगनी बिसराउ ॥
तही निरंजनु साचो नाउ ॥
तिसु महि मनूआ रहिआ लिव लाइ ॥
प्रणवति नानकु कालु न खाइ ॥10॥
नाउ नउमी नवे नाथ नव खंडा ॥ घटि घटि नाथु महा बलवंडा ॥
हिन्दी अर्थ: मैं उस (गुरू) से सदके जाता हूँ जो (हरेक शरीर में प्रभू को) देख के (औरों को भी) दिखा देता है। गुरू की कृपा से (ही उसके हरेक शरीर में दर्शन करने की) ऊँची से ऊँची पदवी मैं प्राप्त कर सकता हूँ। 1। जगत के मालिक परमात्मा के सिमरन के बिना मैं और कोई भी जाप नहीं जपता। गुरू के शबद में जुड़ के (परमात्मा का सिमरन करने से परमात्मा का) दर-घर दिख सकता है (परमातमा के चरणों में टिक सकते हैं।) 1। रहाउ। जो जीव (परमात्मा को बिसार के) किसी अन्य मोह में फंसे रहते हैं वह (आखिर) पछताते हैं। वे जमराज के दर पर बँधे रहते हैं। उनके जनम-मरण का चक्कर बना रहता है। जगत में खाली हाथ आते हैं (भाव। सिमरन सेवा आदि की आत्मिक राशि-पूँजी तो इकट्ठी ना की। व और जोड़ा हुआ कमाया धन-पदार्थ जगत में ही रह गया)। उनके सिर पर आत्मिक मौत (हर वक्त खड़ी रहती है) और वे (नित्य इस आत्मिक मौत की) चोटें सहते रहते हैं। गुरू के शबद के बिना कोई मनुष्य आत्मिक मौत से नहीं बच सकता। पाखण्ड करने से (बाहर से धार्मिक भेस बनाने से) विकारों से खलासी नहीं मिल सकती। 2। हे भाई ! (परमात्मा) स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। (ये ब्रहमण्ड उस सदा स्थिर प्रभू ने) हुकम करके (स्वयं ही) पैदा किया है। इस ब्रहमण्ड को नाश करके। (फिर) पैदा करके। (फिर) नाश करके (फिर आप ही पैदा कर देता है)। हे भाई ! (ये) धरती (और) आकाश (परमात्मा ने जीवों के) बसने के लिए जगह बनाई है। (परमात्मा ने स्वयं ही) दिन और रात बनाए हैं। (जीवों के अंदर) डर और प्यार (भी परमात्मा ने खुद ही पैदा किए हैं)। हे भाई ! जिस (परमात्मा) ने (सारे जीव) पैदा किए हैं। (इनको) पैदा करके (स्वयं ही इनकी) सम्भाल करने वाला है। हे भाई ! (परमात्मा के बिना) कोई और दूसरा (इस ब्रहिमण्ड को) पैदा करने वाला नहीं। 3। परमात्मा ने ही ब्रहमा। विष्णु और शिव को पैदा किया। परमात्मा ने ही देवियाँ-देवते आदि अनेकों हस्तियाँ पैदा कीं। दुनियां को रौशन करने वाली इतनी हस्तियां उसने पैदा की हैं कि उनकी गिनती नहीं हो सकती। जिस परमात्मा ने (ये सारी सृष्टि) पैदा की है वह (ही) इसकी कद्र जानता है (भाव। इससे प्यार करता है। और) इसमें हर जगह मौजूद (इसकी सम्भाल करता) है। मैं क्या बताऊँ कि किस के वह परमात्मा नजदीक है और किस से दूर। (भाव। परमात्मा ना किसी के नजदीक है ना ही किसी से दूर। हरेक में एक-समान व्यापक है)। 4। परमात्मा ने स्वयं ही चार वेद पैदा किए हैं। स्वयं ही (जगत उत्पक्ति की) चार खाणियां पैदा की हैं और खुद ही जीवों की अलग-अलग बोलियां बना दी हैं। अकाल पुरख ने खुद ही अठारह पुराण छे शास्त्र और (माया के) तीन (गुण) पैदा किए हैं। इस भेद को वही मनुष्य समझता है जिस को परमात्मा खुद समझ बख्शे। जो माया के तीन गुणों का प्रभाव मिटा के आत्मिक अडोलता में टिका रहता है नानक विनती करता है- मैं उस मनुष्य का दास हूँ । 5। उसके पैदा किए हुए जो जीव पाँच तत्वों में ही प्रवृक्त हैं वे सही जीवन जाच से टूटे हुए हैं। पर सर्व-व्यापक (पुरख) परमात्मा स्वयं तो ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है और निर्लिप है (ऐसे) अनेकों जीव भटकना के कारण तृष्णा-अधीन हैं। माया के मोह में फंसे हुए हैं। पर कई ऐसे (भाग्यशाली) हैं जो (परमात्मा के नाम का) स्वाद चख के गुरू के शबद में जुड़ के माया की ओर से तृप्त हैं। और परमात्मा के नाम-रंग में रंगे हुए हैं। पर एक ऐसे हैं जो आत्मिक मौत सहेड़ के मिट्टी हुए पड़े हैं (बिल्कुल ही जीवन गवा चुके हैं)। एक ऐसे हैं जो प्रभू को अपने अंग-संग देख के उस सदा स्थिर प्रभू के दर पे टिके रहते हैं उसके चरणों में जुड़े रहते हैं। 6। जो मनुष्य दुनियावी पदार्थों का ही प्रेमी बना रहता है। उसको (लोक-परलोक में कहीं भी) आदर-सम्मान नसीब नहीं होता। जिस मनुष्य का मन विकारों से कौए की तरह काला हो जाए वह (माया में फंसा रह के) कभी भी पवित्र नहीं हो सकता। कोई पक्षी पिंजरे में कैद हो जाए। वह पिंजरे की विरलों में चाहे भटकता फिरे (पर। इस तरह वह पिंजरें की) कैद में से निकल नहीं सकता। तब ही पिंजरे में से आजाद होंगे जब उसका मालिक उसको आजादी देगा (वैसे ही माया के मोह में कैद जीव को मालिक प्रभू खुद ही खलासी देता है)। प्रभू उसको गुरू की मति से जोड़ता है। अपनी भक्ति उसके हृदय में पक्की कर देता है। 7। प्रभू को मिलने के लिए (जोगी-सन्यासी आदि) छे भेष बनाए गए। पर एक-रस सिफत-सालाह का शबद (का बाजा इन भेखों के बाजे से) अलग ही बजता है (भिन्न प्रभाव डालता है)। अगर प्रभू को (कोई भाग्यशाली) भा जाए। तो उसको प्रभू अपने चरणों में जोड़ लेता है। जब कोई मनुष्य सिफत सालाह की बाणी के द्वारा (अपने मन को प्रभू की याद में) परो लेता है। तब वह (प्रभू की हजूरी में) आदर-सम्मान पाता है। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के नाम सिमरन से सदा-स्थिर प्रभू का रूप हो जाते हैं वे सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो जाते हैं। पर। (भेखी साध) धार्मिक भेष कर-कर के ही खपते रहते हैं और (तृष्णा की अग्नि में) जलते रहते हैं। 8। जिस मनुष्य के अंदर दूसरों की सेवा व संतोख (पलते) हैं। जिस मनुष्य की पाँचों ज्ञान-इन्द्रियां मन व बुद्धि परमात्मा के पवित्र नाम-जल से पवित्र भरपूर हो जाती हैं। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को अपने दिल में टिका के (अंतर-आत्मे) पवित्र-आचरण-रूप स्नान करता रहता है। वह मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से सभी को (भाव पाँचों ज्ञान-इन्द्रियां मन व बुद्धि को विकारों के प्रभाव से बचा के) पार लंघा लेता है। जिस मनुष्य के मन में सदा-स्थिर प्रभू बसता है। जिस मनुष्य की जीभ पर सदा-स्थिर प्रभू ही बसता है जो सदा प्रभू के प्रेम में लीन रहता है। सदा-स्थिर नाम उसके पास (जीवन-यात्रा में) राहदारी है। इस राहदारी के कारण (उसके रास्ते में विकार आदि की कोई) रोक व्यवधान नहीं पड़ता। 9। जो मनुष्य (जोगियों वाली) आठ सिद्धियां हासिल करने की चाहत रखने वाली बुद्धि को अपने काबू में रखता है (भाव। जो मनुष्य सिद्धियाँ प्राप्त करने की लालसा से ऊपर रहता है)। जो पवित्र-स्वरूप सदा-स्थिर प्रभू को उसकी मेहर से (सदा) सिमरता है। जिसके हृदय में रजो। सतो और तमो गुण का अभाव रहता है। उसके हृदय में निर्लिप परमात्मा बसता है। सदा-स्थिर प्रभू का नाम बसता है। जिस मनुष्य का मन उस अकाल-पुरख में सदा लीन रहता है। नानक कहता है। उसको आत्मिक मौत नहीं खाती (आत्मिक मौत उसके आत्मिक जीवन को बर्बाद नहीं करती)। 10। जोगियों के नौ नाथ और धरती के सारे जीव जिसका नाम जपते हैं। (असल) नाथ (वह प्रभू है जो) हरेक शरीर में व्यापक है। जो महाबली है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८३९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।