नानका नामु धिआइ ॥1॥
दीना नाथ दइआल मेरे सुआमी दीना नाथ दइआल ॥
जाचउ संत रवाल ॥1॥ रहाउ ॥
संसारु बिखिआ कूप ॥
तम अगिआन मोहत घूप ॥
गहि भुजा प्रभ जी लेहु ॥
हरि नामु अपुना देहु ॥
प्रभ तुझ बिना नही ठाउ ॥
नानका बलि बलि जाउ ॥2॥
लोभि मोहि बाधी देह ॥
बिनु भजन होवत खेह ॥
जमदूत महा भइआन ॥
चित गुपत करमहि जान ॥
दिनु रैनि साखि सुनाइ ॥
नानका हरि सरनाइ ॥3॥
भै भंजना मुरारि ॥
करि दइआ पतित उधारि ॥
मेरे दोख गने न जाहि ॥
हरि बिना कतहि समाहि ॥
गहि ओट चितवी नाथ ॥
नानका दे रखु हाथ ॥4॥
हरि गुण निधे गोपाल ॥
सरब घट प्रतिपाल ॥
मनि प्रीति दरसन पिआस ॥
गोबिंद पूरन आस ॥
इक निमख रहनु न जाइ ॥
वड भागि नानक पाइ ॥5॥
प्रभ तुझ बिना नही होर ॥
मनि प्रीति चंद चकोर ॥
जिउ मीन जल सिउ हेतु ॥
अलि कमल भिंनु न भेतु ॥
जिउ चकवी सूरज आस ॥
नानक चरन पिआस ॥6॥
जिउ तरुनि भरत परान ॥
जिउ लोभीऐ धनु दानु ॥
जिउ दूध जलहि संजोगु ॥
जिउ महा खुधिआरथ भोगु ॥
जिउ मात पूतहि हेतु ॥
हरि सिमरि नानक नेत ॥7॥
जिउ दीप पतन पतंग ॥
जिउ चोरु हिरत निसंग ॥
मैगलहि कामै बंधु ॥
जिउ ग्रसत बिखई धंधु ॥
जिउ जूआर बिसनु न जाइ ॥
हरि नानक इहु मनु लाइ ॥8॥
कुरंक नादै नेहु ॥
चात्रिकु चाहत मेहु ॥
जन जीवना सतसंगि ॥
गोबिदु भजना रंगि ॥
रसना बखानै नामु ॥
नानक दरसन दानु ॥9॥
गुन गाइ सुनि लिखि देइ ॥
सो सरब फल हरि लेइ ॥
कुल समूह करत उधारु ॥
संसारु उतरसि पारि ॥
हरि चरन बोहिथ ताहि ॥
मिलि साधसंगि जसु गाहि ॥
हरि पैज रखै मुरारि ॥
हरि नानक सरनि दुआरि ॥10॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकम एकंकारु निराला ॥
अमरु अजोनी जाति न जाला ॥
अगम अगोचरु रूपु न रेखिआ ॥
खोजत खोजत घटि घटि देखिआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मेहर करके मुझे अपने लड़ लगा ले की नानक ! प्रभू आपका नाम सिमरा करे।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।