Lulla Family

अंग 840

अंग
840
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आई पूता इहु जगु सारा ॥
प्रभ आदेसु आदि रखवारा ॥
आदि जुगादी है भी होगु ॥
ओहु अपरंपरु करणै जोगु ॥11॥
दसमी नामु दानु इसनानु ॥
अनदिनु मजनु सचा गुण गिआनु ॥
सचि मैलु न लागै भ्रमु भउ भागै ॥
बिलमु न तूटसि काचै तागै ॥
जिउ तागा जगु एवै जाणहु ॥
असथिरु चीतु साचि रंगु माणहु ॥12॥
एकादसी इकु रिदै वसावै ॥
हिंसा ममता मोहु चुकावै ॥
फलु पावै ब्रतु आतम चीनै ॥
पाखंडि राचि ततु नही बीनै ॥
निरमलु निराहारु निहकेवलु ॥
सूचै साचे ना लागै मलु ॥13॥
जह देखउ तह एको एका ॥
होरि जीअ उपाए वेको वेका ॥
फलोहार कीए फलु जाइ ॥
रस कस खाए सादु गवाइ ॥
कूड़ै लालचि लपटै लपटाइ ॥
छूटै गुरमुखि साचु कमाइ ॥14॥
दुआदसि मुद्रा मनु अउधूता ॥
अहिनिसि जागहि कबहि न सूता ॥
जागतु जागि रहै लिव लाइ ॥
गुर परचै तिसु कालु न खाइ ॥
अतीत भए मारे बैराई ॥
प्रणवति नानक तह लिव लाई ॥15॥
दुआदसी दइआ दानु करि जाणै ॥
बाहरि जातो भीतरि आणै ॥
बरती बरत रहै निहकाम ॥
अजपा जापु जपै मुखि नाम ॥
तीनि भवण महि एको जाणै ॥
सभि सुचि संजम साचु पछाणै ॥16॥
तेरसि तरवर समुद कनारै ॥
अंम्रितु मूलु सिखरि लिव तारै ॥
डर डरि मरै न बूडै कोइ ॥
निडरु बूडि मरै पति खोइ ॥
डर महि घरु घर महि डरु जाणै ॥
तखति निवासु सचु मनि भाणै ॥17॥
चउदसि चउथे थावहि लहि पावै ॥
राजस तामस सत काल समावै ॥
ससीअर कै घरि सूरु समावै ॥
जोग जुगति की कीमति पावै ॥
चउदसि भवन पाताल समाए ॥ खंड ब्रहमंड रहिआ लिव लाए ॥18॥
अमावसिआ चंदु गुपतु गैणारि ॥
बूझहु गिआनी सबदु बीचारि ॥
ससीअरु गगनि जोति तिहु लोई ॥
करि करि वेखै करता सोई ॥
गुर ते दीसै सो तिस ही माहि ॥
मनमुखि भूले आवहि जाहि ॥19॥
घरु दरु थापि थिरु थानि सुहावै ॥
आपु पछाणै जा सतिगुरु पावै ॥
जह आसा तह बिनसि बिनासा ॥
फूटै खपरु दुबिधा मनसा ॥
ममता जाल ते रहै उदासा ॥ प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥20॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (वह नाथ-प्रभू सारे जगत का माँ है) यह सारा जगत उस मां (-नाथ-प्रभू) की संतान है (का पैदा किया हुआ है)। उस प्रभू को ही नमस्कार करना चाहिए। वह सबका आदि है। युगों के आरम्भ से ही है। अब भी है और सदा के लिए रहेगा। वह प्रभू-नाथ परे से परे है (उसका पार नहीं पाया जा सकता) वह सब कुछ करने की ताकत रखता है। 11। परमात्मा का नाम जपना ही दसवीं तिथि पर दान करना और स्नान करना है। प्रभू के गुणों से गहरी सांझ ही सदा स्थिर रहने वाला नित्य का तीर्थ-स्नान है। सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ने से (मन को विकारों की) मैल नहीं लगती। मन की भटकना दूर हो जाती है। मन का सहम समाप्त हो जाता है (ऐसे तुरंत खत्म होता है। जैसे) कच्चे धागे को टूटते हुए विलम्ब नहीं लगता। (हे भाई !) जगत (के संबंध) को ऐसे ही समझो जैसे कच्चा धागा है; अपने मन को हमेशा सदा-स्थिर प्रभू-नाम में टिका के रखो। और आत्मिक आनंद लो। 12। जो मनुष्य एक (परमात्मा) को (अपने) हृदय में बसाता है। (वह मनुष्य अपने अंदर से) निदर्यता। माया का अपनत्व और माया का मोह दूर कर लेता है। (जो मनुष्य हिंसा-मोह आदि से बचे रहने वाला यह) व्रत (रखता है। वह इस वर्त का ये) फल प्राप्त करता है कि (हमेशा) अपने आत्मिक जीवन को परखता रहता है। पर दिखावे (के व्रत) में पतीज के मनुष्य (सारे जगत के) मूल (परमात्मा को) नहीं देख सकता। परमात्मा को किसी भोजन की जरूरत नहीं (वह हर वक्त व्रतमय है)। परमात्मा शुद्ध-स्वरूप है। हे भाई ! परमात्मा को विकारों की मैल नहीं लगती। (जो मनुष्य उस) पवित्र प्रभू में (जुड़ के) उस सदा-स्थिर प्रभू का रूप हो जाते हैं। उनको (भी विकारों की) मैल नहीं लगती। 13। मैं जिधर देखता हूँ। उधर एक परमात्मा ही परमात्मा दिखता है। (उसने) भांति-भांति के ये सारे जीव पैदा किए हुए हैं (जो व्रत आदि कई भ्रमों में पड़े रहते हैं)। हे भाई ! (एकादशी वाले दिन अन्न छोड़ के) सिर्फ फल खाने से (व्रत का असल) फल नहीं मिलता (असल व्रत है ‘विकारों से परहेज़’। उसका फल है ‘उच्च आत्मिक जीवन)। (अन्न की जगह) कई स्वादिष्ट फल आदि पदार्थ (जो मनुष्य) खाता है। (वह तो वैसे ही व्रत का) मज़ा गवा लेता है। (व्रत रखने वाला मनुष्य व्रत के फल की आस धार के) माया की लालच में ही फसा रहता है। (इस लालच से वह मनुष्य) खलासी हासिल करता है जो गुरू की शरण पड़ कर सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरन की कमाई करता है। 14। हे भाई ! (वही हैं असल) त्यागी। (उनका) मन (मानो। भेषों के) बारह के बारह चिन्हों का धरणी होता है। (गुरू के उपदेश में जुड़ के जो मनुष्य) दिन रात (माया के हमलों से) सचेत रहते हैं (माया के मोह की नींद में) कभी नहीं सोते। हे भाई ! गुरू के उपदेश में (टिक के जो मनुष्य माया के हमलों की ओर से) जागता रहता है। और सचेत रह के (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़े रखता है। उस (के आत्मिक जीवन) को (आत्मिक) मौत खा नहीं सकती। उन्होंने (कामादिक) सारे वैरी खत्म कर लिए। वे (असल) त्यागी बन गए नानक विनती करता है- (जिन मनुष्यों ने) वहाँ (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ी हुई है। 15। हे भाई ! (कर्म-काण्डी मनुष्य किसी व्रत आदि के समय माया का दान करता है। और किसी मंत्र का अजपा जाप करता है। पर जो मनुष्य जाति में) प्यार बाँटना जानता है। बाहर भटकते मन को (हरी-नाम की सहायता से अपने) अंदर ही ले आता है। जो मनुष्य वासना-रहित जीवन जीता है। और मुँह से परमात्मा का नाम जपता है। वह मनुष्य (मानो) अजपा जाप कर रहा है। हे भाई ! जो मनुष्य सारे संसार में एक परमात्मा को ही बसता समझता है। और उस सदा स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाले रखता है। वह (मानो) शारीरिक पवित्रता के सारे उद्यम कर रहा है। ज्ञान-इन्द्रियों को वश में करने के सारे यत्न कर रहा है। 16। हे भाई ! (जैसे) समुंद्र के किनारे पर उगे हुए पेड़ की (पायां है अर्थात जड़ें कमजोर होती हैं। वैसे ही यह शरीर है। पर जो मनुष्य) आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल को (अपने जीवन की) जड़ बनाता है। (वह सिर्फ) सुरति की डोर की बरकति से वह शिखर पर (प्रभू-चरणों में जा पहुँचता है)। (जो भी मनुष्य यह उद्यम करता है। वह सांसारिक) डरों के साथ डर-डर के आत्मिक मौत नहीं मरता। वह (विकारों में) नहीं डूबता। (पर। परमात्मा का) डर-अदब ना रखने वाला मनुष्य (लोक-परलोक की) इज्जत गवा के आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा के) डर-अदब में (अपना) ठिकाना बनाए रखता है। जो मनुष्य अपने हृदय-घर में (प्रभू का) डर-अदब बनाए रखना जानता है। जिस मनुष्य को अपने मन में सदा-स्थिर प्रभू प्यारा लगने लग जाता है। उसको (ऊँचे आत्मिक जीवन के ईश्वरीय) तख़्त पर निवास मिलता है। 17। (जब मनुष्य गुरू की कृपा से) तुरियावस्था को पा लेता है। तब रजो गुण। तमो गुण और सतो गुण (माया का ये हरेक गुण चौथे पद में) लीन हो जाता है। शांति के घर में (मनुष्य के मन की) तपश समा जाती है। (उस वक्त मनुष्य परमात्मा से) मिलाप की जुगति की कद्र समझता है। तब मनुष्य उस परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है जो खण्डों-ब्रहमण्डों में। चौदह भवनों में पातालों में हर जगह समाया हुआ है। 18। हे भाई ! (जैसे) अमावस को चाँद आकाश में गुप्त रहता है (वैसे ही परमात्मा हरेक के हृदय में गुप्त बस रहा है)। हे आत्मिक जीवन की सूझ के खोजी मनुष्य ! गुरू के शबद को मन में बसा के (ही इस भेद को) समझ सकोगे। (जैसे) चंद्रमा आकाश में (हर तरफ रौशनी दे रहा है। वैसे ही परमात्मा की) ज्योति सारे संसार में (जीवन-सक्ता दे रही है)। वह करतार स्वयं ही (सब जीवों को) पैदा करके (सबकी) संभाल कर रहा है। जिस मनुष्य को गुरू से यह सूझ मिल जाती है। वह मनुष्य उस परमात्मा में सदा के लिए लीन रहता है। पर। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ कर जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। 19। प्रभू-चरणों को प्रभू के दर को (अपना) पक्का आसरा बना के उस जगह में (प्रभू-चरणों में) टिक के सोहाने जीवन वाला बन जाता है। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू (का मिलाप) हासिल कर लेता है। तब अपने आत्मिक जीवन को पड़तालना शुरू कर देता है। जिस हृदय में (पहले दुनियावी) आशाएं (ही आशाएं टिकी रहती थीं) वहाँ आशाओं का पूर्ण अभाव हो जाता है। (उसके अंदर से) मेरे-तेर और मन के फुरनों का बर्तन ही फूट जाता है। वह मनुष्य (माया के) ममता जाल से अलग रहता है। नानक विनती करता है- मैं ऐसे मनुष्य का (सदा) दास हूँ। 20। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “(वह नाथ-प्रभू सारे जगत का माँ है) यह सारा जगत उस मां (-नाथ-प्रभू) की संतान है (का पैदा किया हुआ है)।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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