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अंग 837

अंग
837
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सेज एक एको प्रभु ठाकुरु महलु न पावै मनमुख भरमईआ ॥
गुरु गुरु करत सरणि जे आवै प्रभु आइ मिलै खिनु ढील न पईआ ॥5॥
करि करि किरिआचार वधाए मनि पाखंड करमु कपट लोभईआ ॥
बेसुआ कै घरि बेटा जनमिआ पिता ताहि किआ नामु सदईआ ॥6॥
पूरब जनमि भगति करि आए गुरि हरि हरि हरि हरि भगति जमईआ ॥
भगति भगति करते हरि पाइआ जा हरि हरि हरि हरि नामि समईआ ॥7॥
प्रभि आणि आणि महिंदी पीसाई आपे घोलि घोलि अंगि लईआ ॥
जिन कउ ठाकुरि किरपा धारी बाह पकरि नानक कढि लईआ ॥8॥6॥2॥1॥6॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे सखिए ! (जीव-स्त्री की) एक हृदय ही सेज है जिस पर ठाकुरु-प्रभू खुद ही बसता है। पर अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री (प्रभू-पति का) ठिकाना नहीं पा सकती। वह भटकती ही फिरती है। अगर वह ‘गुरू गुरू’ करती गुरू की शरण आ पड़े। तो प्रभू आ के उस को मिल पड़ता है। थोड़ा सा भी वक्त नहीं लगता। 5। पर यदि कोई मनुष्य (गुरू का आसरा छोड़ के हरी नाम का सिमरन भुला के) बार-बार (तीर्थ-यात्रा आदि के मिथे हुए धार्मिक कर्म) करके इन कर्म-काण्डी कर्मों को ही बढ़ाता जाए। तो उसके मन में लोभ छल-कपट दिखावे आदि का कर्म ही टिका रहेगा (पति-प्रभू का मिलाप नहीं होगा)। बाजारी औरत (वैश्या) के घर अगर पुत्र पैदा हो जाए तो उस पुत्र के पिता का कोई नाम नहीं बताया जा सकता। 6। हे भाई ! (जो मनुष्य) पिछले जनम में (परमात्मा की) भक्ति करके (अब मानस जन्म में) आए हैं। गुरू ने (उनके अंदर) हर वक्त भक्ति करने का बीज बो दिया है। जब वे हर समय हरी-नाम सिमरते-सिमरते हरी-नाम में लीन हो गए। तब हर वक्त भक्ति करते हुए उनका परमात्मा से मिलाप हो गया। 7। (पर। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति करना जीव के अपने इख़ि्तयार की बात नहीं। ये मेहनत। ये कमाई। प्रभू की मेहर से ही हो सकती है। प्रभू की भक्ति करनी। मानो। महिंदी को पीसने के समान है। स्त्री मेहंदी को खुद ही पीसती है। खुद ही घिसती है। और खुद ही उसको अपने हाथों पैरों पर लगाती है। वह स्वयं ही मेहंदी को इस काबिल बनाती है कि वह उस स्त्री के अंगों पर लग सके)। प्रभू ने खुद ही (जीव के मन को अपने चरणों में) लगा-लगा के (भक्ति करने की) मेहंदी (जीव से) पिसवाई है। फिर स्वयं ही उसकी भक्ति-रूपी मेहंदी को घोल-घोल के (रंगीली प्यार-भरी बना-बना के) अपने चरणों में उसे जोड़ा है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिन पर मालिक-प्रभू ने मेहर की। उनकी बाँह पकड़ के (उनको संसार-समुंद्र में से बाहर) निकाल लिया। 8। 6। 9।
रागु बिलावलु महला 5 असटपदी घरु 12
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उपमा जात न कही मेरे प्रभ की उपमा जात न कही ॥
तजि आन सरणि गही ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ चरन कमल अपार ॥
हउ जाउ सद बलिहार ॥
मनि प्रीति लागी ताहि ॥
तजि आन कतहि न जाहि ॥1॥
हरि नाम रसना कहन ॥
मल पाप कलमल दहन ॥
चड़ि नाव संत उधारि ॥
भै तरे सागर पारि ॥2॥
मनि डोरि प्रेम परीति ॥
इह संत निरमल रीति ॥
तजि गए पाप बिकार ॥
हरि मिले प्रभ निरंकार ॥3॥
प्रभ पेखीऐ बिसमाद ॥
चखि अनद पूरन साद ॥
नह डोलीऐ इत ऊत ॥
प्रभ बसे हरि हरि चीत ॥4॥
तिन॑ नाहि नरक निवासु ॥ नित सिमरि प्रभ गुणतासु ॥
ते जमु न पेखहि नैन ॥ सुनि मोहे अनहत बैन ॥5॥
हरि सरणि सूर गुपाल ॥
प्रभ भगत वसि दइआल ॥
हरि निगम लहहि न भेव ॥
नित करहि मुनि जन सेव ॥6॥
दुख दीन दरद निवार ॥
जा की महा बिखड़ी कार ॥
ता की मिति न जानै कोइ ॥
जलि थलि महीअलि सोइ ॥7॥
करि बंदना लख बार ॥
थकि परिओ प्रभ दरबार ॥
प्रभ करहु साधू धूरि ॥
नानक मनसा पूरि ॥8॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 असटपदी घरु 12 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! प्यारे प्रभू की महिमा बयान नहीं की जा सकती। (किसी हालत में भी) बयान नहीं की जा सकती। हे भाई ! (मैंने तो) और आसरे त्याग के प्रभू का ही आसरा लिया है। 1। रहाउ। बेअंत प्रभू के सुंदर चरणों से हे भाई ! मैं (तो) सदा सदके जाता हूँ। हे भाई ! (जिन मनुष्यों के) मन में उस (प्रभू के) प्रति प्यार पैदा हो जाता है। (वे मनुष्य प्रभू का दर) छोड़ के किसी और जगह नहीं जाते। 1। हे भाई ! जीभ से परमात्मा का नाम उचारना अनेकों पापों-विकारों की मैल को जलाना है। (अनेकों मनुष्य ‘हरि नाम कहन’ वाली) संत जनों की (इस) बेड़ी में चढ़ के (विकारों में डूबने से) बचा लिए जाते हैं (हरी-नाम सिमरन की बेड़ी में चढ़ के) भयानक संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 2। हे भाई ! (अपने) मन में (प्रभू चरणों के लिए) प्यार भरी लगन पैदा करनी- संत जनों द्वारा बताई हुई इस (जीवन को) पवित्र करने वाली मर्यादा है। (जो मनुष्य ये लगन पैदा करते हैं। वे) सारे पापों-विकारों का साथ छोड़ जाते हैं। वे मनुष्य हरी-प्रभू निरंकार को जा मिलते हैं। 3। हे भाई ! आश्चर्य-रूप् प्रभू के दर्शन पूर्ण आनंद स्वरूप प्रभू (के नाम-रस) का स्वाद चख के कर सकते हैं। हे भाई ! इस लोक में और परलोक में (विकारों के हमलों के सामने) घबराहट नहीं होती अगर हरी-प्रभू जी हृदय में बसे रहें। 4। हे भाई ! उनको नर्कों में निवास नहीं मिलता। (जो मनुष्य) गुणों के खजाने प्रभू का सिमरन करके उसको सदा (हृदय में बसाए रखते हैं) वे (अपनी) आँखों से जमराज को नहीं देखते (जमों से उनका वास्ता नहीं पड़ता) जो मनुष्य एक रस (बज रही सिफत सालाह की) बँसरी सुन के (उसी में) मस्त रहते हैं। 5। हे भाई ! भक्त उस सूरमें गोपाल-हरी की शरण में पड़े रहते हैं। दया का श्रोत परमात्मा (अपने) भक्तों के वश में रहता है। हे भाई ! वेद (भी) उस हरी का भेद नहीं पा सकते। सारे ऋषी-मुनि उस (प्रभू) की सेवा-भक्ति सदा करते रहते हैं। 6। हे भाई ! वह (परमात्मा) गरीबों के दुख-दर्द दूर करने वाला है। जिस (परमात्मा) की (सेवा-भक्ति) करनी बहुत मुशिकल है कोई मनुष्य उस (की हस्ती) की हदबंदी नहीं जानता। वह प्रभू जल में। थल में। धरती में। आकाश में स्वयं ही मौजूद है। 7। हे प्रभू ! (आपके ही दर पर) मैं अनेकों बार सिर निवाता हूँ। (अन्य सभी आसरों से) हार के मैं आपके दर पे आया हूँ। मुझे (अपने) संत जनों के चरणों की धूड़़ बनाए रख। हे नानक ! (कह-) मेरी ये तमन्ना पूरी कर। 8। 1।
बिलावलु महला 5 ॥
प्रभ जनम मरन निवारि ॥
हारि परिओ दुआरि ॥
गहि चरन साधू संग ॥
मन मिसट हरि हरि रंग ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! (मेरे) जनम-मरण (के चक्कर) समाप्त कर दे। मैं (औरों की) आस त्याग के आपके दर पर आ गिरा हूँ। (मेहर कर) आपके संत-जनों के चरण पकड़ के (आपके संतजनों का) पल्ला पकड़ के। मेरे मन को। हे हरी ! आपका प्यार मीठा लगता रहे।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सखिए ! (जीव-स्त्री की) एक हृदय ही सेज है जिस पर ठाकुरु-प्रभू खुद ही बसता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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