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अंग 836

अंग
836
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मन की बिरथा मन ही जाणै अवरु कि जाणै को पीर परईआ ॥1॥
राम गुरि मोहनि मोहि मनु लईआ ॥
हउ आकल बिकल भई गुर देखे हउ लोट पोट होइ पईआ ॥1॥ रहाउ ॥
हउ निरखत फिरउ सभि देस दिसंतर मै प्रभ देखन को बहुतु मनि चईआ ॥
मनु तनु काटि देउ गुर आगै जिनि हरि प्रभ मारगु पंथु दिखईआ ॥2॥
कोई आणि सदेसा देइ प्रभ केरा रिद अंतरि मनि तनि मीठ लगईआ ॥
मसतकु काटि देउ चरणा तलि जो हरि प्रभु मेले मेलि मिलईआ ॥3॥
चलु चलु सखी हम प्रभु परबोधह गुण कामण करि हरि प्रभु लहीआ ॥
भगति वछलु उआ को नामु कहीअतु है सरणि प्रभू तिसु पाछै पईआ ॥4॥
खिमा सीगार करे प्रभ खुसीआ मनि दीपक गुर गिआनु बलईआ ॥
रसि रसि भोग करे प्रभु मेरा हम तिसु आगै जीउ कटि कटि पईआ ॥5॥
हरि हरि हारु कंठि है बनिआ मनु मोतीचूरु वड गहन गहनईआ ॥
हरि हरि सरधा सेज विछाई प्रभु छोडि न सकै बहुतु मनि भईआ ॥6॥
कहै प्रभु अवरु अवरु किछु कीजै सभु बादि सीगारु फोकट फोकटईआ ॥
कीओ सीगारु मिलण कै ताई प्रभु लीओ सुहागनि थूक मुखि पईआ ॥7॥
हम चेरी तू अगम गुसाई किआ हम करह तेरै वसि पईआ ॥
दइआ दीन करहु रखि लेवहु नानक हरि गुर सरणि समईआ ॥8॥5॥8॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (मेरे) मन की (इस वक्त की) पीड़ा को (मेरा अपना) मन ही जानता है। कोई और पराई पीड़ा को क्या जान सकता है। 1। हे (मेरे) राम ! प्यारे गुरू ने (मेरा) मन अपने वश में कर लिया है। गुरू के दर्शन करके (अब) मैं अपनी चतुराई समझदारी गवा बैठी हूँ। मेरा अपना आप मेरे वश में नहीं रहा (मेरा मन और मेरी ज्ञान इन्द्रियां गुरू के वश में हैं गई हैं)। 1। रहाउ। हे भाई ! (मेरे) मन में प्रभू के दर्शन करने की तीव्र इच्छा पैदा हो चुकी है। मैं सारे देशों-देशांतरों में (उसको) तलाशती फिरती हूँ (थी)। जिस (गुरू) ने (मुझे) प्रभू (के मिलाप) का रास्ता दिखा दिया है। उस गुरू के आगे मैंअपना तन काट के भेट कर रही हूँ (अपना आप गुरू के हवाले कर रही हूँ)। 2। हे भाई ! (अब अगर) कोई प्रभू का संदेश ला के (मुझे) देता है। तो वह मेरे दिल। मेरे मन। मेरे तन को प्यारा लगता है। हे भाई ! जो कोई सज्जन मुझे प्रभू से मिलाता है। मैं अपना सिर काट के उसके पैरों के नीचे रखने को तैयार हूँ। 3। हे सखी ! आ चल। हे सखी ! आ चल। हम (चल के) प्रभू (के प्यार) को जगा दें। (आत्मिक) गुणों वाले मोहक गीत (कामिनी) गा के उस प्रभू-पति को वश में करें। भगती से प्यार करने वाला’ (भगत वछल) – ये उसका नाम कहा जाता है। (हे सखी ! आ) उसकी शरण पड़ जाएं। उसके दर पर गिर पड़ें। 4। हे सखी ! जो जीव स्त्री खिमा वाले स्वभाव को अपने आत्मिक जीवन की सजावट बनाती है। जो अपने मन में गुरू से मिली आत्मिक जीवन की सूझ (का) दीपक जगाती है। प्रभू-पति उस पर प्रसन्न हो जाता है। प्रभू उसके आत्मिक मिलाप को बड़े ही आनंद से भोगता है। हे सहेली ! मैं उस प्रभू-पति के आगे अपने प्राणों को बार-बार वारने को तैयार हूँ। 5। हे सखी ! परमात्मा के नाम (की हरेक सांस में याद) की माला मैंने (अपने) गले में डाल ली है (याद की बरकति से सुंदर हो चुके अपने) मन को मैंने सबसे बढ़िया मोतीचूर गहना बना लिया है। हरी-नाम की श्रद्धा की मैंने (अपने हृदय में) सेज बिछा दी है। मेरे मन को वह प्रभू-पति बहुत प्यारा लग रहा है (अब आपको विश्वास है कि) प्रभू-पति मुझे छोड़ के नहीं जा सकता। 6। हे सहेली ! (अगर) प्रभू-पति कुछ और कहता रहे। और। (जीव-स्त्री) कुछ और करती रहे। तो (उस जीव-स्त्री का) सारा किया हुआ श्रृंगार (सारा धार्मिक उद्यम) व्यर्थ चला जाता है। बिल्कुल फोका बन जाता है। (उसके) मुँह पर तो थूकें ही पड़ीं। और प्रभू पति ने तो (किसी और) सोहागनि को अपनी बना लिया। 7। हे प्रभू ! हम आपकी दासियाँ हैं आप अपहुँच और धरती का पति है। हम जीव-सि्त्रयां (आपके आदेश के बाहर) कुछ नहीं कर सकती। हम तो सदा आपके वश में हैं। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! हम कंगालों पर मेहर कर। हमें अपने चरणों में रख। हमें गुरू के चरणों में जगह दिए रख। 8। 5।
बिलावलु महला 4 ॥
मै मनि तनि प्रेमु अगम ठाकुर का खिनु खिनु सरधा मनि बहुतु उठईआ ॥
गुर देखे सरधा मन पूरी जिउ चात्रिक प्रिउ प्रिउ बूंद मुखि पईआ ॥1॥
मिलु मिलु सखी हरि कथा सुनईआ ॥
सतिगुरु दइआ करे प्रभु मेले मै तिसु आगै सिरु कटि कटि पईआ ॥1॥ रहाउ ॥
रोमि रोमि मनि तनि इक बेदन मै प्रभ देखे बिनु नीद न पईआ ॥
बैदक नाटिक देखि भुलाने मै हिरदै मनि तनि प्रेम पीर लगईआ ॥2॥
हउ खिनु पलु रहि न सकउ बिनु प्रीतम जिउ बिनु अमलै अमली मरि गईआ ॥
जिन कउ पिआस होइ प्रभ केरी तिन॑ अवरु न भावै बिनु हरि को दुईआ ॥3॥
कोई आनि आनि मेरा प्रभू मिलावै हउ तिसु विटहु बलि बलि घुमि गईआ ॥
अनेक जनम के विछुड़े जन मेले जा सति सति सतिगुर सरणि पवईआ ॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे सखी ! मेरे मन में। मेरे तन में। अपहुँच मालिक-प्रभू का प्यार पैदा हो चुका है। मेरे मन में घड़ी-घड़ी उसके मिलाप की तीव्र इच्छा पैदा हो रही है। हे सखिए ! गुरू का दर्शन करके मेरी यह इच्छा पूरी होती है। जैसे ‘प्रिउ प्रिउ’ करते पपीहे के मुँह में (बरखा की) बूँद पड़ जाती है। 1। हे सखी ! आ। इकट्ठे बैठें। एक साथ बैठें (और। बैठ के) परमात्मा की सिफत सालाह सुनें। जिसके ऊपर गुरू मेहर करता है। उसको प्रभू (साथ) मिला देता है। उस (गुरू) के आगे मेरा सिर बार-बार कुर्बान जाता है। 1। रहाउ। हे सखिए ! मेरे हरेक रोम में। मेरे मन में। मेरे तन में (प्रभू से विछोड़े की) पीड़ा है। प्रभू का दर्शन किए बिना मुझे शांति नहीं मिलती। हकीम (मेरी) नब्ज़ देख के (ही) ग़लती खा जाते हैं। (हकीम को नहीं पता कि) मेरे हृदय में। मेरे मन में। मेरे तन में तो प्रभू-प्यार की पीड़ा उठ रही है। 2। हे सखी ! जैसे कोई नशेड़ी मनुष्य नशे के बग़ैर मरने वाला (लाचार) हो जाता है। वैसे ही मैं प्रीतम-प्रभू के मिलाप के बिना एक छिन एक पल भी नहीं रह सकती। हे सखिए ! जिन जीव-सि्त्रयों को प्रभू-पति के मिलाप की तमन्ना होती है। उन्हें प्रभू के बिना और कोई दूसरा अच्छा नहीं लगता। 3। हे सखिए ! जो कोई आ के मुझे मेरा प्यारा प्रभू मिला दे। तो मैं उससे सदके कुर्बान जाती हूँ। हे सखिए ! जब सतिगुरू की शरण पड़ते हैं। तो सतिगुरू अनेकों जन्मों के विछुड़ों को (प्रभू के साथ) मिला देता है। 4।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (मेरे) मन की (इस वक्त की) पीड़ा को (मेरा अपना) मन ही जानता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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