Lulla Family

अंग 835

अंग
835
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि हरि उसतति करै दिनु राती रखि रखि चरण हरि ताल पूरईआ ॥5॥
हरि कै रंगि रता मनु गावै रसि रसाल रसि सबदु रवईआ ॥
निज घरि धार चुऐ अति निरमल जिनि पीआ तिन ही सुखु लहीआ ॥6॥
मनहठि करम करै अभिमानी जिउ बालक बालू घर उसरईआ ॥
आवै लहरि समुंद सागर की खिन महि भिंन भिंन ढहि पईआ ॥7॥
हरि सरु सागरु हरि है आपे इहु जगु है सभु खेलु खेलईआ ॥
जिउ जल तरंग जलु जलहि समावहि नानक आपे आपि रमईआ ॥8॥3॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य दिन रात हर वक्त परमात्मा की सिफत-सालाह करता रहता है। प्रभू के चरणों को हर वक्त (हृदय में) बसा के (वह मनुष्य के जीवन की चाल को) ताल में चलाए रखता है (बेताला नहीं होता)। 5। हे भाई ! प्रभू के (प्रेम-) रंग में रंगा हुआ (जिस मनुष्य का) मन (सिफत-सालाह के गीत) गाता रहता है। रसों के श्रोत प्रभू के प्यार में स्वाद से (जो मनुष्य) गुरू के शबद को जपता रहता है। उस मनुष्य के हृदय में (आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की) बड़ी ही पवित्र धारा टपकती रहती है। जिस मनुष्य ने (यह नाम-जल) पीया उसने ही आत्मिक आनंद प्राप्त किया। 6। (जो मनुष्य अपने) मन के हठ से (मिथे हुए धार्मिक) कर्म करता रहता है। उसको (अपने धर्मी होने का) गुमान हो जाता है। (उसके ये उद्यम फिर यूँ ही हैं) जैसे बच्चे रेत के घर उसारते हैं। समुंद्र के पानी की लहर आती है। और वे घर एक पल में तिनका-तिनका हो के ढह जाते हैं। 7। हे भाई ! ये सारा जगत (परमात्मा ने) एक तमाशा रचा हुआ है। वह स्वयं ही (जीवन का) सरावर है। समुंद्र है (सारे जीव उस समुंद्र की लहरें हैं)। हे नानक ! जैसे (समुंद्र के) पानी की लहरें (समुंद्र का) पानी (ही हैं) पानी में ही मिल जाती हैं (इस तरह) वह सुंदर राम (हर जगह) स्वयं ही स्वयं है। 8। 3।
बिलावलु महला 4 ॥
सतिगुरु परचै मनि मुंद्रा पाई गुर का सबदु तनि भसम द्रिड़ईआ ॥
अमर पिंड भए साधू संगि जनम मरण दोऊ मिटि गईआ ॥1॥
मेरे मन साधसंगति मिलि रहीआ ॥
क्रिपा करहु मधसूदन माधउ मै खिनु खिनु साधू चरण पखईआ ॥1॥ रहाउ ॥
तजै गिरसतु भइआ बन वासी इकु खिनु मनूआ टिकै न टिकईआ ॥
धावतु धाइ तदे घरि आवै हरि हरि साधू सरणि पवईआ ॥2॥
धीआ पूत छोडि संनिआसी आसा आस मनि बहुतु करईआ ॥
आसा आस करै नही बूझै गुर कै सबदि निरास सुखु लहीआ ॥3॥
उपजी तरक दिगंबरु होआ मनु दह दिस चलि चलि गवनु करईआ ॥
प्रभवनु करै बूझै नही त्रिसना मिलि संगि साध दइआ घरु लहीआ ॥4॥
आसण सिध सिखहि बहुतेरे मनि मागहि रिधि सिधि चेटक चेटकईआ ॥
त्रिपति संतोखु मनि सांति न आवै मिलि साधू त्रिपति हरि नामि सिधि पईआ ॥5॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज सभि वरन रूप जीअ जंत उपईआ ॥
साधू सरणि परै सो उबरै खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु चंडालु चंडईआ ॥6॥
नामा जैदेउ कंबीरु त्रिलोचनु अउजाति रविदासु चमिआरु चमईआ ॥
जो जो मिलै साधू जन संगति धनु धंना जटु सैणु मिलिआ हरि दईआ ॥7॥
संत जना की हरि पैज रखाई भगति वछलु अंगीकारु करईआ ॥
नानक सरणि परे जगजीवन हरि हरि किरपा धारि रखईआ ॥8॥4॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे भाई ! (जिन मनुष्यों पर) गुरू प्रसन्न हो जाता है (गुरू की यह प्रसन्नता उनके अपने) मन में (जोगियों वाली) मुंद्रे डाली हुई है। गुरू का शबद (जो उन्होंने अपने हृदय में) दृढ़ करके बसाया हुआ है (ये उन्होंने अपने) शरीर पर (जैसे) राख मली हुई है। (इस तरह) गुरू की संगति में रह के वे जनम-मरण के चक्कर से बच गए हैं। उनके जनम और मौत दोनों ही समाप्त हो गए हैं। 1। हे मेरे मन ! गुरू की संगति में मिल के रहना चाहिए (और आरजू करते रहना चाहिए कि) हे मधुसूदन ! हे माधव ! (मेरे पर) मेहर कर। मैं हर वक्त गुरू के चरण धोता रहूँ (हर वक्त गुरू की शरण पड़ा रहूँ)। 1। रहाउ। पर। हे भाई ! (जो मनुष्य) गृहस्त छोड़ जाता है और जंगल का वासी बनता है (इस तरह उसका) मन (तो) टिकाएं तो भी एक छिन-पल के लिए भी नहीं टिकता। हे भाई ! ये भटकता मन भटक-भटक के तब ही ठहराव में आता है। जब मनुष्य परमात्मा की गुरू की शरण पड़ता है। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य) पुत्री-पुत्रों (परिवार) को छोड़ के सन्यासी जा बनता है (वह तो फिर भी अपने) मन में अनेकों आशाएं बनाता रहता है। नित्य आशाएं बुनता है (इस तरह सही आत्मिक जीवन को) नहीं समझता। पर। हाँ ! गुरू के शबद के द्वारा दुनियाँ की आशाओं से ऊपर उठ कर मनुष्य आत्मिक आनंद भोग सकता है। 3। हे भाई ! (कोई मनुष्य ऐसा है जिसके मन में दुनिया के प्रति) नफरत पैदा होती है। वह नांगा साधू बन जाता है। (फिर भी उसका) मन दसों दिशाओं में दौड़-दौड़ के भटकता फिरता है। (वह मनुष्य धरती पर) रटन करता फिरता है। (उसकी माया की) तृष्णा (फिर भी) नहीं मिटती। हाँ। गुरू की संगति में मिल के मनुष्य दया के श्रोत परमात्मा को पा लेता है। 4। हे भाई ! (जो साधनों में) पहॅुंचे हुए जोगी अनेकों आसन सीखते हैं (शीर्ष आसन। पदम् आसन आदि)। पर वह भी अपने मन में करामाती ताकतों व नाटक-चेटक (करामाती प्रदर्शन) ही माँगते रहते हैं (जिससे वे आम जनता पर अपना प्रभाव डाल सकें)। (उनके) मन में माया की ओर से तृप्ति नहीं होती। उन्हें संतोष नहीं प्राप्त होता। मन में शांति नहीं आती। हाँ। गुरू को मिल के परमात्मा के नाम से मनुष्य तृप्ति हासिल कर लेता है। आत्मिक जीवन की सफलता प्राप्त कर लेता है। 5। हे भाई ! अण्डों में से पैदा होने वाले। जियोर में से पैदा होने वाले। पसीने में से पैदा होने वाले। धरती में से फूटने वाले- ये सारे अनेकों रूप-रंगों के जीव-जंतु परमात्मा के पैदा किए हुए हैं। (इनमें से जो जीव) गुरू की शरण आ पड़ता है। वह (संसार-समुंद्र में से) बच निकलता है। चाहे वह खत्री है चाहे ब्राहमण है। चाहे शूद्र है। चाहे वैश्य है। चाहे महा चण्डाल है। 6। हे भाई ! नामदेव। जैदेव। कबीर। त्रिलोचन। नीच जाति वाला रविदास। धन्ना जाट। सैण (नाई) – जो जो भी संत जनों की संगति में मिलता आया है। वह भाग्यशाली बन गया। वह दया के श्रोत परमात्मा को मिल गया। 7। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा भगती से प्यार करने वाला है। अपने संतजनों की सदा लाज रखता आया है। संत जनों का पक्ष करता आया है। जो मनुष्य जगत के जीवन प्रभू की शरण पड़ते हैं। मेहर करके (प्रभू) उनकी रक्षा करता है। 8। 4।
बिलावलु महला 4 ॥
अंतरि पिआस उठी प्रभ केरी सुणि गुर बचन मनि तीर लगईआ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे भाई ! गुरू के बचन सुन के (ऐसे हुआ है जैसे मेरे) मन में (बिरह के) तीर लग गए हैं। मेरे अंदर प्रभू के दर्शन की तमन्ना पैदा हो गई है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह मनुष्य दिन रात हर वक्त परमात्मा की सिफत-सालाह करता रहता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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