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अंग ८३२ · बिलावल

अंग
832
बिलावल
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  1. मन का कहिआ मनसा करै ॥
  2. जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥

मन का कहिआ मनसा करै ॥

बिलावलु महला 1 ॥
मन का कहिआ मनसा करै ॥
इहु मनु पुंनु पापु उचरै ॥
माइआ मदि माते त्रिपति न आवै ॥
त्रिपति मुकति मनि साचा भावै ॥1॥
तनु धनु कलतु सभु देखु अभिमाना ॥
बिनु नावै किछु संगि न जाना ॥1॥ रहाउ ॥
कीचहि रस भोग खुसीआ मन केरी ॥
धनु लोकां तनु भसमै ढेरी ॥
खाकू खाकु रलै सभु फैलु ॥
बिनु सबदै नही उतरै मैलु ॥2॥
गीत राग घन ताल सि कूरे ॥
त्रिहु गुण उपजै बिनसै दूरे ॥
दूजी दुरमति दरदु न जाइ ॥
छूटै गुरमुखि दारू गुण गाइ ॥3॥
धोती ऊजल तिलकु गलि माला ॥
अंतरि क्रोधु पड़हि नाट साला ॥
नामु विसारि माइआ मदु पीआ ॥
बिनु गुर भगति नाही सुखु थीआ ॥4॥
सूकर सुआन गरधभ मंजारा ॥
पसू मलेछ नीच चंडाला ॥
गुर ते मुहु फेरे तिन॑ जोनि भवाईऐ ॥
बंधनि बाधिआ आईऐ जाईऐ ॥5॥
गुर सेवा ते लहै पदारथु ॥
हिरदै नामु सदा किरतारथु ॥
साची दरगह पूछ न होइ ॥
माने हुकमु सीझै दरि सोइ ॥6॥
सतिगुरु मिलै त तिस कउ जाणै ॥
रहै रजाई हुकमु पछाणै ॥
हुकमु पछाणि सचै दरि वासु ॥
काल बिकाल सबदि भए नासु ॥7॥
रहै अतीतु जाणै सभु तिस का ॥
तनु मनु अरपै है इहु जिस का ॥
ना ओहु आवै ना ओहु जाइ ॥
नानक साचे साचि समाइ ॥8॥2॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 1 ॥ (प्रभू नाम से टूटे हुए मनुष्य की) बुद्धि (भी) मन के कहे में चलती है। और ये मन निरी यही बातें सोचता है कि (शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार) पुन्न क्या है और पाप क्या है। माया के नशे में मस्त मनुष्य का (माया से) पेट नहीं भरता। माया से तृप्ति और माया के मोह से खलासी तभी होती है जब मनुष्य को सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मन में प्यारा लगने लग जाता है। 1। हे अभिमानी जीव ! देख। ये शरीर। ये धन। ये स्त्री- ये सब (सदा साथ निभने वाले नहीं हैं) परमात्मा के नाम के बिना कोई चीज (जीव के) साथ नहीं जाती । 1। रहाउ। मयावी रसों के भोग किए जाते हैं। मन की मौजें माणी जाती हैं। (पर मौत आने पर) धन (और) लोगों का बन जाता है और ये शरीर मिट्टी की ढेरी हो जाता है। यह सारा ही पसारा (अंत में) ख़ाक में ही मिल जाता है (मन पर विषय-विकारों की मैल इकट्ठी होती जाती है। वह) मैल गुरू के शबद के बिना नहीं उतरती। 2। (प्रभू के नाम से टूट के) मनुष्य अनेकों किस्मों के गीत राग व ताल आदि में मन परचाता है पर ये सब झूठे उद्यम हैं (क्योंकि नाम के बिना जीव) तीन गुणों के असर तले पैदा होता मरता रहता है और (प्रभू-चरणों से) विछुड़ा रहता है। (इन गीतों-रागों की सहायता से जीव की) और चाहत (ज्यादा से ज्यादा मिलने के लालच। झाक) व दुमर्ति दूर नहीं होती। आत्मिक रोग नहीं जाता। (इस दूसरी झाक व दुमर्ति से। आत्मिक रोग से वह मनुष्य) खलासी पा लेता है जो गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा के गुण गाता है (ये सिफत-सालाह ही इन रोगों का) दारू है। जो मनुष्य सफेद धोती पहनते हैं (माथे पर) तिलक लगाते हैं। गले में माला डालते हैं और (वेद आदि के मंत्र) पढ़ते हैं पर उनके अंदर क्रोध प्रबल है उनका उद्यम यूँ ही है जैसे किसी नाट्य-घर में (नाट्य-विद्या की सिखलाई कर करा रहे हैं)। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम भुला के माया (के मोह) की शराब पी हुई हो। (उनको सुख नहीं हो सकता)। गुरू के बिना प्रभू की भगती नहीं हो सकती। और भगती के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिलता। 4। उन्हें सूअर-कुत्ते-गधे-बिल्ले- पशू-मलेछ-नीच-चण्डाल आदिक की जूनों में घुमाया जाता है। जिन लोगों ने अपना मुँह गुरू से मोड़ा हुआ है माया के मोह के बंधन में बंधा हुआ मनुष्य जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। 5। गुरू की बताई हुई सेवा के द्वारा ही मनुष्य नाम-सरमाया प्राप्त करता है। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम सदा बसता है वह (जीवन-यात्रा में) सफल हो गया है। परमात्मा की दरगाह में उससे लेखा नहीं मांगा जाता (क्योंकि उसके जिंमें कुछ भी बकाया नहीं निकलता)। जो मनुष्य परमात्मा की रजा को (सिर माथे) मानता है वह परमात्मा के दर पर कामयाब हो जाता है। 6। जब मनुष्य को गुरू मिल जाता है तो यह उस परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना लेता है। परमात्मा की रजा को समझता है और रज़ा में (राज़ी) रहता है। सदा-स्थिर प्रभू की रजा को समझ के उसके दर पर जगह हासिल कर लेता है। गुरू के शबद के द्वारा उसके जनम-मरण (के चक्र) खत्म हो जाते हैं। 7। (सिमरन की बरकति से) जो मनुष्य (अंतरात्मे माया के मोह की ओर से) उपराम रहता है वह हरेक चीज को परमात्मा की (दी हुई) ही समझता है। जिस परमात्मा ने ये शरीर और मन दिया है उसके हवाले करता है। हे नानक ! वह मनुष्य जनम मरण के चक्कर से बच जाता है। वह सदा-सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन रहता है। 8। 2।

जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥

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बिलावलु महला 3 असटपदी घरु 10
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥
अंतरि लोभु झूठु अभिमानु ॥
बिनु नावै पाजु लहगु निदानि ॥1॥
सतिगुर सेवि नामु वसै मनि चीति ॥
गुरु भेटे हरि नामु चेतावै बिनु नावै होर झूठु परीति ॥1॥ रहाउ ॥
गुरि कहिआ सा कार कमावहु ॥
सबदु चीनि॑ सहज घरि आवहु ॥
साचै नाइ वडाई पावहु ॥2॥
आपि न बूझै लोक बुझावै ॥
मन का अंधा अंधु कमावै ॥
दरु घरु महलु ठउरु कैसे पावै ॥3॥
हरि जीउ सेवीऐ अंतरजामी ॥
घट घट अंतरि जिस की जोति समानी ॥
तिसु नालि किआ चलै पहनामी ॥4॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 3 असटपदी घरु 10 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! माया-ग्रसित मनुष्य कौए (की तरह काँ-काँ करने वाले) हैं। (सिर्फ) मुँह से (ही) बातों-बातों से आत्मिक जीवन की सूझ (बताते रहते हैं। जैसे कि कौआ अपनी चोंच से 'कां कां' करता है)। (पर उस चोंच ज्ञानी के) मन में लोभ (टिका रहता) है। अहंकार (टिका रहता) है। हे भाई ! नाम से टूटे रह के यह धार्मिक दिखावा आखिर बेपर्दा हो ही जाता है। 1। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से (परमात्मा का) नाम (मनुष्य के) मन में चित्त में आ बसता है। (जिस मनुष्य को) गुरू मिल जाता है। उसको (गुरू। परमात्मा का) नाम जपाता है। हे भाई ! (परमात्मा के) नाम (के प्यार) के बिना और प्यार झूठे हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! वह काम किया करो जो गुरू ने बताया है (वह काम है नाम का सिमरन)। परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी से गहरी सांझ डाल के आत्मिक अडोलता के घर में टिका करो। सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ के (लोक-परलोक की) महिमा हासिल करेंगे। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य आत्मिक जीवन के बारे में) खुद (तो कुछ) समझते नहीं। पर लोगों को समझाते रहते हैं। उनका अपना आपा (आत्मिक जीवन की ओर से) बिल्कुल कोरा है (अंधा है। इस वास्ते आत्मिक जीवन के रास्ते में वह अंधों की तरह ठोकरें खाता रहता है) अंधों वाले काम करता रहता है। हे भाई ! ऐसा मनुष्य परमात्मा का दर-घर। परमात्मा का महल। परमात्मा का ठिकाना बिल्कुल नहीं पा सकता। 3। हे भाई ! उस परमात्मा की सेवा-भक्ति करनी चाहिए। जो सबके दिल की जानने वाला है। जिस परमात्मा की ज्योति हरेक शरीर में मौजूद है। उससे कोई लुका-छुपा नहीं चल सकता। 4।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८३२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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