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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 833 · बिलावल

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अंग
833
बिलावल
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  1. साचा नामु साचै सबदि जानै ॥
  2. आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥
  3. हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥

गुरु अमर दास जी · अष्टपदी · राग बिलावल

साचा नामु साचै सबदि जानै ॥

अंग 832 से चला आ रहा अंश

साचा नामु साचै सबदि जानै ॥
आपै आपु मिलै चूकै अभिमानै ॥
गुरमुखि नामु सदा सदा वखानै ॥5॥
सतिगुरि सेविऐ दूजी दुरमति जाई ॥
अउगण काटि पापा मति खाई ॥
कंचन काइआ जोती जोति समाई ॥6॥
सतिगुरि मिलिऐ वडी वडिआई ॥
दुखु काटै हिरदै नामु वसाई ॥
नामि रते सदा सुखु पाई ॥7॥
गुरमति मानिआ करणी सारु ॥
गुरमति मानिआ मोख दुआरु ॥
नानक गुरमति मानिआ परवारै साधारु ॥8॥1॥3॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम सदा ही जपता रहता है। उसका अपना आप परमात्मा के आपे में मिल जाता है। (उसके अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी की सिफत-सालाह के शबद के द्वारा सदा-स्थिर हरी-नाम के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 5। हे भाई! यदि गुरू की शरण पड़े रहें, तो (अंदर से) माया के मोह वाली खोटी मति दूर हो जाती है। (अंदर से) सारे अवगुण काटे जाते हैं। पापों वाली मति खत्म हो जाती है। (विकारों से बचे रहने के कारण) शरीर सोने जैसा शुद्ध हो रहता है। (मनुष्य की) जिंद परमात्मा की ज्योति में मिली रहती है। 6। हे भाई! अगर गुरू मिल जाए, तो (लोक-परलोक में) बड़ा सम्मान मिलता है। (गुरू मनुष्य का) हरेक दुख काट देता है। (मनुष्य के) हृदय में (परमात्मा का) नाम बसा देता है। (परमात्मा के) नाम में रंगीज़ के (मनुष्य) सदा आत्मिक आनंद पाता है। 7। हे भाई! गुरू की शिक्षा में पतीजने से (मनुष्य का) आचरण अच्छा बन जाता है। गुरू की मति में मन मानने से विकारों की तरफ़ से मुक्ति पाने का रास्ता मिल जाता है। हे नानक! गुरू की शिक्षा में पतीजने से (मनुष्य) अपने सारे परिवार को भी (हरी-नाम का) आसरा देने के काबिल बन जाता है। 8। 1। 3।

गुरु राम दास जी · अष्टपदी · राग बिलावल

आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥

बिलावलु महला 4 असटपदीआ घरु 11
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥
गुरमुखि परचै कंचन काइआ निरभउ जोती जोति मिलईआ ॥1॥
मै हरि हरि नामु अधारु रमईआ ॥
खिनु पलु रहि न सकउ बिनु नावै गुरमुखि हरि हरि पाठ पड़ईआ ॥1॥ रहाउ ॥
एकु गिरहु दस दुआर है जा के अहिनिसि तसकर पंच चोर लगईआ ॥
धरमु अरथु सभु हिरि ले जावहि मनमुख अंधुले खबरि न पईआ ॥2॥
कंचन कोटु बहु माणकि भरिआ जागे गिआन तति लिव लईआ ॥
तसकर हेरू आइ लुकाने गुर कै सबदि पकड़ि बंधि पईआ ॥3॥
हरि हरि नामु पोतु बोहिथा खेवटु सबदु गुरु पारि लंघईआ ॥
जमु जागाती नेड़ि न आवै ना को तसकरु चोरु लगईआ ॥4॥
हरि गुण गावै सदा दिनु राती मै हरि जसु कहते अंतु न लहीआ ॥
गुरमुखि मनूआ इकतु घरि आवै मिलउ गोुपाल नीसानु बजईआ ॥5॥
नैनी देखि दरसु मनु त्रिपतै स्रवन बाणी गुर सबदु सुणईआ ॥
सुनि सुनि आतम देव है भीने रसि रसि राम गोपाल रवईआ ॥6॥
त्रै गुण माइआ मोहि विआपे तुरीआ गुणु है गुरमुखि लहीआ ॥
एक द्रिसटि सभ सम करि जाणै नदरी आवै सभु ब्रहमु पसरईआ ॥7॥
राम नामु है जोति सबाई गुरमुखि आपे अलखु लखईआ ॥
नानक दीन दइआल भए है भगति भाइ हरि नामि समईआ ॥8॥1॥4॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 असटपदीआ घरु 11 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! जो मनुष्य हर वक्त हरी-नाम रस के गीत गाता रहता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के (हरी-नाम में) पसीजा रहता है। वह मनुष्य (परमात्मा के) स्वै में अपना स्वै विलीन कर के (अपने अंदर से) अहंकार मिटा लेता है। (विकारों से बचे रहने के कारण) उसका शरीर सोने जैसा शुद्ध हो जाता है। उसकी जिंद निर्भय प्रभू की ज्योति में लीन रहती है। 1। हे भाई! सोहाने राम का हरी-नाम मेरे वास्ते (मेरी जिंदगी का) आसरा (बन गया) है। (अब) मैं उसके नाम के बिना एक छिन एक पल भी नहीं रह सकता। गुरू की शरण पड़ कर (मैं तो) हरी-नाम का पाठ (ही) पढ़ता रहता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई! (मनुष्य का ये शरीर) एक ऐसा घर है जिसके दस दरवाजे हैं। (इन दरवाजों से) दिन-रात, (काम क्रोध लोभ मोह अहंकार) पाँच चोर सेंध लगाए रखते हैं। (इसके अंदर से) आत्मिक जीवन वाला सारा धन चुरा के ले जाते हैं। (आत्मिक जीवन द्वारा) अंधे हो चुके मन के मुरीद मनुष्य को (अपने लूटे जाने का) पता नहीं लगता। 2। हे भाई! (यह मानव शरीर। जैसे) सोने का किला (उच्च आत्मिक गुणों के) मोतियों से भरा हुआ है। (इन हीरों को चुराने के लिए लूटने के लिए कामादिक) चोर डाकू आ के (इसमें) छुपे रहते हैं। जो मनुष्य आत्मिक जीवन के श्रोत प्रभू में सुरति जोड़ के सचेत रहते हैं। वह मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा (इन चोर-डाकूओं को) पकड़ के बाँध लेते हैं। 3। हे भाई! परमात्मा का नाम जहाज है जहाज़। (उस जहाज़ का) मल्लाह (गुरू का) शबद है। (जो मनुष्य इस जहाज़ का आसरा लेता है। उसको) गुरू (विकारों भरे संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। जमराज मूसलिया (भी उसके) नजदीक नहीं आता। (कामादिक) कोई चोर भी सेंध नहीं लगा सकता। 4। हे भाई! (मेरा मन अब) सदा दिन रात परमात्मा के गुण गाता रहता है। मैं प्रभू की सिफत-सालाह करते-करते (सिफत का) अंत नहीं पा सकता। गुरू की शरण पड़ कर (मेरा यह) मन प्रभू के चरणों में ही टिका रहता है। मैं लोक लाज दूर करके जगत पालक प्रभू को मिला रहता हूँ। 5। हे भाई! आँखों से (हर जगह प्रभू के) दर्शन करके (मेरा) मन (और वासना से) तृप्त रहता है। (मेरे) कान गुरू की बाणी गुरू के शबद को (ही) सुनते रहते हैं। (प्रभू की सिफत सालाह) सुन-सुन के (मेरी) जिंद (नाम-रस में) भीगी रहती है। (मैं) बड़े आनंद से राम-गोपाल के गुण गाता रहता हूँ। 6। हे भाई! माया के तीन गुणों के असर तले रहने वाले जीव (सदा) माया के मोह में फसे रहते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (वह) चौथा पद प्राप्त कर लेता है (जहाँ माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता)। (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य) एक (प्यार-भरी) निगाह से सारी दुनिया को एक जैसा जानता है। उसको (यह प्रत्यक्ष) दिखाई देता है (कि) हर जगह परमात्मा ही पसरा हुआ है। 7। हे भाई! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (ये) समझ लेता है कि अलख प्रभू स्वयं ही स्वयं (हर जगह मौजूद) है। हर जगह परमात्मा का ही नाम है। सारी दुनिया में परमात्मा की ही ज्योति है। हे नानक! दीनों पर दया करने वाले प्रभू जी जिन पर मेहरवान होते हैं। वह मनुष्य भक्ति-भावना से परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं। 8। 1।

गुरु राम दास जी · अष्टपदी · राग बिलावल

हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥

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बिलावलु महला 4 ॥
हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे प्रभू! प्रभू का नाम सिमरा करें। ये नाम ठंडक पहुँचाने वाला जल है। ये नाम चंदन की सुगंधि है जो (सारी बनस्पति को) सुगन्धित कर देती है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 833 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।