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अंग 830

अंग
830
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अनिक भगत अनिक जन तारे सिमरहि अनिक मुनी ॥
अंधुले टिक निरधन धनु पाइओ प्रभ नानक अनिक गुनी ॥2॥2॥127॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे मालिक ! (कह-) हे अनेकों गुणों के मालिक प्रभू ! (आपका नाम) अंधे मनुष्य को। जैसे। छड़ी मिल जाती है। कंगाल को धन मिल जाता है। हे प्रभू ! अनेकों ही ऋषि-मुनि आपका नाम सिमरते हैं। (सिमरन करने वाले) अनेकों ही भक्त अनेकों ही सेवक। हे प्रभू ! तूने (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिए हैं। 2। 2। 127।
रागु बिलावलु महला 5 घरु 13 पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मोहन नीद न आवै हावै हार कजर बसत्र अभरन कीने ॥
उडीनी उडीनी उडीनी ॥
कब घरि आवै री ॥1॥ रहाउ ॥
सरनि सुहागनि चरन सीसु धरि ॥
लालनु मोहि मिलावहु ॥
कब घरि आवै री ॥1॥
सुनहु सहेरी मिलन बात कहउ सगरो अहं मिटावहु तउ घर ही लालनु पावहु ॥
तब रस मंगल गुन गावहु ॥
आनद रूप धिआवहु ॥
नानकु दुआरै आइओ ॥
तउ मै लालनु पाइओ री ॥2॥
मोहन रूपु दिखावै ॥
अब मोहि नीद सुहावै ॥
सभ मेरी तिखा बुझानी ॥
अब मै सहजि समानी ॥
मीठी पिरहि कहानी ॥
मोहनु लालनु पाइओ री ॥ रहाउ दूजा ॥1॥128॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 घरु 13 पड़ताल सतिगुर प्रसादि ॥ हे मोहन प्रभू ! (जैसे पति से विछुड़ी हुई स्त्री चाहे जैसे भी) हार। काजल। कपड़े। गहने पहनती है (पर विछोड़े के कारण) आहें भरती (उसे) नींद नहीं आती। (पति के इन्तजार में वह) हर वक्त उदास रहती है। (और सहेली से पूछती है-) हे बहन ! (मेरा पति) कब घर आएगा। (इसी तरह। हे मोहन ! आपसे विछुड़ के मुझे शांति नहीं आती)। 1। रहाउ। हे मोहन प्रभू ! मैं गुरमुख सोहागिन की शरण पड़ती हूँ। उसके चरणों पे (अपना) सिर धर के (पूछती हूँ-) हे बहन ! मुझे सोहाना लाल मिला दे (बता। वह) कब मेरे हृदय-घर में आएगा। 1। (सोहागिन कहती है-) हे सहेली ! सुन। मैं आपको मोहन-प्रभू मिलन की बात सुनाती हूँ। आप (अपने अंदर से) सारा अहंकार दूर कर दे। तब आप अपने हृदय-घर में उस सोहणे लाल को पा लेगी। (हृदय-घर में उसके दर्शन करके) फिर आप खुशी-आनंद पैदा करने वाले हरी-गुण गाया करना जो सिर्फ आनंद ही आनंद रूप है। हे बहन ! नानक (भी उस गुरू के) दर पर आ गया है। (गुरू के दर पर आ के) मैंने (नानक के हृदय-घर में ही) सोहणा लाल पा लिया है। 2। हे बहन ! (अब) मोहन प्रभू मुझे दर्शन दे रहे हैं। अब (माया के मोह की ओर से पैदा हुई) उपरामता मुझे मीठी लग रही है। मेरी सारी माया की तृष्णा मिट गई है। अब मैं आत्मिक अडोलता में टिक गई हूँ। प्रभू-पति की सिफत-सालाह की बातें मुझे प्यारी लग रही हैं। हे बहन ! अब मैंने सोहणा लाल मोहन पा लिया है। रहाउ दूजा। 1। 128।
बिलावलु महला 5 ॥
मोरी अहं जाइ दरसन पावत हे ॥
राचहु नाथ ही सहाई संतना ॥
अब चरन गहे ॥1॥ रहाउ ॥
आहे मन अवरु न भावै चरनावै चरनावै उलझिओ अलि मकरंद कमल जिउ ॥
अन रस नही चाहै एकै हरि लाहै ॥1॥
अन ते टूटीऐ रिख ते छूटीऐ ॥
मन हरि रस घूटीऐ संगि साधू उलटीऐ ॥
अन नाही नाही रे ॥
नानक प्रीति चरन चरन हे ॥2॥2॥129॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ पति-प्रभू के दर्शन करने से अब मेरा अहंकार दूर हो गया है। हे भाई ! संतों के सहायक पति-प्रभू के चरणों में सदा जुड़े रहो। मैंने तो अब उसी के ही चरण पकड़ लिए हैं।1। रहाउ। (हे भाई ! प्रभू के दर्शन की बरकति से) मेरे मन को और कुछ अच्छा नहीं लगता। (प्रभू के दर्शनों को ही) तड़पता रहता है। जैसे भौंरा कमल-पुष्प के मकरंद पर ही लिपटा रहता है। वैसे ही मेरा मन प्रभू के चरणों की ओर ही बार-बार पलटता है। मेरा मन और (पदार्थों के) स्वाद को नहीं ढूँढता। एक परमात्मा को ही तलाशता है। 1। (हे भाई ! प्रभू के दर्शन की बरकति से) और (पदार्थों के मोह) संबंध तोड़ लेते हैं। इन्द्रियों की पकड़ से निजात पा लेते हैं। हे मन ! गुरू की संगति में रह के परमात्मा का नाम-रस चूसते हैं। और (माया के मोह से बिरती) पलट जाती है। हे नानक ! (कह-) हे भाई ! (दर्शन की बरकति से) और मोह बिल्कुल ही नहीं भाते। (अगर कोई मोह अच्छा लगता है तो वह है) हर वक्त प्रभू के चरणों से ही प्यार बना रहता है। 2। 2। 129।
रागु बिलावलु महला 9 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख हरता हरि नामु पछानो ॥
अजामलु गनिका जिह सिमरत मुकत भए जीअ जानो ॥1॥ रहाउ ॥
गज की त्रास मिटी छिनहू महि जब ही रामु बखानो ॥
नारद कहत सुनत ध्रूअ बारिक भजन माहि लपटानो ॥1॥
अचल अमर निरभै पदु पाइओ जगत जाहि हैरानो ॥
नानक कहत भगत रछक हरि निकटि ताहि तुम मानो ॥2॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 9 दुपदे सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम के साथ सांझ डाले रख। ये नाम सारे दुखों का नाश करने वाला है। इस नाम को सिमरते-सिमरते अजामल विकारों से हट गया। गनिका विकारों से मुक्त हो गई। आप भी अपने दिल में उस हरी-नाम के साथ जान-पहचान बनाए रख। 1। रहाउ। हे भाई ! जब गज ने परमात्मा का नाम उचारा। उसकी बिपदा भी एक पल में दूर हो गई। नारद का दिया हुआ उपदेश सुनते ही बालक ध्रुव परमात्मा के भजन में मस्त हो गया। 1। (हरी-नाम के भजन की बरकति से ध्रुव ने) ऐसा आत्मिक दर्जा प्राप्त कर लिया जो सदा के लिए अटल और अमर हो गया। उसको देख के दुनिया हैरान हो रही है। नानक कहता है- हे भाई ! आप भी उस परमात्मा को सदा अपने अंग-संग बसता समझ। वह परमात्मा अपने भक्तों की रक्षा करने वाला है। 2। 1।
बिलावलु महला 9 ॥
हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥
भगति बिना सहसा नह चूकै गुरु इहु भेदु बतावै ॥1॥ रहाउ ॥
कहा भइओ तीरथ ब्रत कीए राम सरनि नही आवै ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 9 ॥ परमात्मा का नाम (सिमरन) के बिना दुख सहता रहता है। हे भाई ! गुरू (जीवन-मार्ग की) यह गहरी बात बताता है कि परमात्मा की भक्ति किए बिना मनुष्य का सहम खत्म नहीं होता।1। रहाउ। हे भाई ! अगर मनुष्य परमात्मा की शरण नहीं पड़ता। तो उसका तीर्थ-यात्रा करने का कोई लाभ नहीं। वर्त रखने का कोई फायदा नहीं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मालिक ! (कह-) हे अनेकों गुणों के मालिक प्रभू ! (आपका नाम) अंधे मनुष्य को।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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