जोग जग निहफल तिह मानउ जो प्रभ जसु बिसरावै ॥1॥ मान मोह दोनो कउ परहरि गोबिंद के गुन गावै ॥ कहु नानक इह बिधि को प्रानी जीवन मुकति कहावै ॥2॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह भुला देता है मैं समझता हूँ कि उसके योग-साधना और यज्ञ (आदि कर्मकाण्ड सब) व्यर्थ हैं। 1। हे नानक ! कह- जो मनुष्य अहंकार और माया का मोह छोड़ के परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाता रहता है। जो मनुष्य इस किस्म का जीवन व्यतीत करने वाला है। वह जीवन-मुक्त कहलवाता है (वह मनुष्य उस श्रेणी में से गिना जाता है। जो इस जिंदगी में विकारों की पकड़ से बचे रहते हैं)। 2।
बिलावलु महला 9 ॥ जा मै भजनु राम को नाही ॥ तिह नर जनमु अकारथु खोइआ यह राखहु मन माही ॥1॥ रहाउ ॥ तीरथ करै ब्रत फुनि राखै नह मनूआ बसि जा को ॥ निहफल धरमु ताहि तुम मानहु साचु कहत मै या कउ ॥1॥ जैसे पाहनु जल महि राखिओ भेदै नाहि तिह पानी ॥ तैसे ही तुम ताहि पछानहु भगति हीन जो प्रानी ॥2॥ कल मै मुकति नाम ते पावत गुरु यह भेदु बतावै ॥ कहु नानक सोई नरु गरूआ जो प्रभ के गुन गावै ॥3॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 9 ॥ जिस मनुष्य के अंदर परमात्मा के नाम का भजन नहीं है हे भाई ! ये बात अच्छी तरह याद रखो कि, उस मनुष्य ने अपनी जिंदगी व्यर्थ ही गवा ली है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन अपने बस में नहीं। वह चाहे तीर्थों पर स्नान करता है। वर्त भी रखता है। पर आप (ये तीर्थ वर्त आदि वाला) उसका धर्म व्यर्थ समझो। मैं ऐसे मनुष्य को भी यह सच्ची बात कह देता हूँ। 1। हे भाई ! जैसे पत्थर पानी में रखा हुआ हो। उसको पानी भेद नहीं सकता। (पानी उस पर असर नहीं कर सकता)। ऐसा ही आप उस मनुष्य को समझ लो जो प्रभू-भक्ती से वंचित है। 2। हे भाई ! गुरू जिंदगी का यह राज बताता है कि मानस जीवन में इन्सान परमात्मा के नाम के द्वारा ही विकारों से खलासी प्राप्त कर सकता है। हे नानक ! कह- वही मनुष्य आदरणीय हैं जो परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 3। 3।
बिलावलु असटपदीआ महला 1 घरु 10 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ निकटि वसै देखै सभु सोई ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥ विणु भै पइऐ भगति न होई ॥ सबदि रते सदा सुखु होई ॥1॥ ऐसा गिआनु पदारथु नामु ॥ गुरमुखि पावसि रसि रसि मानु ॥1॥ रहाउ ॥ गिआनु गिआनु कथै सभु कोई ॥ कथि कथि बादु करे दुखु होई ॥ कथि कहणै ते रहै न कोई ॥ बिनु रस राते मुकति न होई ॥2॥ गिआनु धिआनु सभु गुर ते होई ॥ साची रहत साचा मनि सोई ॥ मनमुख कथनी है परु रहत न होई ॥ नावहु भूले थाउ न कोई ॥3॥ मनु माइआ बंधिओ सर जालि ॥ घटि घटि बिआपि रहिओ बिखु नालि ॥ जो आंजै सो दीसै कालि ॥ कारजु सीधो रिदै सम॑ालि ॥4॥ सो गिआनी जिनि सबदि लिव लाई ॥ मनमुखि हउमै पति गवाई ॥ आपे करतै भगति कराई ॥ गुरमुखि आपे दे वडिआई ॥5॥ रैणि अंधारी निरमल जोति ॥ नाम बिना झूठे कुचल कछोति ॥ बेदु पुकारै भगति सरोति ॥ सुणि सुणि मानै वेखै जोति ॥6॥ सासत्र सिम्रिति नामु द्रिड़ामं ॥ गुरमुखि सांति ऊतम करामं ॥ मनमुखि जोनी दूख सहामं ॥ बंधन तूटे इकु नामु वसामं ॥7॥ मंने नामु सची पति पूजा ॥ किसु वेखा नाही को दूजा ॥ देखि कहउ भावै मनि सोइ ॥ नानकु कहै अवरु नही कोइ ॥8॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु असटपदीआ महला 1 घरु 10 सतिगुर प्रसादि ॥ परमात्मा (हरेक जीव के) नजदीक बसता है। वह स्वयं ही हरेक की संभाल करता है। पर यह भेद कोई विरला बंदा ही समझता है जो गुरू के सन्मुख रह के नाम जपता है। जब तक (यह) डर पैदा ना हो (कि वह हर वक्त नजदीक से देख रहा है) परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। जो बंदे गुरू के शबद के द्वारा (नाम-रंग में) रंगे जाते हैं उनको सदा आत्मिक आनंद मिलता है। 1। परमात्मा का नाम एक ऐसा श्रेष्ठ पदार्थ है जो परमात्मा के साथ गहरी सांझ पैदा कर देता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के (ये पदार्थ) हासिल करता है। वह (इसके) रस में भीग के (लोक-परलोक में) आदर पाता है। 1। रहाउ। (ज़बानी ज़बानी तो) हर कोई कहता है (कि मुझे परमात्मा का) ज्ञान (प्राप्त हो गया है।) ज्ञान (मिल गया है)। (ज्यों-ज्यों ज्ञान-ज्ञान) कह के चर्चा करता है (उस चर्चा में से) कलेश ही पैदा होता है। चर्चा करके (ऐसी आदत पड़ जाती है कि) चर्चा करने से जीव हटता भी नहीं। (पर चर्चा से कोई आत्मिक आनंद नहीं मिलता। क्योंकि) परमात्मा के नाम-रस में रंगे जाए बिना विकारों से खलासी नहीं मिलती। 2। परमात्मा के साथ गहरी सांझ और उसमें सुरति का टिकाव- ये सब कुछ गुरू से ही मिलता है। (जिसको मिलता है उसकी) रहनी पवित्र हो जाती है उसके मन में वह सदा-स्थिर प्रभू बस जाता है। अपने मन के पीछे चलने वाला बंदा (निरे ज्ञान की बातें) ही करता है। पर उसकी रहनी (पवित्र) नहीं होती। परमात्मा के नाम से टूटे हुए को (माया की भटकना से बचाने के लिए) कोई आसरा नहीं मिलता। 3। माया ने (जीवों के) मन को (मोह के) तीरों के जाल में बाँधा हुआ है। (चाहे परमात्मा) हरेक शरीर में मौजूद है। पर (माया के मोह का) जहर भी हरेक के अंदर ही है। (इस वास्ते) जो भी (जगत में) पैदा होता है वह आत्मिक मौत के वश में दिख रहा है। परमात्मा को हृदय में याद करने से ही (मनुष्य जीवन में) करने योग्य काम सिरे चढ़ते हैं। 4। वही मनुष्य ज्ञान-वान (कहलवा सकता) है जिसने गुरू के शबद के माध्यम से प्रभू के चरणों में सुरति जोड़ी है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अहंकार के अधीन रह के अपनी इज्जत गवाता है। (पर जीव के भी क्या वश।) परमात्मा स्वयं ही अपनी भक्ति (जीवों से) करवाता है। स्वयं ही (जीव को) गुरू के सन्मुख करके वडिआई (सम्मान) देता है। 5। (सिमरन के बिना मनुष्य की उम्र) एक अंधेरी रात है। परमात्मा की ज्योति के प्रकट होने के साथ ही ये रौशन हो सकती है। नाम से टूटे हुए बंदे झूठे हैं गंदे हैं और बुरी छूत वाले हैं। (भाव। औरों को भी गलत रास्ते पर डाल देते हैं)। वेद आदि हरेक धर्म-पुस्तक भगती की शिक्षा ही पुकार-पुकार के बताता है। जो जो जीव इस शिक्षा को सुन-सुन के श्रद्धा (मन में) बसाता है वह ईश्वरीय ज्योति को (हर जगह) देखता है। 6। स्मृतियाँ-शास्त्र आदि धर्म-पुस्तकें भी नाम-सिमरन की ताकीद करते हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर सिमरते हैं उनके अंदर शांति पैदा होती है। उनकी रहणी श्रेष्ठ हो जाती है। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदेजनम-मरण का दुख सहते हैं। ये बँधन तब ही टूटते हैं जब परमात्मा के नाम को दिल में बसाया जाए। 7। जो बंदा उसके नाम को (अपने हृदय में) दृढ़ करता है उसको सच्ची इज्जत मिलती है। उसका आदर होता है। परमात्मा के बिना कोई और (उस जैसा) नहीं। मैं हर जगह उसी को देखता हूँ वही मुझे अपने मन में प्यारा लगता है। नानक कहता है- उसे (हर जगह) देख के मैं उसकी सिफत सालाह करता हूँ। उसके बिना उस जैसा कोई और नहीं।8। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह भुला देता है मैं समझता हूँ कि उसके योग-साधना और यज्ञ (आदि कर्मकाण्ड सब) व्यर्थ हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।