विचि हउमै करम कमावदे जिउ वेसुआ पुतु निनाउ ॥
पिता जाति ता होईऐ गुरु तुठा करे पसाउ ॥
वडभागी गुरु पाइआ हरि अहिनिसि लगा भाउ ॥
जन नानकि ब्रहमु पछाणिआ हरि कीरति करम कमाउ ॥2॥
मनि हरि हरि लगा चाउ ॥
गुरि पूरै नामु द्रिड़ाइआ हरि मिलिआ हरि प्रभ नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जब लगु जोबनि सासु है तब लगु नामु धिआइ ॥
चलदिआ नालि हरि चलसी हरि अंते लए छडाइ ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जिन हरि मनि वुठा आइ ॥
जिनी हरि हरि नामु न चेतिओ से अंति गए पछुताइ ॥
धुरि मसतकि हरि प्रभि लिखिआ जन नानक नामु धिआइ ॥3॥
मन हरि हरि प्रीति लगाइ ॥
वडभागी गुरु पाइआ गुर सबदी पारि लघाइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि आपे आपु उपाइदा हरि आपे देवै लेइ ॥
हरि आपे भरमि भुलाइदा हरि आपे ही मति देइ ॥
गुरमुखा मनि परगासु है से विरले केई केइ ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जिन हरि पाइआ गुरमते ॥
जन नानकि कमलु परगासिआ मनि हरि हरि वुठड़ा हे ॥4॥
मनि हरि हरि जपनु करे ॥
हरि गुर सरणाई भजि पउ जिंदू सभ किलविख दुख परहरे ॥1॥ रहाउ ॥
घटि घटि रमईआ मनि वसै किउ पाईऐ कितु भति ॥
गुरु पूरा सतिगुरु भेटीऐ हरि आइ वसै मनि चिति ॥
मै धर नामु अधारु है हरि नामै ते गति मति ॥
मै हरि हरि नामु विसाहु है हरि नामे ही जति पति ॥
जन नानक नामु धिआइआ रंगि रतड़ा हरि रंगि रति ॥5॥
हरि धिआवहु हरि प्रभु सति ॥
गुर बचनी हरि प्रभु जाणिआ सभ हरि प्रभु ते उतपति ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ से आइ मिले गुर पासि ॥
सेवक भाइ वणजारिआ मित्रा गुरु हरि हरि नामु प्रगासि ॥
धनु धनु वणजु वापारीआ जिन वखरु लदिअड़ा हरि रासि ॥
गुरमुखा दरि मुख उजले से आइ मिले हरि पासि ॥
जन नानक गुरु तिन पाइआ जिना आपि तुठा गुणतासि ॥6॥
हरि धिआवहु सासि गिरासि ॥
मनि प्रीति लगी तिना गुरमुखा हरि नामु जिना रहरासि ॥1॥ रहाउ ॥1॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “संत जनों भाईयों (की संगति करने) के बिना किसी मनुष्य ने (कभी) हरी का नाम प्राप्त नहीं किया (क्योंकि, संतों की संगति के बिना मनुष्य जो भी निहित धार्मिक कर्म करते हैं वह) अहम् के असर ।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।