कहु नानक मेरा सतिगुरु पूरा गुर प्रसादि प्रभ भए निहाल ॥2॥27॥113॥
मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥
तोरी न तूटै छोरी न छूटै ऐसी माधो खिंच तनी ॥1॥
दिनसु रैनि मन माहि बसतु है तू करि किरपा प्रभ अपनी ॥2॥
बलि बलि जाउ सिआम सुंदर कउ अकथ कथा जा की बात सुनी ॥3॥
जन नानक दासनि दासु कहीअत है मोहि करहु क्रिपा ठाकुर अपुनी ॥4॥28॥114॥
हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥
गुरु मेरा पारब्रहम परमेसुरु ता का हिरदै धरि मन धिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखदाता जा का कीआ सगल जहानु ॥
रसना रवहु एकु नाराइणु साची दरगह पावहु मानु ॥1॥
साधू संगु परापति जा कउ तिन ही पाइआ एहु निधानु ॥
गावउ गुण कीरतनु नित सुआमी करि किरपा नानक दीजै दानु ॥2॥29॥115॥
राखि लीए सतिगुर की सरण ॥
जै जै कारु होआ जग अंतरि पारब्रहमु मेरो तारण तरण ॥1॥ रहाउ ॥
बिस्वंभर पूरन सुखदाता सगल समग्री पोखण भरण ॥
थान थनंतरि सरब निरंतरि बलि बलि जांई हरि के चरण ॥1॥
जीअ जुगति वसि मेरे सुआमी सरब सिधि तुम कारण करण ॥
आदि जुगादि प्रभु रखदा आइआ हरि सिमरत नानक नही डरण ॥2॥30॥116॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥
ईघै निरगुन ऊघै सरगुन केल करत बिचि सुआमी मेरा ॥1॥ रहाउ ॥
नगर महि आपि बाहरि फुनि आपन प्रभ मेरे को सगल बसेरा ॥
आपे ही राजनु आपे ही राइआ कह कह ठाकुरु कह कह चेरा ॥1॥
का कउ दुराउ का सिउ बलबंचा जह जह पेखउ तह तह नेरा ॥
साध मूरति गुरु भेटिओ नानक मिलि सागर बूंद नही अन हेरा ॥2॥1॥117॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (प्रभू के सेवक गुरू चरणों में) मिल के आत्मिक जीवन की सारी राशि-पूँजी समेत हृदय-घर में टिके रहते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।