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अंग 827

अंग
827
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सही सलामति मिलि घरि आए निंदक के मुख होए काल ॥
कहु नानक मेरा सतिगुरु पूरा गुर प्रसादि प्रभ भए निहाल ॥2॥27॥113॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (प्रभू के सेवक गुरू चरणों में) मिल के आत्मिक जीवन की सारी राशि-पूँजी समेत हृदय-घर में टिके रहते हैं। उनकी निंदा करने वाले मनुष्य बदनामी कमाते हैं। हे नानक ! कह- मेरा गुरू सारी समर्था वाला है। (गुरू के दर पर आए भाग्यशालियों पर) गुरू की कृपा से परमात्मा खुश रहता है। 2। 27। 113।
बिलावलु महला 5 ॥
मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥
तोरी न तूटै छोरी न छूटै ऐसी माधो खिंच तनी ॥1॥
दिनसु रैनि मन माहि बसतु है तू करि किरपा प्रभ अपनी ॥2॥
बलि बलि जाउ सिआम सुंदर कउ अकथ कथा जा की बात सुनी ॥3॥
जन नानक दासनि दासु कहीअत है मोहि करहु क्रिपा ठाकुर अपुनी ॥4॥28॥114॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! मेरा प्यार (तो अब) सुंदर प्रभू से बन गया है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू ने प्यार की डोर ऐसी कसी हुई है। कि वह डोर ना अब तोड़े टूटती है ना ही छोड़े से छुड़ाई जा सकती है। 1। हे भाई ! वह प्यार अब दिन-रात मेरे मन में बस रहा है। हे प्रभू ! आप अपनी कृपा किए रख (कि ये प्यार कायम रहे)। 2। (हे भाई ! उस प्यार की बरकति से) मैं (हर वक्त) उस सुंदर प्रभू से सदके जाता हूँ जिसकी बाबत ये बात सुनी हुई है कि उसकी सिफत-सालाह की कहानी बयान से परे हैं। 3। हे दास नानक ! (कह- हे प्रभू ! आपका यह सेवक नानक आपके) दासों का दास कहलवाता है। हे ठाकुर ! अपनी कृपा मेरे पर किए रख (और। यह प्यार बना रहे)। 4। 28। 114।
बिलावलु महला 5 ॥
हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥
गुरु मेरा पारब्रहम परमेसुरु ता का हिरदै धरि मन धिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखदाता जा का कीआ सगल जहानु ॥
रसना रवहु एकु नाराइणु साची दरगह पावहु मानु ॥1॥
साधू संगु परापति जा कउ तिन ही पाइआ एहु निधानु ॥
गावउ गुण कीरतनु नित सुआमी करि किरपा नानक दीजै दानु ॥2॥29॥115॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरण हृदय में बसा के। मैं उससे (सदा) सदके जाता हूँ। हे मेरे मन ! मेरा गुरू (भी) परमात्मा (का रूप) है। हृदय में उस (गुरू) का ध्यान धरा कर। 1। रहाउ। हे भाई ! ये सारा जगत जिस परमात्मा का पैदा किया हुआ है। सारे सुख देने वाले उस परमात्मा को सदा ही याद करता रह। (अपनी) जीभ से उस एक परमात्मा का नाम जपा कर। (परमात्मा की) सदा कायम रहने वाली हजूरी में आदर प्राप्त करेंगे। 1। पर। हे भाई ! ये नाम-खजाना उस मनुष्य ने ही हासिल किया है। जिसको गुरू की संगति प्राप्त हुई है। हे मेरे मालिक ! मेहर करके (मुझे) नानक को ये ख़ैर डाल कि मैं सदा ही आपके गुण गाता रहूँ। सदा आपकी सिफत-सालाह करता रहूँ। 2। 29। 115।
बिलावलु महला 5 ॥
राखि लीए सतिगुर की सरण ॥
जै जै कारु होआ जग अंतरि पारब्रहमु मेरो तारण तरण ॥1॥ रहाउ ॥
बिस्वंभर पूरन सुखदाता सगल समग्री पोखण भरण ॥
थान थनंतरि सरब निरंतरि बलि बलि जांई हरि के चरण ॥1॥
जीअ जुगति वसि मेरे सुआमी सरब सिधि तुम कारण करण ॥
आदि जुगादि प्रभु रखदा आइआ हरि सिमरत नानक नही डरण ॥2॥30॥116॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! ये संसार एक समुंद्र है। जिन मनुष्यों को वह बचाना चाहता है। उनको) गुरू की शरण में डाल के (इस समुंद्र में से डूबने से) बचा लेता है। (जिसमें से) पार लंघाने के लिए मेरा जीवन (मानो। एक) जहाज़ है। जगत में उनकी सदा शोभा होती है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा सारे जगत को पालने वाला है। सर्व व्यापक है। सारे सुख देने वाला है। (जगत को) पालने-पोसने के लिए सारे पदार्थ उसके हाथ में हैं। वह परमात्मा हरेक जगह में बस रहा है। सभी में एक रस बस रहा है। मैं उसके चरणों से सदा सदके जाता हूँ। 1। हे मेरे मालिक ! (सब जीवों की) जीवन-जुगति आपके वश में है। आपके वश में सारी ताकतें हैं। आप ही सारे जगत को पैदा करने वाला है। हे नानक ! शुरू से ही परमात्मा (शरण पड़े की) रक्षा करता । उसका नाम सिमरने से कोई डर नहीं रह जाता है। 2। 30। 116।
रागु बिलावलु महला 5 दुपदे घरु 8
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥
ईघै निरगुन ऊघै सरगुन केल करत बिचि सुआमी मेरा ॥1॥ रहाउ ॥
नगर महि आपि बाहरि फुनि आपन प्रभ मेरे को सगल बसेरा ॥
आपे ही राजनु आपे ही राइआ कह कह ठाकुरु कह कह चेरा ॥1॥
का कउ दुराउ का सिउ बलबंचा जह जह पेखउ तह तह नेरा ॥
साध मूरति गुरु भेटिओ नानक मिलि सागर बूंद नही अन हेरा ॥2॥1॥117॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 दुपदे घरु 8 सतिगुर प्रसादि ॥ हे प्रभू ! मेरी (अपने आप में) कोई ताकत नहीं। (मेरे पास) हरेक चीज आपकी ही बख्शी हुई है। हे भाई ! एक तरफ तो प्रभू माया के तीन गुणों से परे है (निर्गुण)। दूसरी तरफ प्रभू माया के तीनों गुणों समेत है (सर्गुण)। इन दोनों ही हालातों के बीच मेरा मालिक-प्रभू यह जगत-तमाशा रचाए बैठा है। 1। रहाउ। हे भाई ! (हरेक शरीर-) नगर में प्रभू स्वयं ही है। बाहर (सारे जगत में) भी स्वयं ही है। सब जीवों में मेरे प्रभू का ही निवास है। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही राजा है। स्वयं ही प्रजा है। कहीं मालिक बना हुआ है। कहीं सेवक बना हुआ है। 1। हे भाई ! मैं जिधर-जिधर देखता हूँ हर जगह परमात्मा ही (हरेक के) अंग-संग बस रहा है। (उसके बिना कहीं भी कोई और नहीं। इस वास्ते) किस की ओर से कोई झूठ कहा जाए या छुपाया जाए। और किससे ठॅगी-फरेब किया जाए। (वह तो सब कुछ देखता व जानता है)। हे नानक ! जिस मनुष्य को पवित्र हस्ती वाला गुरू मिल जाता है (उसे यह समझ आ जाती है कि) समुंद्र में मिल के पानी की बूँद (समुंद्र से) अलग नहीं दिखती। 2। 1। 117।
बिलावलु महला 5 ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (प्रभू के सेवक गुरू चरणों में) मिल के आत्मिक जीवन की सारी राशि-पूँजी समेत हृदय-घर में टिके रहते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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