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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 827 · बिलावल

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अंग
827
बिलावल
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  1. सही सलामति मिलि घरि आए निंदक के मुख होए काल ॥
  2. मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥
  3. हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥
  4. राखि लीए सतिगुर की सरण ॥
  5. मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

सही सलामति मिलि घरि आए निंदक के मुख होए काल ॥

अंग 826 से चला आ रहा अंश

सही सलामति मिलि घरि आए निंदक के मुख होए काल ॥
कहु नानक मेरा सतिगुरु पूरा गुर प्रसादि प्रभ भए निहाल ॥2॥27॥113॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! (प्रभू के सेवक गुरू चरणों में) मिल के आत्मिक जीवन की सारी राशि-पूँजी समेत हृदय-घर में टिके रहते हैं। उनकी निंदा करने वाले मनुष्य बदनामी कमाते हैं। हे नानक! कहें: मेरा गुरू सारी समर्था वाला है। (गुरू के दर पर आए भाग्यशालियों पर) गुरू की कृपा से परमात्मा खुश रहता है। 2। 27। 113।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥

बिलावलु महला 5 ॥
मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥
तोरी न तूटै छोरी न छूटै ऐसी माधो खिंच तनी ॥1॥
दिनसु रैनि मन माहि बसतु है तू करि किरपा प्रभ अपनी ॥2॥
बलि बलि जाउ सिआम सुंदर कउ अकथ कथा जा की बात सुनी ॥3॥
जन नानक दासनि दासु कहीअत है मोहि करहु क्रिपा ठाकुर अपुनी ॥4॥28॥114॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई! मेरा प्यार (तो अब) सुंदर प्रभू से बन गया है। 1। रहाउ। हे भाई! प्रभू ने प्यार की डोर ऐसी कसी हुई है। कि वह डोर ना अब तोड़े टूटती है ना ही छोड़े से छुड़ाई जा सकती है। 1। हे भाई! वह प्यार अब दिन-रात मेरे मन में बस रहा है। हे प्रभू! आप अपनी कृपा किए रखें (कि ये प्यार कायम रहे)। 2। (हे भाई! उस प्यार की बरकति से) मैं (हर वक्त) उस सुंदर प्रभू से सदके जाता हूँ जिसकी बाबत ये बात सुनी हुई है कि उसकी सिफत-सालाह की कहानी बयान से परे है। 3। हे दास नानक! (कहें: हे प्रभू! आपका यह सेवक नानक आपके) दासों का दास कहलवाता है। हे ठाकुर! अपनी कृपा मुझ पर किए रखें (और, यह प्यार बना रहे)। 4। 28। 114।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥

बिलावलु महला 5 ॥
हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥
गुरु मेरा पारब्रहम परमेसुरु ता का हिरदै धरि मन धिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखदाता जा का कीआ सगल जहानु ॥
रसना रवहु एकु नाराइणु साची दरगह पावहु मानु ॥1॥
साधू संगु परापति जा कउ तिन ही पाइआ एहु निधानु ॥
गावउ गुण कीरतनु नित सुआमी करि किरपा नानक दीजै दानु ॥2॥29॥115॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई! परमात्मा के चरण हृदय में बसा के, मैं उससे (सदा) सदके जाता हूँ। हे मेरे मन! मेरा गुरू (भी) परमात्मा (का रूप) है। हृदय में उस (गुरू) का ध्यान धरा करें। 1। रहाउ। हे भाई! ये सारा जगत जिस परमात्मा का पैदा किया हुआ है। सारे सुख देने वाले उस परमात्मा को सदा ही याद करते रहें। (अपनी) जीभ से उस एक परमात्मा का नाम जपा करें। (परमात्मा की) सदा कायम रहने वाली हजूरी में आदर प्राप्त करेंगे। 1। पर, हे भाई! ये नाम-खजाना उस मनुष्य ने ही हासिल किया है। जिसको गुरू की संगति प्राप्त हुई है। हे मेरे मालिक! मेहर करके (मुझे) नानक को ये ख़ैर डालें कि मैं सदा ही आपके गुण गाता रहूँ। सदा आपकी सिफत-सालाह करता रहूँ। 2। 29। 115।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

राखि लीए सतिगुर की सरण ॥

बिलावलु महला 5 ॥
राखि लीए सतिगुर की सरण ॥
जै जै कारु होआ जग अंतरि पारब्रहमु मेरो तारण तरण ॥1॥ रहाउ ॥
बिस्वंभर पूरन सुखदाता सगल समग्री पोखण भरण ॥
थान थनंतरि सरब निरंतरि बलि बलि जांई हरि के चरण ॥1॥
जीअ जुगति वसि मेरे सुआमी सरब सिधि तुम कारण करण ॥
आदि जुगादि प्रभु रखदा आइआ हरि सिमरत नानक नही डरण ॥2॥30॥116॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई! ये संसार एक समुंद्र है। जिन मनुष्यों को वह बचाना चाहता है। उनको) गुरू की शरण में डाल के (इस समुंद्र में से डूबने से) बचा लेता है। (जिसमें से) पार लंघाने के लिए मेरा जीवन (मानो, एक) जहाज़ है। जगत में उनकी सदा शोभा होती है। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा सारे जगत को पालने वाला है। सर्व व्यापक है। सारे सुख देने वाला है। (जगत को) पालने-पोसने के लिए सारे पदार्थ उसके हाथ में हैं। वह परमात्मा हरेक जगह में बस रहा है। सभी में एक रस बस रहा है। मैं उसके चरणों से सदा सदके जाता हूँ। 1। हे मेरे मालिक! (सब जीवों की) जीवन-जुगति आपके वश में है। आपके वश में सारी ताकतें हैं। आप ही सारे जगत को पैदा करने वाले हैं। हे नानक! शुरू से ही परमात्मा (शरण पड़े की) रक्षा करता आ रहा है। उसका नाम सिमरने से कोई डर नहीं रह जाता है। 2। 30। 116।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥

रागु बिलावलु महला 5 दुपदे घरु 8
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥
ईघै निरगुन ऊघै सरगुन केल करत बिचि सुआमी मेरा ॥1॥ रहाउ ॥
नगर महि आपि बाहरि फुनि आपन प्रभ मेरे को सगल बसेरा ॥
आपे ही राजनु आपे ही राइआ कह कह ठाकुरु कह कह चेरा ॥1॥
का कउ दुराउ का सिउ बलबंचा जह जह पेखउ तह तह नेरा ॥
साध मूरति गुरु भेटिओ नानक मिलि सागर बूंद नही अन हेरा ॥2॥1॥117॥

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 दुपदे घरु 8 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू! मेरी (अपने आप में) कोई ताकत नहीं। (मेरे पास) हरेक चीज आपकी ही बख्शी हुई है। हे भाई! एक तरफ तो प्रभू माया के तीन गुणों से परे है (निर्गुण)। दूसरी तरफ प्रभू माया के तीनों गुणों समेत है (सर्गुण)। इन दोनों ही हालातों के बीच मेरा मालिक-प्रभू यह जगत-तमाशा रचाए बैठा है। 1। रहाउ। हे भाई! (हरेक शरीर-) नगर में प्रभू स्वयं ही है। बाहर (सारे जगत में) भी स्वयं ही है। सब जीवों में मेरे प्रभू का ही निवास है। हे भाई! प्रभू स्वयं ही राजा है। स्वयं ही प्रजा है। कहीं मालिक बना हुआ है। कहीं सेवक बना हुआ है। 1। हे भाई! मैं जिधर-जिधर देखता हूँ हर जगह परमात्मा ही (हरेक के) अंग-संग बस रहा है। (उसके बिना कहीं भी कोई और नहीं। इस वास्ते) किस की ओर से कोई झूठ कहा जाए या छुपाया जाए। और किससे ठॅगी-फरेब किया जाए। (वह तो सब कुछ देखता व जानता है)। हे नानक! जिस मनुष्य को पवित्र हस्ती वाला गुरू मिल जाता है (उसे यह समझ आ जाती है कि) समुंद्र में मिल के पानी की बूँद (समुंद्र से) अलग नहीं दिखती। 2। 1। 117।
बिलावलु महला 5 ॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥

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रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 827 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।