ढाकन ढाकि गोबिद गुर मेरे मोहि अपराधी सरन चरन ॥1॥ रहाउ ॥
जो जो कीनो सो तुम॑ जानिओ पेखिओ ठउर नाही कछु ढीठ मुकरन ॥
बड परतापु सुनिओ प्रभ तुम॑रो कोटि अघा तेरो नाम हरन ॥1॥
हमरो सहाउ सदा सद भूलन तुम॑रो बिरदु पतित उधरन ॥
करुणा मै किरपाल क्रिपा निधि जीवन पद नानक हरि दरसन ॥2॥2॥118॥
ऐसी किरपा मोहि करहु ॥
संतह चरण हमारो माथा नैन दरसु तनि धूरि परहु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर को सबदु मेरै हीअरै बासै हरि नामा मन संगि धरहु ॥
तसकर पंच निवारहु ठाकुर सगलो भरमा होमि जरहु ॥1॥
जो तुम॑ करहु सोई भल मानै भावनु दुबिधा दूरि टरहु ॥
नानक के प्रभ तुम ही दाते संतसंगि ले मोहि उधरहु ॥2॥3॥119॥
ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥
तुम॑रो धिआनु तुम॑ारो रंगा ॥
तुम॑री सेवा तुम॑ारे अंगा ॥1॥ रहाउ ॥
जन की टहल संभाखनु जन सिउ ऊठनु बैठनु जन कै संगा ॥
जन चर रज मुखि माथै लागी आसा पूरन अनंत तरंगा ॥1॥
जन पारब्रहम जा की निरमल महिमा जन के चरन तीरथ कोटि गंगा ॥
जन की धूरि कीओ मजनु नानक जनम जनम के हरे कलंगा ॥2॥4॥120॥
जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥
पारब्रहम परमेसर सतिगुर हम बारिक तुम॑ पिता किरपाल ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि निरगुण गुणु नाही कोई पहुचि न साकउ तुम॑री घाल ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानहु जीउ पिंडु सभु तुमरो माल ॥1॥
अंतरजामी पुरख सुआमी अनबोलत ही जानहु हाल ॥
तनु मनु सीतलु होइ हमारो नानक प्रभ जीउ नदरि निहाल ॥2॥5॥121॥
राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥
तू हमरो प्रीतमु मनमोहनु तुझ बिनु जीवनु सगल अकाथ ॥1॥ रहाउ ॥
रंक ते राउ करत खिन भीतरि प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥
जलत अगनि महि जन आपि उधारे करि अपुने दे राखे हाथ ॥1॥
सीतल सुखु पाइओ मन त्रिपते हरि सिमरत स्रम सगले लाथ ॥
निधि निधान नानक हरि सेवा अवर सिआनप सगल अकाथ ॥2॥6॥122॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।