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अंग ८२८ · बिलावल

अंग
828
बिलावल
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  1. तुम॑ समरथा कारन करन ॥
  2. ऐसी किरपा मोहि करहु ॥
  3. ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥
  4. जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥
  5. राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥

तुम॑ समरथा कारन करन ॥

अंग ८२७ से चला आ रहा अंश

तुम॑ समरथा कारन करन ॥
ढाकन ढाकि गोबिद गुर मेरे मोहि अपराधी सरन चरन ॥1॥ रहाउ ॥
जो जो कीनो सो तुम॑ जानिओ पेखिओ ठउर नाही कछु ढीठ मुकरन ॥
बड परतापु सुनिओ प्रभ तुम॑रो कोटि अघा तेरो नाम हरन ॥1॥
हमरो सहाउ सदा सद भूलन तुम॑रो बिरदु पतित उधरन ॥
करुणा मै किरपाल क्रिपा निधि जीवन पद नानक हरि दरसन ॥2॥2॥118॥

हिन्दी अर्थ: आप सब ताकतों के मालिक हैं। आप जगत के रचनहार हैं। हे मेरे गोबिंद ! हे मेरे सबसे बड़े (मालिक) ! मेरा पर्दा ढक ले। मैं पापी आपके चरणों में (आपकी) शरण आया हूँ। 1। रहाउ। जो कुछ मैं नित्य करता रहता हूँ। हे प्रभू ! वह आप सब कुछ जानते हैं और देखते हैं। (इन करतूतों से) मुझ ढीठ के मुकरने की कोई गुंजायश नहीं। (फिर भी मैं किए भी जाता हूँ। और छुपाता भी हूँ)। हे प्रभू ! मैंने सुना है कि आप बहुत बड़ी समर्था वाले हैं। आपका नाम करोड़ों पाप दूर कर सकता है (मुझे भी अपना नाम बख्श)। 1। हे प्रभू ! हम जीवों का सवभाव ही है नित्य भूलें करते रहना। आपका मूल कदीमी स्वभाव (बिरद) है विकारियों को विकार से बचाना। हे तरस के श्रोत (करुणामय) ! हे कृपालु ! हे कृपा निधि (खजाने) ! नानक को अपने दर्शन दे। आपके दर्शन उच्च आत्मिक जीवन का दर्जा बख्शने वाले हैं। 2। 2। 118।

ऐसी किरपा मोहि करहु ॥

बिलावलु महला 5 ॥
ऐसी किरपा मोहि करहु ॥
संतह चरण हमारो माथा नैन दरसु तनि धूरि परहु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर को सबदु मेरै हीअरै बासै हरि नामा मन संगि धरहु ॥
तसकर पंच निवारहु ठाकुर सगलो भरमा होमि जरहु ॥1॥
जो तुम॑ करहु सोई भल मानै भावनु दुबिधा दूरि टरहु ॥
नानक के प्रभ तुम ही दाते संतसंगि ले मोहि उधरहु ॥2॥3॥119॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! मेरे पर मेहर कर कि संतों के चरणों पर मेरा माथा (सिर) पड़ा रहे। मेरी आँखों में संत जनों के दर्शन टिके रहें। मेरे शरीर पर संतों के चरणों की धूड़ पड़ी रहे। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! मेरे पर यह मेहर करो-) गुरू का शबद मेरे हृदय में (सदा) बसता रहे। हे हरी ! अपना नाम मेरे मन में टिकाए रख। हे ठाकुर ! (मेरे अंदर से कामादिक) पाँचों चोर निकाल दे। मेरी सारी भटकना आग में जला दे। 1। (हे प्रभू मेरे ऊपर यह मेहर कर-) जो कुछ आप करते हैं। उसी को (मेरा मन) ठीक मान ले। (हे प्रभू ! मेरे अंदर से) भेद-भाव भरी तेर-मेर निकाल दे। हे प्रभू ! आप ही नानक को सब दातें देने वाले हैं। (नानक की यह आरजू है कि) संतों की संगति में रख के मुझे (नानक को कामादिक तस्करों से) बचा ले। 2। 3। 119।

ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥

बिलावलु महला 5 ॥
ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥
तुम॑रो धिआनु तुम॑ारो रंगा ॥
तुम॑री सेवा तुम॑ारे अंगा ॥1॥ रहाउ ॥
जन की टहल संभाखनु जन सिउ ऊठनु बैठनु जन कै संगा ॥
जन चर रज मुखि माथै लागी आसा पूरन अनंत तरंगा ॥1॥
जन पारब्रहम जा की निरमल महिमा जन के चरन तीरथ कोटि गंगा ॥
जन की धूरि कीओ मजनु नानक जनम जनम के हरे कलंगा ॥2॥4॥120॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे प्रभू ! आपके) सेवकों से मैं ये शिक्षा मांगता हूँ कि आपके ही चरणों का ध्यान। आपका ही प्रेम (मेरे अंदर बना रहे) आपकी ही सेवा भक्ति करता रहूँ। आपके ही चरणों से जुड़ा रहूँ। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! आपके सेवकों से मैं यह दान माँगता हूँ कि आपके) सेवकों की मैं टहल करता रहूँ। आपके सेवकों के साथ ही मेरा बोल-चाल रहे। मेरा मेल-जोल भी आपके ही सेवकों के साथ रहे। आपके सेवकों की धूड़ मेरे मुँह माथे पर लगती रहे- ये चरण-धूड़ (माया की) अनेकों लहरें पैदा करने वाली आशाओं को शांत कर देती है। 1। हे नानक ! परमात्मा के सेवक ऐसे है कि उनकी शोभा दाग़हीन होती है। सेवकों के चरण। गंगा आदि करोड़ों तीर्थों के तुल्य हैं। जिस मनुष्य ने प्रभू के सेवकों की चरण-धूड़ में स्नान कर लिया। उसके अनेकों जन्मों के (किए हुए) पाप दूर हो जाते हैं। 2। 4। 120।

जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥

बिलावलु महला 5 ॥
जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥
पारब्रहम परमेसर सतिगुर हम बारिक तुम॑ पिता किरपाल ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि निरगुण गुणु नाही कोई पहुचि न साकउ तुम॑री घाल ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानहु जीउ पिंडु सभु तुमरो माल ॥1॥
अंतरजामी पुरख सुआमी अनबोलत ही जानहु हाल ॥
तनु मनु सीतलु होइ हमारो नानक प्रभ जीउ नदरि निहाल ॥2॥5॥121॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! जैसे हो सके। वैसे (अवगुणों से) मेरी रक्षा कर। हे पारब्रहम ! हे परमेश्वर ! हे सतिगुरू ! हम (जीव) आपके हैं। आप हमारे पालनहार पिता हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! मुझ गुण-हीन में कोई भी गुण नहीं। मैं उस मेहनत की कद्र नहीं जान सकता (जो आप हम जीवों के लिए कर रहे हैं)। हे प्रभू ! आप कैसे हैं और कितने बड़े हैं- ये बात आप खुद ही जानते हैं। (हम जीवों का यह) शरीर और प्राण आपके ही दिए हुए सरमाया हैं। 1। हे हरेक के दिल की जानने वाले ! हे सर्व व्यापक मालिक ! बिना हमारे बोले ही आप हमारा हाल जानते हैं। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू जी ! मेहर की निगाह से मेरी ओर देख। ताकि मेरा तन मेरा मन शीतल हो जाए। 2। 5। 121।

राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥

बिलावलु महला 5 ॥
राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥
तू हमरो प्रीतमु मनमोहनु तुझ बिनु जीवनु सगल अकाथ ॥1॥ रहाउ ॥
रंक ते राउ करत खिन भीतरि प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥
जलत अगनि महि जन आपि उधारे करि अपुने दे राखे हाथ ॥1॥
सीतल सुखु पाइओ मन त्रिपते हरि सिमरत स्रम सगले लाथ ॥
निधि निधान नानक हरि सेवा अवर सिआनप सगल अकाथ ॥2॥6॥122॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! हमें आप सदा अपने चरणों में टिकाए रख। आप हमारे प्यारे हैं। आप हमारे मन को आकर्षित करने वाले हैं। आपसे विछुड़ के (हम जीवों की) सारी ही जिंदगी व्यर्थ है। 1। रहाउ। हे भाई ! मेरा प्रभू निखसमियों का खसम है (जिनका कोई मालिक नहीं उनका मालिक है)। एक छिन में कंगाल को राजा बना देता है। (तृष्णा की) आग में जलते को सेवक बना के खुद बचा लेता है। अपने बना के हाथ दे के। उनकी रक्षा करता है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए शांति देने वाला आनंद मिल जाता है। मन (माया की तृष्णा की तरफ से) तृप्त हो जाता है। (माया की) सारी भटकनें खत्म हो जाती हैं। हे नानक ! परमात्मा की सेवा-भक्ति ही सारे खजानों का खजाना है। (माया की खातिर की हुई) और सारी चतुराई (भी प्रभू की सेवा भक्ति के सामने) व्यर्थ हैं। 2। 6। 122।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८२८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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