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अंग 824

अंग
824
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कहा करै कोई बेचारा प्रभ मेरे का बड परतापु ॥1॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ चरन कमल रखु मन माही ॥
ता की सरनि परिओ नानक दासु जा ते ऊपरि को नाही ॥2॥12॥98॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मेरे प्रभू की बड़ी ताकत है। अब (इनमें से) कोई भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 1। (हे भाई ! गुरू की किरपा से परमात्मा के सोहणे चरण) मेरे मन में आसरा बन गए हैं। उसका नाम (हर वक्त) सिमर-सिमर के मैंने आत्मिक आनंद प्राप्त किया है। हे भाई ! (प्रभू का) दास नानक उस (प्रभू) की शरण पड़ गया है जिससे बड़ा और कोई नहीं। 2। 12। 98।
बिलावलु महला 5 ॥
सदा सदा जपीऐ प्रभ नाम ॥
जरा मरा कछु दूखु न बिआपै आगै दरगह पूरन काम ॥1॥ रहाउ ॥
आपु तिआगि परीऐ नित सरनी गुर ते पाईऐ एहु निधानु ॥
जनम मरण की कटीऐ फासी साची दरगह का नीसानु ॥1॥
जो तुम॑ करहु सोई भल मानउ मन ते छूटै सगल गुमानु ॥
कहु नानक ता की सरणाई जा का कीआ सगल जहानु ॥2॥13॥99॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम जपना चाहिए। (नाम जपने की बरकति से ऐसी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। जिसको) बुढ़ापा। मौत अथवा दुख कुछ भी छू नहीं सकते। आगे भी परमात्मा की हजूरी में भी सफलता ही मिलती है। 1। रहाउ। (पर। हे भाई !) ये (नाम-) खजाना गुरू से (ही) मिलता है। स्वैभाव त्याग के सदा (गुरू की) शरण पड़ना चाहिए। ये नाम सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में पहुँचने के लिए परवाना है। (नाम की सहायता से) जनम-मरन की फाही (भी) काटी जाती है। 1। (हे भाई ! अगर मुझे आपका नाम मिल जाए। तो) जो कुछ आप करता है। वह मैं भला समझने लग जाऊँगा। (आपके नाम की बरकति से) मन से सारा अहंकार समाप्त हैं जाता है। हे नानक ! कह (-हे भाई !) उस परमात्मा की शरण पड़े रहना चाहिए। जिसका पैदा किया हुआ सारा जहान है। 2। 13। 99।
बिलावलु महला 5 ॥
मन तन अंतरि प्रभु आही ॥
हरि गुन गावत परउपकार नित तिसु रसना का मोलु किछु नाही ॥1॥ रहाउ ॥
कुल समूह उधरे खिन भीतरि जनम जनम की मलु लाही ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना अनद सेती बिखिआ बनु गाही ॥1॥
चरन प्रभू के बोहिथु पाए भव सागरु पारि पराही ॥
संत सेवक भगत हरि ता के नानक मनु लागा है ताही ॥2॥14॥100॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में तन में (हृदय में) (सदा) प्रभू बसता है। प्रभू के गुण गाते हुए। दूसरे की भलाई की बातें हमेशा करते हुए। उस मनुष्य की जीभ अमल्य हो जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मालिक प्रभू का नाम सदा सिमर के (सिमरन करने वाले संत-भगत) माया (के संसार-) जंगल से बड़े ही मजे पार लांघ जाते हैं। वे अपनी जन्मों-जन्मों के किए कर्मों की मैल उतार लेते हैं। उनकी सारी कुलें भी छिन में (संसार-जंगल में से) बच के निकल जाती हैं। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के चरणों का जहाज़ प्राप्त कर लेते हैं। वे संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। हे नानक ! वही मनुष्य उस प्रभू के संत हैं। भगत हैं। सेवक हैं। उनका मन उस प्रभू में ही सदा टिका रहता है। 2। 14। 100।
बिलावलु महला 5 ॥
धीरउ देखि तुम॑ारै रंगा ॥
तुही सुआमी अंतरजामी तूही वसहि साध कै संगा ॥1॥ रहाउ ॥
खिन महि थापि निवाजे ठाकुर नीच कीट ते करहि राजंगा ॥1॥
कबहू न बिसरै हीए मोरे ते नानक दास इही दानु मंगा ॥2॥15॥101॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! आपके चोज-तमाशे देख-देख के मुझे (भी) हौसला बन रहा है (कि आप मेरी भी सहायता करेगा)। आप ही (हमारा) मालिक है। आप ही हमारे दिलों की जानने वाला है। आप ही (हरेक) साधु-जन के साथ बसता है। 1। रहाउ। हे मालिक ! आप नीच कीड़ों (जैसे नाचीज़ बंदों) को राजा बना देता है। आप एक छिन में ही (नीच लोगों को) थापणा दे के आदर-सम्मान वाले बना देता है। 1। हे दास नानक ! (कह-हे प्रभू ! मेहर कर। आपका नाम) मेरे हृदय में से कभी ना भूले। (आपके दर से) मैं ख़ैर माँगता हूँ। 2। 15। 101।
बिलावलु महला 5 ॥
अचुत पूजा जोग गोपाल ॥
मनु तनु अरपि रखउ हरि आगै सरब जीआ का है प्रतिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
सरनि सम्रथ अकथ सुखदाता किरपा सिंधु बडो दइआल ॥
कंठि लाइ राखै अपने कउ तिस नो लगै न ताती बाल ॥1॥
दामोदर दइआल सुआमी सरबसु संत जना धन माल ॥
नानक जाचिक दरसु प्रभ मागै संत जना की मिलै रवाल ॥2॥16॥102॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! धरती का रखवाला और अबिनाशी प्रभू ही पूजा का हकदार है। मैं अपना मन और अपना तन भेटा करके उस प्रभू के आगे (ही) रखता हूँ। वह प्रभू सारे जीवों को पालने वाला है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू शरण पड़े जीव की रक्षा करने के समर्थ है। उसके स्वरूप का बयान नहीं किया जा सकता। वह सारे सुखों को देने वाला है। कृपा का समुंद्र है। बड़ा ही दयालु है। वह प्रभू अपने (सेवक) को अपने गले से लगा के रखता है। (फिर) उस (सेवक) को कोई दुख-कलेश रक्ती भर भी छू नहीं सकता। 1। हे भाई ! परमात्मा दया का घर है। सबका मालिक है। संतजनों के वास्ते वही धन माल है और सब कुछ है। उस प्रभू (के दर) का मंगता नानक उसके दर्शन की खैर माँगता है (और अरजोई करता है कि उसके) संत जनों के चरणों की धूल मिल जाएं2। 16। 102।
बिलावलु महला 5 ॥
सिमरत नामु कोटि जतन भए ॥
साधसंगि मिलि हरि गुन गाए जमदूतन कउ त्रास अहे ॥1॥ रहाउ ॥
जेते पुनहचरन से कीन॑े मनि तनि प्रभ के चरण गहे ॥
आवण जाणु भरमु भउ नाठा जनम जनम के किलविख दहे ॥1॥
निरभउ होइ भजहु जगदीसै एहु पदारथु वडभागि लहे ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने से (तीर्थ। कर्म-काण्ड आदि) करोड़ों ही उद्यम (मानों अपने आप) हैं जाते हैं। (जिस मनुष्य ने) गुरू की संगति में मिल के प्रभू के गुण गाने शुरू कर दिए। जमदूतों को (उसके नजदीक जाने से) डर आने लग पड़ा। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने प्रभू के चरण अपने मन में अपने दिल में बसा लिए। उसने (पिछले कर्मों के संस्कारों को मिटाने के लिए। मानो) सारे ही प्रायश्चित कर्म कर लिए। उसके जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो गया। उसका हरेक भ्रम डर दूर हो गया। उसके अनेकों जन्मों के किए पाप जल गए। 1। (इसलिए। हे भाई !) निडर हो के (कर्मकाण्ड का भ्रम उतार के) जगत के मालिक प्रभू का नाम जपा करो। ये नाम-पदार्थ बड़ी किस्मत से मिलता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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