अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हरी-नाम का स्वाद मुझे ऐसा आया कि मैं वह बयान नहीं कर सकता। गुरू ने मेरी बिरती माया की तरफ से पलट दी। 1। हे भाई ! (गुरू की कृपा से) सुंदर प्रभू को मैंने सबमें बसता देख लिया है। कोई भी जगह उस प्रभू से वंचित नहीं दिखती। सारी ही सृष्टि प्रभू की जीवन-रौंअ से भरपूर दिखाई दे रही है। कृपा के खजाने परमात्मा हर जगह पूर्ण तौर पर व्यापक दिख रहे हैं। हे नानक ! कह- (हे भाई ! गुरू की मेहर से) मेरी मेहनत सफल हो गई है। 2। 7। 93।
बिलावलु महला 5 ॥ मन किआ कहता हउ किआ कहता ॥ जान प्रबीन ठाकुर प्रभ मेरे तिसु आगै किआ कहता ॥1॥ रहाउ ॥ अनबोले कउ तुही पछानहि जो जीअन महि होता ॥ रे मन काइ कहा लउ डहकहि जउ पेखत ही संगि सुनता ॥1॥ ऐसो जानि भए मनि आनद आन न बीओ करता ॥ कहु नानक गुर भए दइआरा हरि रंगु न कबहू लहता ॥2॥8॥94॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे मन ! आप क्या कह रहा है। हे जीव ! आप क्या कहता है। मेरे ठाकुर प्रभू जी तो सब जीवों के दिलों की जानने वाले और समझने वाले हैं। हे जीव ! उसके आगे कोई (ठॅगी-फरेब की) बात नहीं कही जा सकती। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जो हम जीवों के दिलों में होता है। उसको बताए बिना आप खुद ही (पहले ही) पहचान लेता है। हे मन ! आप क्यों ठॅगी करता है। कब तक ठॅगी किए जाएगा। परमात्मा तो आपके साथ (बसता हुआ आपके कर्म) देख रहा है। और। सुन भी रहा है। 1। हे भाई ! यह जान के कि। परमात्मा के बिना और दूसरा कुछ भी करने के योग्य नहीं। (जानने वाले के) मन में हिलौरे पैदा हो जाते हैं। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य पर गुरू मेहरवान होता है (उसके दिल में से) परमात्मा का प्रेम-रंग कभी नहीं उतरता। 2। 8। 94।
बिलावलु महला 5 ॥ निंदकु ऐसे ही झरि परीऐ ॥ इह नीसानी सुनहु तुम भाई जिउ कालर भीति गिरीऐ ॥1॥ रहाउ ॥ जउ देखै छिद्रु तउ निंदकु उमाहै भलो देखि दुख भरीऐ ॥ आठ पहर चितवै नही पहुचै बुरा चितवत चितवत मरीऐ ॥1॥ निंदकु प्रभू भुलाइआ कालु नेरै आइआ हरि जन सिउ बादु उठरीऐ ॥ नानक का राखा आपि प्रभु सुआमी किआ मानस बपुरे करीऐ ॥2॥9॥95॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ निंदक भी इसी तरह आत्मिक उच्चता से गिर जाता है (निंदा उसके आत्मिक जीवन को। मानो। कल्लर लगा हुआ है)। हे भाई ! सुन। कॅलर की दीवार (किर किर के) गिर जाती है। यही निशानी निंदक के जीवन की है। 1। रहाउ। हे भाई ! जब (कोई) निंदक (किसी मनुष्य में कोई) खामी देखता है तब वह खुश होता है। पर किसी के गुण देख के निंदक दुखी होता है। आठों पहर (हर वक्त) निंदक किसी के साथ बुराई करने की सोचें सोचता रहता है। बुराई कर सकने तक पहुँच तो सकता नहीं। बुराई की बिउंत सोचते-सोचते ही आत्मिक मौत मर जाता है। 2। हे भाई ! निंदक को ज्यों-ज्यों प्रभू (निंदा वाले) गलत रास्ते पर डालता है। त्यों त्यों निंदक की मुकम्मल आत्मिक मौत नजदीक आती जाती है। वह निंदक संत जनों से वैर लिए रहता है। पर। हे नानक ! संतजनों का रखवाला मालिक-प्रभू खुद ही है। बिचारे जीव उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। 2। 9। 95।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! पता नहीं जीव) क्यों इस तरह गलत राह पर पड़े रहते हैं। (जीव सारे बुरे कर्म) करते कराते भी हैं। (फिर) मुकर भी जाते हैं (कि हमने नहीं किए)। पर परमात्मा सदा सब जीवों के साथ बसता (सबकी करतूतें) देखता-सुनता है। 1। रहाउ। हे भाई ! काँच का व्यापार करना। सोना छोड़ देना। सच्चे मित्र त्याग के वैरी से प्यार- (ये हैं जीवों की करतूतें)। परमात्मा (का नाम) कड़वा लगना। माया का मोह मीठा लगना (- यह है जीवों का नित्य का स्वभाव। माया के मोह में फस के सदा खिजते रहते हैं)। 1। हे भाई ! जीव (सदा) मोह के अंधे (अंधेरे) कूएं में पड़े रहते हैं। (जीवों को सदा) भटकना लगी रहती है। मोह के अंधेरे जकड़ में फसे रहते हैं (पता नहीं ये क्यों इस तरह गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं)। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य पर प्रभू दयावान होता है। उसे गुरू मिल जाता है (और। उस गुरू की) बाँह पकड़ के (उसको अंधेरे कूएं में से) निकाल लेता है। 2। 10। 96।
बिलावलु महला 5 ॥ मन तन रसना हरि चीन॑ा ॥ भए अनंदा मिटे अंदेसे सरब सूख मो कउ गुरि दीन॑ा ॥1॥ रहाउ ॥ इआनप ते सभ भई सिआनप प्रभु मेरा दाना बीना ॥ हाथ देइ राखै अपने कउ काहू न करते कछु खीना ॥1॥ बलि जावउ दरसन साधू कै जिह प्रसादि हरि नामु लीना ॥ कहु नानक ठाकुर भारोसै कहू न मानिओ मनि छीना ॥2॥11॥97॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! मेरे) गुरू ने मुझे सारे (ही) सुख दे दिए हैं। मेरे फिक्र-अंदेशे मिट गए हैं। मेरे अंदर आनंद ही आनंद बन गया है (क्योंकि गुरू की कृपा से) मेरे मन मेरे तन मेरी जीभ ने परमात्मा के साथ सांझ डाल ली है। 1। रहाउ। हे भाई ! बेसमझी की जगह मेरे अंदर अब समझदारी पैदा हो गई है (क्योंकि गुरू की कृपा से मुझे विश्वास हो गया है कि) परमात्मा (सब दिलों की) जानने वाला है (सबके किए काम) देखने वाला है। (मुझे निश्चय हो गया है कि) परमात्मा अपने सेवकों को आप हाथ दे के बचा लेता है। कोई भी मनुष्य (सेवक का) कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 1। हे भाई ! मैं गुरू के दर्शनों से सदके जाता हूँ। क्योंकि उस गुरू की कृपा से (ही) मैं परमात्मा का नाम जप सका हूँ। हे नानक ! कह- (अब) परमात्मा के भरोसे पर किसी और (के आसरे) को एक पल के लिए भी अपने मन में नहीं मानता। 2। 11। 97।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! विकारों से मुकाबले में) पूरे गुरू ने मेरी इज्जत रख ली है। गुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल हरी-नाम मेरे हृदय में बसा दिया है। (उस नाम की बरकति से) अनेकों जन्मों के किए कर्मों की मैल मेरे मन में से दूर हो गई है। 1। रहाउ। हे भाई ! पूरे गुरू का बताया हुआ हरी-नाम का जाप जब से मैंने जपना शुरू किया है। (कामादिक) सारे वैरी दुर्जन भाग गए हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हरी-नाम का स्वाद मुझे ऐसा आया कि मैं वह बयान नहीं कर सकता।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।