जालु पसारि चोग बिसथारी पंखी जिउ फाहावत हे ॥
कहु नानक बंधन काटन कउ मै सतिगुरु पुरखु धिआवत हे ॥4॥2॥88॥
हरि हरि नामु अपार अमोली ॥
प्रान पिआरो मनहि अधारो चीति चितवउ जैसे पान तंबोली ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि समाइओ गुरहि बताइओ रंगि रंगी मेरे तन की चोली ॥
प्रिअ मुखि लागो जउ वडभागो सुहागु हमारो कतहु न डोली ॥1॥
रूप न धूप न गंध न दीपा ओति पोति अंग अंग संगि मउली ॥
कहु नानक प्रिअ रवी सुहागनि अति नीकी मेरी बनी खटोली ॥2॥3॥89॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद मई ॥
जब ते भेटे साध दइआरा तब ते दुरमति दूरि भई ॥1॥ रहाउ ॥
पूरन पूरि रहिओ संपूरन सीतल सांति दइआल दई ॥
काम क्रोध त्रिसना अहंकारा तन ते होए सगल खई ॥1॥
सतु संतोखु दइआ धरमु सुचि संतन ते इहु मंतु लई ॥
कहु नानक जिनि मनहु पछानिआ तिन कउ सगली सोझ पई ॥2॥4॥90॥
किआ हम जीअ जंत बेचारे बरनि न साकह एक रोमाई ॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा बेअंत ठाकुर तेरी गति नही पाई ॥1॥
किआ कथीऐ किछु कथनु न जाई ॥
जह जह देखा तह रहिआ समाई ॥1॥ रहाउ ॥
जह महा भइआन दूख जम सुनीऐ तह मेरे प्रभ तूहै सहाई ॥
सरनि परिओ हरि चरन गहे प्रभ गुरि नानक कउ बूझ बुझाई ॥2॥5॥91॥
अगम रूप अबिनासी करता पतित पवित इक निमख जपाईऐ ॥
अचरजु सुनिओ परापति भेटुले संत चरन चरन मनु लाईऐ ॥1॥
कितु बिधीऐ कितु संजमि पाईऐ ॥
कहु सुरजन कितु जुगती धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
जो मानुखु मानुख की सेवा ओहु तिस की लई लई फुनि जाईऐ ॥
नानक सरनि सरणि सुख सागर मोहि टेक तेरो इक नाईऐ ॥2॥6॥92॥
संत सरणि संत टहल करी ॥
धंधु बंधु अरु सगल जंजारो अवर काज ते छूटि परी ॥1॥ रहाउ ॥
सूख सहज अरु घनो अनंदा गुर ते पाइओ नामु हरी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आप विकारों के नशे में मस्त हैं के आत्मिक जीवन की ओर से बेफिक्र हुआ पड़ा है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।