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अंग 822

अंग
822
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
द्रिसटि न आवहि अंध अगिआनी सोइ रहिओ मद मावत हे ॥3॥
जालु पसारि चोग बिसथारी पंखी जिउ फाहावत हे ॥
कहु नानक बंधन काटन कउ मै सतिगुरु पुरखु धिआवत हे ॥4॥2॥88॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आप विकारों के नशे में मस्त हैं के आत्मिक जीवन की ओर से बेफिक्र हुआ पड़ा है। 3। हे भाई ! जैसे किसी पंछी को पकड़ने के लिए जाल बिखरा के उसके ऊपर दाने बिखेरे जाते हैं। वैसे ही आप (भी दुनिया के पदार्थों की चोग के चक्कर में) फस रहा है। हे नानक ! कह- (हे भाई !) माया के बँधनों को काटने के लिए मैं तो गुरू महापुरुख को अपने हृदय में बसा रहा हूँ। 4। 2। 88।
बिलावलु महला 5 ॥
हरि हरि नामु अपार अमोली ॥
प्रान पिआरो मनहि अधारो चीति चितवउ जैसे पान तंबोली ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि समाइओ गुरहि बताइओ रंगि रंगी मेरे तन की चोली ॥
प्रिअ मुखि लागो जउ वडभागो सुहागु हमारो कतहु न डोली ॥1॥
रूप न धूप न गंध न दीपा ओति पोति अंग अंग संगि मउली ॥
कहु नानक प्रिअ रवी सुहागनि अति नीकी मेरी बनी खटोली ॥2॥3॥89॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे सहेली !) बेअंत हरी का नाम किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिल सकता। वह हरी का नाम मेरी जिंद का प्यारा बन गया है। मेरे मन का सहारा बन गया है। जैसे कोई पान बेचने वाली (अपने) पानों का ख्याल रखती है। वैसे ही मैं हरी-नाम को अपने चित्त में चितारती रहती हूँ। 1। रहाउ। (हे सखी !) जब गुरू ने मुझे (भेद) बता दिया। तो मैं आत्मिक अडोलता में लीन हो गई। अब मेरी शरीर चोली प्रभू के प्रेम रंग में रंगी गई है। जब से (गुरू की कृपा से) मेरे अहो भाग्य जाग उठे हैं तब से मुझे प्यारे के दर्शन हो रहे हैं। अब मेरा ये सोहाग (मेरे सिर से) दूर नहीं होएगा। 1। (हे सखी !) ना कोई सुंदर पदार्थ। ना कोई धूप। ना सुगंधियाँ। ना दीए (-कोई भी ऐसे पदार्थ मैंने अपने पति देव के आगे भेटा नहीं किए। गुरू की कृपा से ही) मेरा स्वै प्रभू-पति के साथ एक-मेक हो गया है। उसके साथ मिल के मेरा मन खिल उठा है। हे नानक ! कह- (हे सहेली !) प्यारे प्रभू ने मुझे सुहागिन बना के अपने साथ मिला लिया है। अब मेरी हृदय-सेज बहुत ही सुंदर बन गई है। 2। 3। 89।
बिलावलु महला 5 ॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद मई ॥
जब ते भेटे साध दइआरा तब ते दुरमति दूरि भई ॥1॥ रहाउ ॥
पूरन पूरि रहिओ संपूरन सीतल सांति दइआल दई ॥
काम क्रोध त्रिसना अहंकारा तन ते होए सगल खई ॥1॥
सतु संतोखु दइआ धरमु सुचि संतन ते इहु मंतु लई ॥
कहु नानक जिनि मनहु पछानिआ तिन कउ सगली सोझ पई ॥2॥4॥90॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ सदा गोबिंद का नाम सिमर-सिमर के वह गोबिंद का ही रूप हो जाता है। हे भाई ! जब से (किसी मनुष्य को) दया का श्रोत गुरू मिल जाता है। तब से (उसके अंदर से) खोटी मति दूर हो जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जब किसी मनुष्य को गुरू मिल जाता है तब उसे निश्चय हो जाता है कि) दया और शांति का पुँज सारे गुणों से भरपूर प्यारा प्रभू हर जगह व्यापक है। (सिमरन की बरकति से) उसके शरीर में से काम-क्रोध-तृष्णा-अहंकार आदि सारे विकार नाश हो जाते हैं। 1। (हे भाई ! जब किसी मनुष्य को गुरू मिल जाता है। वह) सेवा। संतोख। दया। धर्म। पवित्र जीवन (अपने अंदर पैदा करने का) यह उपदेश संतजनों से ग्रहण करता है। हे नानक ! कह- जिस जिस मनुष्य ने अपने मन के द्वारा (गुरू के साथ) सांझ बनाई। उन्हें (ऊँचे आत्मिक जीवन की) सारी समझ आ गई। 2। 4। 90।
बिलावलु महला 5 ॥
किआ हम जीअ जंत बेचारे बरनि न साकह एक रोमाई ॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा बेअंत ठाकुर तेरी गति नही पाई ॥1॥
किआ कथीऐ किछु कथनु न जाई ॥
जह जह देखा तह रहिआ समाई ॥1॥ रहाउ ॥
जह महा भइआन दूख जम सुनीऐ तह मेरे प्रभ तूहै सहाई ॥
सरनि परिओ हरि चरन गहे प्रभ गुरि नानक कउ बूझ बुझाई ॥2॥5॥91॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे मेरे मालिक ! (हम जीव आपके पैदा किए हुए हैं) हम बिचारे जीवों की कोई बिसात ही नहीं कि आपकी बाबत एक रोम जितना भी कुछ कह सकें। (हम साधारण जीव तो किसी गिनती में ही नहीं) ब्रहमा। शिव। सिद्ध। मुनी। इन्द्र (आदि जैसे) बेअंत ये समझ नहीं सके कि आप कैसा है। 1। हे भाई ! (परमात्मा कैसा है। – ये बात) क्या बताएं। बताई नहीं जा सकती। मैं तो जिधर देखता हूँ। उधर परमात्मा ही सब जगह मौजूद है। 1। रहाउ। हे मेरे प्रभू ! जहाँ ये सुना जाता है कि जमों के बड़े ही भयानक दुख मिलते हैं। वहीं आप ही (बचाने के लिए) मददगार है- गुरू ने (मुझे) नानक को यह समझ दी है। तभी मैं नानक आपकी शरण आ पड़ा हूँ। आपके चरण पकड़ लिए हैं। 2। 5। 91।
बिलावलु महला 5 ॥
अगम रूप अबिनासी करता पतित पवित इक निमख जपाईऐ ॥
अचरजु सुनिओ परापति भेटुले संत चरन चरन मनु लाईऐ ॥1॥
कितु बिधीऐ कितु संजमि पाईऐ ॥
कहु सुरजन कितु जुगती धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
जो मानुखु मानुख की सेवा ओहु तिस की लई लई फुनि जाईऐ ॥
नानक सरनि सरणि सुख सागर मोहि टेक तेरो इक नाईऐ ॥2॥6॥92॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! विकारियों को पवित्र करने वाले। अपहुँच हस्ती वाले नाश-रहित करतार को हर पल जपते रहना चाहिए। ये सुनते हैं कि वह आश्चर्य है आश्चर्य है। (उससे) मिलाप हो जाता है अगर संतजनों के चरणों से मिलाप प्राप्त हो जाए। (तो संतजनों के) चरणों में मन जोड़ना चाहिए। 1। किस बिधि से। किस संजम से वह मिल सकता है। हे भले पुरुष ! (मुझे) बताओ कि परमात्मा को किस तरीके से सिमरना चाहिए। 1। रहाउ हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) जो मनुष्य किसी और मनुष्य की (कोई) सेवा करता है वह उसकी की हुई सेवा को सदा ही बार-बार याद करता रहता है; पर हे प्रभू ! आप सुखों का समुंद्र है (आप अनेकों ही सुख बख्शता है इस वास्ते) मैं सदा आपकी ही शरण आपकी ही शरण पड़ा रहूँगा। मुझे सिर्फ आपके नाम का ही सहारा है। 2। 6। 92।
बिलावलु महला 5 ॥
संत सरणि संत टहल करी ॥
धंधु बंधु अरु सगल जंजारो अवर काज ते छूटि परी ॥1॥ रहाउ ॥
सूख सहज अरु घनो अनंदा गुर ते पाइओ नामु हरी ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जब मैं गुरू की शरण आ पड़ा। जब मैं गुरू की सेवा करने लग पड़ा। (मेरे अंदर से) धंधा। बंधन और सारा जंजाल (समाप्त हो गए)। मेरी बिरती और और काम से मुक्त हो गई। 2। हे भाई ! गुरू से मैंने परमात्मा का नाम प्राप्त हासिल कर लिया (जिसकी बरकति से) आत्मिक अडोलता का सुख और आनंद (मेरे अंदर उत्पन्न हो गया)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आप विकारों के नशे में मस्त हैं के आत्मिक जीवन की ओर से बेफिक्र हुआ पड़ा है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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