रोग मिटाइ जीवालिअनु जा का वड परतापु ॥1॥
दोख हमारे बखसिअनु अपणी कल धारी ॥
मन बांछत फल दितिअनु नानक बलिहारी ॥2॥16॥80॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए ॥ साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए ॥1॥ रहाउ ॥
सेवत सेवि सेवि साध सेवउ सदा करउ किरताए ॥
अभै दानु पावउ पुरख दाते मिलि संगति हरि गुण गाए ॥1॥
रसना अगह अगह गुन राती नैन दरस रंगु लाए ॥
होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन मोहि चरण रिदै वसाए ॥2॥
सभहू तलै तलै सभ ऊपरि एह द्रिसटि द्रिसटाए ॥
अभिमानु खोइ खोइ खोइ खोई हउ मो कउ सतिगुर मंत्रु द्रिड़ाए ॥3॥
अतुलु अतुलु अतुलु नह तुलीऐ भगति वछलु किरपाए ॥
जो जो सरणि परिओ गुर नानक अभै दानु सुख पाए ॥4॥1॥81॥
प्रभ जी तू मेरे प्रान अधारै ॥
नमसकार डंडउति बंदना अनिक बार जाउ बारै ॥1॥ रहाउ ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत इहु मनु तुझहि चितारै ॥
सूख दूख इसु मन की बिरथा तुझ ही आगै सारै ॥1॥
तू मेरी ओट बल बुधि धनु तुम ही तुमहि मेरै परवारै ॥
जो तुम करहु सोई भल हमरै पेखि नानक सुख चरनारै ॥2॥2॥82॥
सुनीअत प्रभ तउ सगल उधारन ॥
मोह मगन पतित संगि प्रानी ऐसे मनहि बिसारन ॥1॥ रहाउ ॥
संचि बिखिआ ले ग्राहजु कीनी अंम्रितु मन ते डारन ॥
काम क्रोध लोभ रतु निंदा सतु संतोखु बिदारन ॥1॥
इन ते काढि लेहु मेरे सुआमी हारि परे तुम॑ सारन ॥
नानक की बेनंती प्रभ पहि साधसंगि रंक तारन ॥2॥3॥83॥
संतन कै सुनीअत प्रभ की बात ॥
कथा कीरतनु आनंद मंगल धुनि पूरि रही दिनसु अरु राति ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा अपने प्रभि कीने नाम अपुने की कीनी दाति ॥
आठ पहर गुन गावत प्रभ के काम क्रोध इसु तन ते जात ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस प्रभू का (सबसे) बड़ा तेज-प्रताप है उस ने अपने भक्तों की आरजू (सदा) सुनी है (उनके अंदर से) रोग मिटा के उनको आत्मिक जीवन की दाति बख्शी है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।