Lulla Family

अंग 820

अंग
820
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भगत जना की बेनती सुणी प्रभि आपि ॥
रोग मिटाइ जीवालिअनु जा का वड परतापु ॥1॥
दोख हमारे बखसिअनु अपणी कल धारी ॥
मन बांछत फल दितिअनु नानक बलिहारी ॥2॥16॥80॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस प्रभू का (सबसे) बड़ा तेज-प्रताप है उस ने अपने भक्तों की आरजू (सदा) सुनी है (उनके अंदर से) रोग मिटा के उनको आत्मिक जीवन की दाति बख्शी है। 1। हे भाई ! उस प्रभू-पिता ने हम बच्चों के ऐब सदा माफ कर दिए हैं। और हमारे अंदर अपने नाम की ताकत भरी है। हे नानक ! प्रभू पिता ने हम बच्चों को सदा मन-मांगे फल दिए हैं। उस प्रभू से सदा सदके जाना चाहिए। 2। 16। 80।
रागु बिलावलु महला 5 चउपदे दुपदे घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए ॥ साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए ॥1॥ रहाउ ॥
सेवत सेवि सेवि साध सेवउ सदा करउ किरताए ॥
अभै दानु पावउ पुरख दाते मिलि संगति हरि गुण गाए ॥1॥
रसना अगह अगह गुन राती नैन दरस रंगु लाए ॥
होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन मोहि चरण रिदै वसाए ॥2॥
सभहू तलै तलै सभ ऊपरि एह द्रिसटि द्रिसटाए ॥
अभिमानु खोइ खोइ खोइ खोई हउ मो कउ सतिगुर मंत्रु द्रिड़ाए ॥3॥
अतुलु अतुलु अतुलु नह तुलीऐ भगति वछलु किरपाए ॥
जो जो सरणि परिओ गुर नानक अभै दानु सुख पाए ॥4॥1॥81॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 चउपदे दुपदे घरु 6 सतिगुर प्रसादि ॥ हे मेरे मोहन ! ऐसे बोल मेरे कानों में ना पड़ें। परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य (जो गंदे) गीतों नादों धुनियों के बोल बोलते हैं और गाते हैं वह (आत्मिक जीवन के लिए) व्यर्थ हैं।1। रहाउ। हे सर्व-व्यापक दातार ! मैं सदा ही हर वक्त गुरू की शरण पड़ा रहूँ। मैं सदा यही काम करता रहूँ। हे हरी ! (मेहर कर) गुरू की संगति में मिल के। आपके गुण गा के मैं (आपके दर से) निर्भयता की दाति प्राप्त करूँ।1। मेरी आँखें आपके दर्शन कर-करके मेरी जीभ आप अपहुँच के गुणों में रति रहे। हे दीनों के दुख दूर करने वाले ! (मुझ पर) दयावान हो। अपने चरण मेरे हृदय में बसाए रख। 2। हे मोहन ! मेरी निगाह में ऐसी ज्योति पैदा कर कि मैं अपने आप को सबसे नीच समझूँ और सबको अपने से ऊँचा जानूँ। हे मोहन ! मेरे दिल में गुरू का उपदेश पक्का कर दे। ता कि मैं सदा के लिए अपने अंदर से अहंकार दूर कर दूँ। 3। हे मोहन ! आप अतुल है। आप अतुल है। आप अतुल है। (आपके बड़प्पन को) तोला नहीं जा सकता। आप भक्ति को प्यार करने वाला है। आप सबके ऊपर कृपा करता है। हे नानक ! (मोहन-प्रभू की कृपा से) जो जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह निर्भयता की दाति हासिल कर लेता है। वह सदा आत्मिक आनंद पाता है। 4। 1। 81।
बिलावलु महला 5 ॥
प्रभ जी तू मेरे प्रान अधारै ॥
नमसकार डंडउति बंदना अनिक बार जाउ बारै ॥1॥ रहाउ ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत इहु मनु तुझहि चितारै ॥
सूख दूख इसु मन की बिरथा तुझ ही आगै सारै ॥1॥
तू मेरी ओट बल बुधि धनु तुम ही तुमहि मेरै परवारै ॥
जो तुम करहु सोई भल हमरै पेखि नानक सुख चरनारै ॥2॥2॥82॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप (ही) मेरी जिंद का सहारा है। हे प्रभू ! मैं आपके ही आगे नमस्कार करता हूँ। दण्डवत् करके नमस्कार करता हूँ। मैं अनेकों बार आपसे सदके जाता हूँ। 1। रहाउ। हे प्रभू ! उठते। बैठते। सोते। जागते (हर वक्त) मेरा ये मन आपको ही याद करता रहता है। मेरा ये मन अपना सुख अपना दुख अपनी हरेक पीड़ा आपके ही आगे रखता है। 1। हे प्रभू ! आप ही मेरा सहारा है। आप ही मेरा माण है। आप ही मेरा ताण (बल) है। आप ही मेरी बुद्धि है। आप ही मेरी समृद्धि (धन) है। और आप ही मेरे वास्ते मेरा परिवार है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) जो कुछ आप करता है मेरे वास्ते वही भलाई है। आपके चरणों के दर्शन करके मुझे आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 2। 2। 82।
बिलावलु महला 5 ॥
सुनीअत प्रभ तउ सगल उधारन ॥
मोह मगन पतित संगि प्रानी ऐसे मनहि बिसारन ॥1॥ रहाउ ॥
संचि बिखिआ ले ग्राहजु कीनी अंम्रितु मन ते डारन ॥
काम क्रोध लोभ रतु निंदा सतु संतोखु बिदारन ॥1॥
इन ते काढि लेहु मेरे सुआमी हारि परे तुम॑ सारन ॥
नानक की बेनंती प्रभ पहि साधसंगि रंक तारन ॥2॥3॥83॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! आपकी बाबत सुना जाता है कि आप सारे जीवों को विकारों से बचाने वाला है। (आप उनको भी बचा लेता है। जो) मोह में डूबे हुए विकारों में गिरे हुए प्राणियों के साथ उठना-बैठना रखते हैं और बड़ी बेपरवाही से आपको मन से भुलाए रखते हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (आपके पैदा किए हुए जीव) माया इकट्ठी करके ही इसको ग्रहण करने योग्य बनाते हैं। पर आत्मिक जीवन देने वाला आपका नाम-जल अपने मन से परे फेंक देते हैं। (ऐसे) जीव काम-क्रोध-लोभ-निंदा (आदि विकारों) में मस्त रहते हैं और सेवा-संतोख आदि गुण को कतरा-कतरा कर रहे हैं (हे प्रभू ! मेहर कर। इनको विकारों से बचा ले)। 1। हे मेरे मालिक प्रभू ! इन विकारों से हमें बचा ले (हमारी इनके आगे पेश नहीं जाती) हार के आपकी शरण आ पड़े हैं। हे प्रभू ! (आपके दर के सेवक) नानक की (आपके आगे) आरजू है कि आत्मिक जीवन से बिल्कुल वंचित लोगों को भी साध-संगति में ला के (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 2। 3। 83।
बिलावलु महला 5 ॥
संतन कै सुनीअत प्रभ की बात ॥
कथा कीरतनु आनंद मंगल धुनि पूरि रही दिनसु अरु राति ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा अपने प्रभि कीने नाम अपुने की कीनी दाति ॥
आठ पहर गुन गावत प्रभ के काम क्रोध इसु तन ते जात ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! साध-संगत में प्रभू की सिफत-सालाह की कथा-वार्ता (सदा) सुनी जाती है। वहाँ दिन-रात हर वक्त प्रभू की कथा-कहानियाँ होती हैं। कीर्तन होता है। आत्मिक आनंद हिल्लौरे पैदा करने वाली धुनि सदा चली रहती है। 1। रहाउ। हे भाई ! संतजनों को प्रभू ने मेहर करके अपने सेवक बना लिया होता है। उनको अपने नाम की दाति बख्शी होती है। आठों पहर प्रभू के गुण गाते-गाते (उनके) इस शरीर में से काम-क्रोध (आदि विकार) दूर हो जाते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस प्रभू का (सबसे) बड़ा तेज-प्रताप है उस ने अपने भक्तों की आरजू (सदा) सुनी है (उनके अंदर से) रोग मिटा के उनको आत्मिक जीवन की दाति बख्शी है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English