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अंग 821

अंग
821
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
त्रिपति अघाए पेखि प्रभ दरसनु अंम्रित हरि रसु भोजनु खात ॥
चरन सरन नानक प्रभ तेरी करि किरपा संतसंगि मिलात ॥2॥4॥84॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! संत जन प्रभू के दर्शन करके (माया की तृष्ण की ओर से) पूरी तौर पर तृप्त रहते हैं। संत जन सदा आत्मिक जीवन देने वाला नाम हरी-नाम का स्वादिष्ट भोजन खाते हैं। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! जो मनुष्य आपके चरणों की शरण में आते हैं। आप कृपा करके उनको संत जनों की संगति में मिला देता है। 2। 4। 84।
बिलावलु महला 5 ॥
राखि लीए अपने जन आप ॥
करि किरपा हरि हरि नामु दीनो बिनसि गए सभ सोग संताप ॥1॥ रहाउ ॥
गुण गोविंद गावहु सभि हरि जन राग रतन रसना आलाप ॥
कोटि जनम की त्रिसना निवरी राम रसाइणि आतम ध्राप ॥1॥
चरण गहे सरणि सुखदाते गुर कै बचनि जपे हरि जाप ॥
सागर तरे भरम भै बिनसे कहु नानक ठाकुर परताप ॥2॥5॥85॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा ने सदा अपने सेवकों की रक्षा की है। मेहर करके (अपने सेवकों को) अपने नाम की दाति देता आया है (जिनको नाम की दाति बख्शता है उनकी) सारी चिंता-फिक्रें व दुख-कलेश नाश हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे संत जनो ! सारे (मिल के) प्रभू के गुण गाते रहा करो। जीभ से सुंदर रागों में उसके गुणों का उच्चारण करते रहा करो। (जो मनुष्य प्रभू के गुणों का उच्चारण करते हैं। उनकी) करोड़ों जन्मों की (माया की) तृष्णा दूर हो जाती है। सब रसों से श्रेष्ठ राम-रस की बरकति से उनका मन तृप्त हो जाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य सुखों के दाता प्रभू के चरण पकड़ के रखते हैं। सुखदाते प्रभू की शरण पड़े रहते हैं। गुरू के उपदेश के द्वारा प्रभू के नाम का जाप जपते रहते हैं। वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। हे नानक ! कह- यह सारी महानता मालिक प्रभू की ही है। 2। 5। 85।
बिलावलु महला 5 ॥
तापु लाहिआ गुर सिरजनहारि ॥
सतिगुर अपने कउ बलि जाई जिनि पैज रखी सारै संसारि ॥1॥ रहाउ ॥
करु मसतकि धारि बालिकु रखि लीनो ॥
प्रभि अंम्रित नामु महा रसु दीनो ॥1॥
दास की लाज रखै मिहरवानु ॥
गुरु नानकु बोलै दरगह परवानु ॥2॥6॥86॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू ने करतार ने (खुद बालक हरिगोबिंद का) ताप उतारा है। मैं अपने गुरू से सदा सदके जाता हूँ। जिसने सारे संसार में (मेरी) इज्जत रख ली है (नहीं तो। भ्रमित लोग तो। सीतला देवी आदि की पूजा के लिए खूब प्रेरणा करते रहे)। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू ने अपना हाथ (बालक के) सिर पर रख कर बालक को (ताप से) बचा लिया (सिर्फ ताप से ही नहीं बचाया। ईश्वर को छोड़ के किसी और की पूजा से बचा के) प्रभू ने आत्मिक जीवन देने वाला और सबसे श्रेष्ठ रस वाला अपना नाम भी दिया है। 1। मेहरवान प्रभू अपने सेवक की इज्जत (अवश्य) रखता है (सो। (हे भाई ! याद रख) गुरू नानक (वही कुछ) कहता है (जो परमात्मा की) दरगाह में परवान है (और। हे भाई ! दुख-कलेश के वक्त घबरा के और-और के आसरे ना ढूँढते फिरो)। 2। 6। 86।
रागु बिलावलु महला 5 चउपदे दुपदे घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर सबदि उजारो दीपा ॥
बिनसिओ अंधकार तिह मंदरि रतन कोठड़ी खुल॑ी अनूपा ॥1॥ रहाउ ॥
बिसमन बिसम भए जउ पेखिओ कहनु न जाइ वडिआई ॥
मगन भए ऊहा संगि माते ओति पोति लपटाई ॥1॥
आल जाल नही कछू जंजारा अहंबुधि नही भोरा ॥
ऊचन ऊचा बीचु न खीचा हउ तेरा तूं मोरा ॥2॥
एकंकारु एकु पासारा एकै अपर अपारा ॥
एकु बिसथीरनु एकु संपूरनु एकै प्रान अधारा ॥3॥
निरमल निरमल सूचा सूचो सूचा सूचो सूचा ॥
अंत न अंता सदा बेअंता कहु नानक ऊचो ऊचा ॥4॥1॥87॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 चउपदे दुपदे घरु 7 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जिस मन-मन्द्रिर में गुरू के शबद-दीप से (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। उस मन-मन्दिर में आत्मिक गुण-रत्नों की बहुत ही सुंदर कोठड़ी खुल जाती है (जिसकी बरकति से नीच जीवन वाले) अंधकार का वहाँ से नाश हो जाता है। 1। रहाउ। (गुरू शबद-दीपक की रौशनी में) जब (अंदर बस रहे) प्रभू के दर्शन होते हैं तब मेर-तेर वाली सारी सुधें भूल जाती हैं। पर उस अवस्था की महानता बयान नहीं की जा सकती। जैसे ताने-पेटे के उने हुए धागे आपस में मिले होते हैं। वैसे ही उस प्रभू में ही सुरति डूब जाती है। उस प्रभू के चरणों में ही मस्त हो जाते हैं। उसके चरणों से ही चिपके रहते हैं। 1। (हे भाई ! गुरू के शबद-दीपक से जब मन-मन्दिर में प्रकाश होता है। तब उस अवस्था में) गृहस्त के मोह के जाल और झमेले महिसूस ही नहीं होते। अंदर कहीं रक्ती भर भी ‘मैं मैं’ करने वाली बुद्धि नहीं रह जाती। तब मन-मन्दिर में वह महान ऊँचा परमात्मा ही बसता दिखाई देता है। उससे कोई पर्दा नहीं रह जाता। (उस वक्त उसे यही कहते हैं-हे प्रभू !) मैं आपका (दास) हूँ। आप मेरा (मालिक) है। 2। (हे भाई ! गुरू के शबद-दीपक से जब मन-मन्दिर में आत्मिक जीवन का प्रकाश होता है। तब बाहर जगत में भी) एक ही सर्व-व्यापक बेअंत परमात्मा स्वयं ही स्वयं पसरा हुआ दिखाई देता है। वह स्वयं ही बिखरा हुआ (उसका विस्तार) और व्यापक प्रतीत होता है। वही जीवों की जिंदगी का आसरा दिखता है। 3। हे नानक ! कह- (जब मन-मन्दिर में गुर-शबद-दीपक का प्रकाश होता है तब ये स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाता है कि) परमात्मा महान पवित्र है। महान स्वच्छ है। उसका कभी अंत नहीं पड़ सकता। वह सदा ही बेअंत है। और ऊँचों से ऊँचा है (उस जैसा ऊँचा और कोई नहीं)। 4। 1। 87।
बिलावलु महला 5 ॥
बिनु हरि कामि न आवत हे ॥
जा सिउ राचि माचि तुम॑ लागे ओह मोहनी मोहावत हे ॥1॥ रहाउ ॥
कनिक कामिनी सेज सोहनी छोडि खिनै महि जावत हे ॥
उरझि रहिओ इंद्री रस प्रेरिओ बिखै ठगउरी खावत हे ॥1॥
त्रिण को मंदरु साजि सवारिओ पावकु तलै जरावत हे ॥
ऐसे गड़ महि ऐठि हठीलो फूलि फूलि किआ पावत हे ॥2॥
पंच दूत मूड परि ठाढे केस गहे फेरावत हे ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना (कोई और चीज आपके आत्मिक जीवन के) काम नहीं आ सकती। जिस मन-मोहनी माया के साथ आप रचा-मिचा रहता है। वह तो आपको ठॅग रही है। 1। रहाउ। हे भाई ! सोना (धन-पदार्थ)। स्त्री की सुंदर सेज- ये तो एक छिन में छोड़ के मनुष्य यहाँ से चल पड़ता है। काम-वासना के स्वादों से प्रेरित हुआ आप काम-वासना में फंसा पड़ा है। और विषौ-विकारों की ठॅग-बूटी खा रहा है (जिसके कारण आप आत्मिक जीवन की ओर से बेहोश पड़ा है)। 1। हे भाई ! तीलियों का घर बना-सँवार के आप उसके नीचे आग जला रहा है (इस शरीर में कामादिक विकारों के शोले भड़का के आत्मिक जीवन को राख किए जा रहा है। विकारों में जल रहे) इस शरीर-किले में अकड़ के जिद्दी हुआ बैठा आप गुमान कर-कर के हासिल तो कुछ भी नहीं कर रहा। 2। हे अंधे-अज्ञानी ! कामादिक पाँचों वैरी आपके सिर पर खड़े हुए आपको ज़लील कर रहे हैं। पर आपको वे दिखाई नहीं देते।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! संत जन प्रभू के दर्शन करके (माया की तृष्ण की ओर से) पूरी तौर पर तृप्त रहते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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