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अंग 819

अंग
819
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जै जै कारु जगत महि सफल जा की सेव ॥1॥
ऊच अपार अगनत हरि सभि जीअ जिसु हाथि ॥
नानक प्रभ सरणागती जत कत मेरै साथि ॥2॥10॥74॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मित्रो ! जिस प्रभू की सेवा-भगती मनोरथ पूरे करती है। (उसके निरे मनोरथ ही पूरे नहीं होते) सारे जगत में उसकी शोभा होती है। 1। हे नानक ! जो प्रभू ! (सबसे) ऊँचा है। बेअंत है। जिसके गुण गिने नहीं जा सकते। सारे ही जीव जिसके वश में हैं। (आप उस) प्रभू की शरण पड़ा रह (और। विश्वास रख कि) वह प्रभू हर जगह मेरे अंग-संग है। 2। 10। 74।
बिलावलु महला 5 ॥
गुरु पूरा आराधिआ होए किरपाल ॥
मारगु संति बताइआ तूटे जम जाल ॥1॥
दूख भूख संसा मिटिआ गावत प्रभ नाम ॥
सहज सूख आनंद रस पूरन सभि काम ॥1॥ रहाउ ॥
जलनि बुझी सीतल भए राखे प्रभि आप ॥
नानक प्रभ सरणागती जा का वड परताप ॥2॥11॥75॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य पूरे गुरू को हृदय में बसाए रखता है। जिस पर गुरू दयावान होता है। जिस मनुष्य को गुरू ने (सही जीवन का) रास्ता बता दिया। उसकी जम वाली सारी जंजीरें टूट जाती हैं (उसके वह मानसिक बंधन टूट जाते हैं। जो आत्मिक मौत लाने के लिए जिम्मेवार हैं)। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए सारे दुख। सारी भूखें। सारे सहम मिट जाते हैं। (नाम की बरकति से) आत्मिक अडोलता के सुख आनंद स्वाद (प्राप्त हो जाते हैं)। सारी आवश्यक्ताएं पूरी हो जाती हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने प्रभू का नाम सिमरा) प्रभू ने खुद (उसकी जम जाल से) रक्षा की (उसके अंदर से विकारों की) जलन मिट गई। उसका मन शीतल हो गया। हे नानक ! जिस प्रभू में इतनी बड़ी ताकत है आप भी उसकी शरण पड़ा रह। 2। 11। 75।
बिलावलु महला 5 ॥
धरति सुहावी सफल थानु पूरन भए काम ॥
भउ नाठा भ्रमु मिटि गइआ रविआ नित राम ॥1॥
साध जना कै संगि बसत सुख सहज बिस्राम ॥
साई घड़ी सुलखणी सिमरत हरि नाम ॥1॥ रहाउ ॥
प्रगट भए संसार महि फिरते पहनाम ॥
नानक तिसु सरणागती घट घट सभ जान ॥2॥12॥76॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ उसका शरीर सुंदर हो जाता है (उसकी ज्ञानेन्द्रियां सदाचारी हो जाती हैं)। उसका हृदय-स्थल जीवन-मनोरथ पूरा करने वाला बन जाता है। उसके सारे काम सिरे चढ़ जाते हैं। (हे भाई ! जो मनुष्य साधसंगति में टिक के) प्रभू का नाम सिमरता है। (उसके मन में से हरेक किस्म का) डर दूर हो जाता है। भटकना मिट जाती है। 1। हे भाई ! गुरमुखों के संगति में टिके रहने से आत्मिक अडोलता का आनंद प्राप्त होता है। (मन को) शांति मिलती है। (हे भाई ! मनुष्य के जीवन में) वही घड़ी भाग्यशाली होती है (जब मनुष्य गुरमुखों की संगति में रह के) परमात्मा का नाम सिमरता है। 1।रहाउ ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों को पहले कोई जानता-पहचानता नहीं था (साध-संगति में टिक के सिमरन की बरकति से) वे जगत में मशहूर हो जाते हैं। हे नानक ! (साध-संगति का आसरा ले के) उस परमात्मा की शरण पड़े रहना चाहिए जो हरेक जीव के दिल की हरेक बात जानने वाला है। 2। 12। 76।
बिलावलु महला 5 ॥
रोगु मिटाइआ आपि प्रभि उपजिआ सुखु सांति ॥
वड परतापु अचरज रूपु हरि कीन॑ी दाति ॥1॥
गुरि गोविंदि क्रिपा करी राखिआ मेरा भाई ॥
हम तिस की सरणागती जो सदा सहाई ॥1॥ रहाउ ॥
बिरथी कदे न होवई जन की अरदासि ॥
नानक जोरु गोविंद का पूरन गुणतासि ॥2॥13॥77॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ प्रभू ने खुद ही (मेरे प्यारे का) रोग दूर किया है। (उसकी मेहर से) सुख मिला है शांति मिली है। हे भाई ! वह परमात्मा बड़े प्रताप वाला है। आश्चर्य स्वरूप वाला है। उसी ने ही (मेरे पर) बख्शिश की है।1। गुरू ने परमात्मा ने (ही मेरे ऊपर) कृपा की है। मेरे प्यारे को (हाथ दे के) बचा लिया है। हे भाई ! मैंने तो उस परमात्मा का ही आसरा लिया हुआ है। जो सदा सहायता करने वाला है। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई ! प्रभू के दर के ही सेवक बने रहो) सेवक की आरजू कभी खाली नहीं जाती (प्रभू जरूर सहायता करता है। और। रोग आदि से खुद ही बचाता है)। वह परमात्मा सारे गुणों का खजाना है। सारे गुणों से भरपूर है। मुझे तो उस परमात्मा का ही आसरा है। 2। 13। 77।
बिलावलु महला 5 ॥
मरि मरि जनमे जिन बिसरिआ जीवन का दाता ॥
पारब्रहमु जनि सेविआ अनदिनु रंगि राता ॥1॥
सांति सहजु आनदु घना पूरन भई आस ॥
सुखु पाइआ हरि साधसंगि सिमरत गुणतास ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुआमी अरदासि जन तुम॑ अंतरजामी ॥
थान थनंतरि रवि रहे नानक के सुआमी ॥2॥14॥78॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों को जिंदगी देने वाला परमात्मा भूल जाता है। वह आत्मिक मौत सहेड़ के जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। पर प्रभू के सेवक ने प्रभू को हर वक्त सिमरा है। (प्रभू का सेवक प्रभू के) प्रेम-रंग में रंगा रहता है। 1। (सेवक के हृदय में) शांति। आत्मिक अडोलता और बहुत आनंद बना रहता है। (सेवक की) हरेक कामना पूरी हो जाती है। (हे भाई ! सेवक ने) गुणों के खजाने हरी (का नाम) साध-संगति में सिमरते हुए (सदा) आत्मिक आनंद प्राप्त किया है।1। रहाउ। आप हरेक के दिल की जानने वाला है। आप (अपने) सेवक की अरदास (सदा) सुनता है। हे सवामी ! नानक के मालिक ! आप हर जगह में बसता है। 2। 14। 78।
बिलावलु महला 5 ॥
ताती वाउ न लगई पारब्रहम सरणाई ॥
चउगिरद हमारै राम कार दुखु लगै न भाई ॥1॥
सतिगुरु पूरा भेटिआ जिनि बणत बणाई ॥
राम नामु अउखधु दीआ एका लिव लाई ॥1॥ रहाउ ॥
राखि लीए तिनि रखनहारि सभ बिआधि मिटाई ॥
कहु नानक किरपा भई प्रभ भए सहाई ॥2॥15॥79॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा की शरण पड़ने से (व्याधियों का) सेक नहीं लगता। हे भाई ! हम जीवों के चारों तरफ परमात्मा का नाम (मानो) एक लकीर है (जिसकी बरकति से) कोई दुख छू नहीं सकता। 1। हे भाई ! जिस गुरू ने (परमात्मा का नाम-दवा दे के जीवों के रोग दूर करने की) बिउंत बना रखी है। वह पूरा गुरू (जिस मनुष्य को) मिल जाता है और परमात्मा का नाम दवाई देता है। वह मनुष्य सदा परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है। 1। रहाउ। हे नानक ! कह- (जिस मनुष्य को गुरू मिल गया उसको) उस रखवाले प्रभू ने बचा लिया। (उसके अंदर से) हरेक रोग दूर कर दिया। उस मनुष्य पर प्रभू की कृपा हो गई। प्रभू उस मनुष्य का मददगार बन गया। 2। 15। 79।
बिलावलु महला 5 ॥
अपणे बालक आपि रखिअनु पारब्रहम गुरदेव ॥
सुख सांति सहज आनद भए पूरन भई सेव ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा सबसे बड़ा देवता (है। हम जीव उसके बच्चे हैं) अपने बच्चों की वह सदा ही स्वयं रक्षा करता आया है। (जो मनुष्य उसकी शरण पड़ते हैं। उनके अंदर) शांति। आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद पैदा होते हैं। उनकी सेवा-सिमरन की मेहनत सफल हो जाती है। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मित्रो ! जिस प्रभू की सेवा-भगती मनोरथ पूरे करती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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