भए किरपाल गोपाल प्रभ मेरे साधसंगति निधि मानिआ ॥
सरबसो सूख आनंद घन पिआरे हरि रतनु मन अंतरि सीवते ॥
इकु तिलु नही विसरै प्रान आधारा जपि जपि नानक जीवते ॥3॥
जो तउ कीने आपणे तिना कूं मिलिओहि ॥
आपे ही आपि मोहिओहु जसु नानक आपि सुणिओहि ॥1॥
प्रेम ठगउरी पाइ रीझाइ गोबिंद मनु मोहिआ जीउ ॥
संतन कै परसादि अगाधि कंठे लगि सोहिआ जीउ ॥
हरि कंठि लगि सोहिआ दोख सभि जोहिआ भगति लख्यण करि वसि भए ॥
मनि सरब सुख वुठे गोविद तुठे जनम मरणा सभि मिटि गए ॥
सखी मंगलो गाइआ इछ पुजाइआ बहुड़ि न माइआ होहिआ ॥
करु गहि लीने नानक प्रभ पिआरे संसारु सागरु नही पोहिआ ॥4॥
साई नामु अमोलु कीम न कोई जाणदो ॥
जिना भाग मथाहि से नानक हरि रंगु माणदो ॥1॥
कहते पवित्र सुणते सभि धंनु लिखतंी कुलु तारिआ जीउ ॥
जिन कउ साधू संगु नाम हरि रंगु तिनी ब्रहमु बीचारिआ जीउ ॥
ब्रहमु बीचारिआ जनमु सवारिआ पूरन किरपा प्रभि करी ॥
करु गहि लीने हरि जसो दीने जोनि ना धावै नह मरी ॥
सतिगुर दइआल किरपाल भेटत हरे कामु क्रोधु लोभु मारिआ ॥
कथनु न जाइ अकथु सुआमी सदकै जाइ नानकु वारिआ ॥5॥1॥3॥
ੴ सति नामु गुर प्रसादि ॥
हरि हरि उतमु नामु है जिनि सिरिआ सभु कोइ जीउ ॥
हरि जीअ सभे प्रतिपालदा घटि घटि रमईआ सोइ ॥
सो हरि सदा धिआईऐ तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥
जो मोहि माइआ चितु लाइदे से छोडि चले दुखु रोइ ॥
जन नानक नामु धिआइआ हरि अंति सखाई होइ ॥1॥
मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥
हरि गुर सरणाई पाईऐ वणजारिआ मित्रा वडभागि परापति होइ ॥1॥ रहाउ ॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “भक्त जन नाम अमृत सदा पीते हैं और (विषयों की ओर से) सदा अडोल-चित्त टिके रहते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।