तंतु मंतु नह जोहई तितु चाखु न लागै ॥1॥ रहाउ ॥ काम क्रोध मद मान मोह बिनसे अनरागै ॥ आनंद मगन रसि राम रंगि नानक सरनागै ॥2॥4॥68॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: कोई जादू-टूणा उस पर असर नहीं कर सकता। कोई बुरी नजर उसको नहीं लग सकती। 1। रहाउ। (उसके अंदर से) काम-क्रोध-अहंकार की मस्ती। मोह और और पदार्थों के चस्के सब नाश हो जाते हैं। 2। 4। 68। हे नानक ! वह सदा आत्मिक आनंद में मस्त रहता है। जो मनुष्य परमात्मा के नाम के रस में टिका रहता है। प्रभू के प्रेम में मस्त रहता है। प्रभू की शरण पड़ा रहता है।
बिलावलु महला 5 ॥ जीअ जुगति वसि प्रभू कै जो कहै सु करना ॥ भए प्रसंन गोपाल राइ भउ किछु नही करना ॥1॥ दूखु न लागै कदे तुधु पारब्रहमु चितारे ॥ जमकंकरु नेड़ि न आवई गुरसिख पिआरे ॥1॥ रहाउ ॥ करण कारण समरथु है तिसु बिनु नही होरु ॥ नानक प्रभ सरणागती साचा मनि जोरु ॥2॥5॥69॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! हम जीवों की जीवन-जु्रगति परमात्मा के वश में है। जो कुछ करने के लिए वह हमें प्रेरित करता है वही हम कर सकते हैं। जिस मनुष्य पर जगत-पालक पातशाह दयावान होता है। उसे किसी से डरने की आवश्यक्ता नहीं रह जाती। 1। हे प्यारे गुरसिख ! परमात्मा को अपने चित्त में बसाए रख। आपको कभी भी कोई दुख छू नहीं सकेगा। (दुख तो कहीं रहे) जमदूत (भी) आपके नजदीक नहीं आएगा। 1। रहाउ। हे नानक ! प्रभू ही जगत की रचना करने की ताकत वाला है। उसके बिना कोई और (इस प्रकार की समर्था वाला) नहीं। हम जीव उस प्रभू की शरण में ही रह सकते हैं। (हमारे) मन में उसी का ही सदा कायम रहने वाला आसरा है। 2। 5। 69।
बिलावलु महला 5 ॥ सिमरि सिमरि प्रभु आपना नाठा दुख ठाउ ॥ बिस्राम पाए मिलि साधसंगि ता ते बहुड़ि न धाउ ॥1॥ बलिहारी गुर आपने चरनन॑ बलि जाउ ॥ अनद सूख मंगल बने पेखत गुन गाउ ॥1॥ रहाउ ॥ कथा कीरतनु राग नाद धुनि इहु बनिओ सुआउ ॥ नानक प्रभ सुप्रसंन भए बांछत फल पाउ ॥2॥6॥70॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (गुरू की संगति की बरकति से) मैं अपने प्रभू का हर वक्त सिमरन करके (ऐसी अवस्था में पहुँच गया हूँ कि मेरे अंदर से) दुखों का ठिकाना ही दूर हो गया है। हे भाई ! गुरू की संगति में मिल के मैंने प्रभू के चरणों में निवास हासिल कर लिया है (इस वास्ते) उस (साध-संगति) से कभी परे नहीं भागता। 1। हे भाई ! मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ। मैं (अपने गुरू के) चरणों से सदके जाता हूँ। गुरू के दर्शन करके मैं प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाता हूँ। और मेरे अंदर सारे आनंद। सारे सुख सारे चाव-हिल्लोरे बने रहते हैं। 1। रहाउ। हे नानक ! (कह- हे भाई ! गुरू की कृपा से) प्रभू की कथा-कहानियाँ। कीर्तन। सिफत-सालाह की लगन – यही मेरी जिंदगी का निशाना बन गए हैं। (गुरू की मेहर से) प्रभू जी (मेरे पर) बहुत खुश हो गए हैं। मैं अब मन-माँगा फल प्राप्त कर रहा हूँ। 2। 6। 70।
बिलावलु महला 5 ॥ दास तेरे की बेनती रिद करि परगासु ॥ तुम॑री क्रिपा ते पारब्रहम दोखन को नासु ॥1॥ चरन कमल का आसरा प्रभ पुरख गुणतासु ॥ कीरतन नामु सिमरत रहउ जब लगु घटि सासु ॥1॥ रहाउ ॥ मात पिता बंधप तूहै तू सरब निवासु ॥ नानक प्रभ सरणागती जा को निरमल जासु ॥2॥7॥71॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे पारब्रहम ! (मैं आपका दास हूँ) आपके दास की (आपके दर पर) आरजू है कि मेरे हृदय में (आत्मिक जीवन का) प्रकाश कर (ता कि) आपकी कृपा से (मेरे अंदर से) विकारों का नाश हैं जाए। 1। हे सर्व-व्यापक प्रभू ! आप (ही) सारे गुणों का खजाना है। मुझे (आपके) ही सुंदर चरणों का आसरा है। (मुझ पर मेहर कर) जब तक (मेरे) शरीर में सांस (चल रही है)। मैं आपका नाम सिमरता रहूँ। आपकी सिफत सालाह करता रहूँ। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आप ही मेरी माँ है। आप ही मेरा पिता है। आप ही मेरा साक-संबंधी है। आप सारे ही जीवों में बसता है। हे नानक ! जिस प्रभू की सिफत-सालाह (जीवन) पवित्र कर देती है। उसकी शरण पड़े रहना चाहिए। 2। 7। 71।
बिलावलु महला 5 ॥ सरब सिधि हरि गाईऐ सभि भला मनावहि ॥ साधु साधु मुख ते कहहि सुणि दास मिलावहि ॥1॥ सूख सहज कलिआण रस पूरै गुरि कीन॑ ॥ जीअ सगल दइआल भए हरि हरि नामु चीन॑ ॥1॥ रहाउ ॥ पूरि रहिओ सरबत्र महि प्रभ गुणी गहीर ॥ नानक भगत आनंद मै पेखि प्रभ की धीर ॥2॥8॥72॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! सारी सिद्धियों के मालिक प्रभू की सिफत-सालाह करते रहना चाहिए। (जो मनुष्य सिफत-सालाह करता है) सारे लोग (उसकी) सुख मांगते हैं। मुँह से (सभी लोग उसे) गुरमुखि गुरमुखि कहते हैं। (उसके बचन) सुन के सेवक भाव से उसके चरणों में लगते हैं। 1। हे भाई ! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य को आत्मिक अडोलता के सुख आनंद रस बख्श दिए। वह मनुष्य सदा परमात्मा के साथ सांझ डाले रखता है और (परमात्मा को सर्व-व्यापक जानता हुआ) सारे जीवों पर दयावान रहता है। 1। रहाउ। हे नानक ! (प्रभू की सिफत-सालाह करने वाले) भक्त-जन प्रभू का आसरा देख के सदा आनंद-भरपूर रहते हैं। (उन्हें) निश्चय होता है कि सारे गुणों का मालिक अथाह प्रभू सारे जीवों में बसता है। 2। 8। 72।
बिलावलु महला 5 ॥ अरदासि सुणी दातारि प्रभि होए किरपाल ॥ राखि लीआ अपना सेवको मुखि निंदक छारु ॥1॥ तुझहि न जोहै को मीत जन तूं गुर का दास ॥ पारब्रहमि तू राखिआ दे अपने हाथ ॥1॥ रहाउ ॥ जीअन का दाता एकु है बीआ नही होरु ॥ नानक की बेनंतीआ मै तेरा जोरु ॥2॥9॥73॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे मित्र ! जिस सेवक की अरदास प्रभू ने सुन ली। जिस सेवक पर प्रभू जी दयावान हो गए। अपने उस सेवक की प्रभ ने (सदा) रक्षा की है। उस सेवक के दोखी-निंदक के मुँह पर राख ही पड़ी है (निंदक हमेशा धिक्कारा ही गया है)। 1। हे मित्र ! हे सज्जन ! (अगर) आप गुरू का सेवक (बना रहे। तो विश्वास रख कि) परमात्मा ने अपना हाथ दे के आपकी रक्षा करनी है। 1। रहाउ। हे मित्र ! सारे जीवों को दातें देने वाला सिर्फ परमात्मा ही है। उसके बिना कोई और दूसरा (दातें देने के काबिल) नहीं है (उस प्रभू की शरण पड़ा रह)। नानक की (भी प्रभू-दर पर ही सदा) अरदास है- (हे प्रभू !) मुझे आपका ही आसरा है। 2। 9। 73।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे मेरे मित्रो ! हे मेरे सज्जनो ! (यकीन रखो कि) परमात्मा (अपने सेवकों की जरूर) रक्षा करता है। (सेवक की) निंदा करने वाले (खुद ही) आत्मिक मौत मर जाते हैं। (इस वास्ते आप परमात्मा का आसरा-सहारा लिए रखो। और निंदकों की तरफ से) बेफिक्र रहो। 1। रहाउ। उस प्रभू ने (सदा ही उस सेवक के) सारे मनोरथ पूरे किए हैं जिसको (भाग्यों से) गुरू मिल गया।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कोई जादू-टूणा उस पर असर नहीं कर सकता।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।