अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! साध-संगति एक ऐसा स्थान है जहाँ बख्शिशों के) भण्डारे भरे रहते हैं। (वहाँ इस बख्शिशों की) कभी भी कमी नहीं आती। (जो भी मनुष्य साध-संगति में निवास रखता है। उसके) मन में (उसके) हृदय में अपहुँच और बेअंत प्रभू के सुंदर चरण टिके रहते हैं। 2। (हे भाई ! जो भी मनुष्य साध-संगति में) निवास रखते हैं और नाम-सिमरन की कमाई करते हैं। वे सारे सुखी रहते हैं। उन्हें किसी बात की कोई कमी नहीं दिखती। गुरू की कृपा से उनको जगत के मालिक पूर्ण प्रभू जी मिल जाते हैं। 3। (हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति में टिकते हैं) सारे लोक (उनकी) शोभा-वडिआई करते हैं। साध-संगति एक ऐसा सुंदर स्थान है जो सदा कायम रहने वाला है। हे नानक ! (साध-संगति की बरकति से) सारे सुखों के खजाने हरी-नाम को जप के पूरे गुरू का (सदा के लिए) मिलाप हासिल कर लेते हैं। 4। 33। 63।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। (सिमरन की बरकति से विकार आदि) रोगों से रहित हुआ जाता है। ये सिमरन ही श्री रामचंद्र जी की छड़ी है (जिस छड़ी के भय से कोई दुष्ट सिर नहीं उठा सकता था)। इस (सिमरन) ने (हरेक सिमरन करने वाले के अंदर से हरेक) रोग दूर कर दिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! पूरे गुरू की शरण पड़ना चाहिए और प्रभू का नाम जपना चाहिए। (इस तरह) सदा आत्मिक आनंद भोग सकते हैं। गुरू की संगति से कुर्बान जाना चाहिए (साध-संगति की कृपा से) परमात्मा के मिलाप के अवसर बनते हैं। 1। जिसका सिमरन करने से आत्मिक आनंद प्राप्त होता है और प्रभू से विछोड़ा दूर हो जाता है। हे नानक ! उस प्रभू की शरण पड़े रहना चाहिए। जो जगत की रचना करने के समर्थ है। 2। 34। 64।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 दुपदे घरु 5 सतिगुर प्रसादि ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य ने सिर्फ गुरू का पल्ला पकड़ा है। अन्य सारे हीले-वसीले छोड़ दिए हैं और परमात्मा का नाम (की ही) दवा बरती है। उसके सारे दुख-कलेश। सारे पाप। सारे रोग मिट गए हैं; उसका मन (विकारों की तपश से बच के) ठंडा-ठार हुआ है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य पूरे गुरू को अपने दिल में बसाए रखता है। उसका सारा दुख-कलेश दूर हो जाता है। (क्योंकि) रक्षा करने के समर्थ परमात्मा ने (उस पर) कृपा करके (दुख-कलेशों से सदा) उसकी रक्षा की है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू को अपने हृदय में बसाया है) प्रभू ने (उसकी) बाँह पकड़ के उसको अपना बना लिया है। हे नानक ! प्रभू का नाम सिमर सिमर के उसका मन उसका हृदय आनंद-भरपूर हो गया है। और उसको (ताप-पाप रोग आदि का) कोई डर नहीं रह जाता। 2। 1। 65।
बिलावलु महला 5 ॥ करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥ सफल सेवा पारब्रहम की ता की नही हानि ॥1॥ आपे ही प्रभु राखता भगतन की आनि ॥ जो जो चितवहि साध जन सो लेता मानि ॥1॥ रहाउ ॥ सरणि परे चरणारबिंद जन प्रभ के प्रान ॥ सहजि सुभाइ नानक मिले जोती जोति समान ॥2॥2॥66॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! (प्रभू अपने भक्तजनों के) माथे पर (अपना) हाथ रख के उनको आर्शिवाद देता है और बख्शिश के तौर पर (उनको अपना) नाम देता है। हे भाई ! परमात्मा की की हुई सेवा-भक्ति जीवन-मनोरथ पूरा करती है। ये की हुई सेवा-भक्ती व्यर्थ नहीं जाती। 1। हे भाई ! अपने भक्तों की इज्जत परमात्मा खुद ही बचाता है। परमात्मा के भक्त जो कुछ अपने मन में धारते हैं। परमात्मा वही कुछ मान लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जो संतजन प्रभू के सुंदर चरण-कमलों का आसरा लेते हैं। वे प्रभू को प्राणों के समान प्यारे हो जाते हैं। हे नानक ! वह संत जन आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम में टिक के प्रभू के साथ मिल जाते हैं। उनकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में लीन हो जाती है। 2। 2। 66।
बिलावलु महला 5 ॥ चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥ प्रभ सरणागति जन परे ता का सद परतापु ॥1॥ राखनहार अपार प्रभ ता की निरमल सेव ॥ राम राज रामदास पुरि कीन॑े गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥ सदा सदा हरि धिआईऐ किछु बिघनु न लागै ॥ नानक नामु सलाहीऐ भइ दुसमन भागै ॥2॥3॥67॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! (जिन सेवकों को साध-संगति में) प्रभू ने खुद अपने सुंदर चरण-कमलों का आसरा दिया है। वह सेवक उसका सदा कायम रहने वाला प्रताप देख के उसकी शरण पड़े रहते हैं। 1। हे भाई ! गुरू ने साध-संगति में रूहानी राज कायम कर दिया है। प्रभू बेअंत और रक्षा करने में समर्थ है। (साध-संगति में टिक के की हुई) उसकी सेवा-भक्ति (जीवन को) पवित्र (बना देती है)। 1। रहाउ। हे नानक ! (साध-संगति में टिक के) सदा ही परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए (इस तरह जीवन के रास्ते में) कोई रुकावट नहीं पड़ती। परमात्मा के नाम की वडिआई करनी चाहिए (प्रभू के) डर के कारण (कामादिक) सारे वैरी भाग जाते हैं। 2। 3। 67।
बिलावलु महला 5 ॥ मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥ उचरत गुन गोपाल जसु दूर ते जमु भागै ॥1॥ राम नामु जो जनु जपै अनदिनु सद जागै ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! साध-संगति में मिल के मन से हृदय से परमात्मा के नाम की आराधना करते रहना चाहिए। जगत के रक्षक प्रभू के गुण और यश उचारने से जम (भी) दूर से ही भाग जाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपता रहता है। वह हर वक्त सदा (विकारों से) सचेत रहता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! साध-संगति एक ऐसा स्थान है जहाँ बख्शिशों के) भण्डारे भरे रहते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।