लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 817 · बिलावल

इस पृष्ठ पर
अंग
817
बिलावल
अंग बदलें या अंश चुनें · 6 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. तोटि न आवै कदे मूलि पूरन भंडार ॥
  2. हरि हरि हरि आराधीऐ होईऐ आरोग ॥
  3. अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥
  4. करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥
  5. चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥
  6. मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

तोटि न आवै कदे मूलि पूरन भंडार ॥

अंग 816 से चला आ रहा अंश

तोटि न आवै कदे मूलि पूरन भंडार ॥
चरन कमल मनि तनि बसे प्रभ अगम अपार ॥2॥
बसत कमावत सभि सुखी किछु ऊन न दीसै ॥
संत प्रसादि भेटे प्रभू पूरन जगदीसै ॥3॥
जै जै कारु सभै करहि सचु थानु सुहाइआ ॥
जपि नानक नामु निधान सुख पूरा गुरु पाइआ ॥4॥33॥63॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई! साध-संगति एक ऐसा स्थान है जहाँ बख्शिशों के) भण्डारे भरे रहते हैं। (वहाँ इस बख्शिशों की) कभी भी कमी नहीं आती। (जो भी मनुष्य साध-संगति में निवास रखता है। उसके) मन में (उसके) हृदय में अपहुँच और बेअंत प्रभू के सुंदर चरण टिके रहते हैं। 2। (हे भाई! जो भी मनुष्य साध-संगति में) निवास रखते हैं और नाम-सिमरन की कमाई करते हैं। वे सारे सुखी रहते हैं। उन्हें किसी बात की कोई कमी नहीं दिखती। गुरू की कृपा से उनको जगत के मालिक पूर्ण प्रभू जी मिल जाते हैं। 3। (हे भाई! जो मनुष्य साध-संगति में टिकते हैं) सारे लोक (उनकी) शोभा-वडिआई करते हैं। साध-संगति एक ऐसा सुंदर स्थान है जो सदा कायम रहने वाला है। हे नानक! (साध-संगति की बरकति से) सारे सुखों के खजाने हरी-नाम को जप के पूरे गुरू का (सदा के लिए) मिलाप हासिल कर लेते हैं। 4। 33। 63।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

हरि हरि हरि आराधीऐ होईऐ आरोग ॥

बिलावलु महला 5 ॥
हरि हरि हरि आराधीऐ होईऐ आरोग ॥
रामचंद की लसटिका जिनि मारिआ रोगु ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु पूरा हरि जापीऐ नित कीचै भोगु ॥
साधसंगति कै वारणै मिलिआ संजोगु ॥1॥
जिसु सिमरत सुखु पाईऐ बिनसै बिओगु ॥
नानक प्रभ सरणागती करण कारण जोगु ॥2॥34॥64॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। (सिमरन की बरकति से विकार आदि) रोगों से रहित हुआ जाता है। ये सिमरन ही श्री रामचंद्र जी की छड़ी है (जिस छड़ी के भय से कोई दुष्ट सिर नहीं उठा सकता था)। इस (सिमरन) ने (हरेक सिमरन करने वाले के अंदर से हरेक) रोग दूर कर दिया है। 1। रहाउ। हे भाई! पूरे गुरू की शरण पड़ना चाहिए और प्रभू का नाम जपना चाहिए। (इस तरह) सदा आत्मिक आनंद भोग सकते हैं। गुरू की संगति से कुर्बान जाना चाहिए (साध-संगति की कृपा से) परमात्मा के मिलाप के अवसर बनते हैं। 1। जिसका सिमरन करने से आत्मिक आनंद प्राप्त होता है और प्रभू से विछोड़ा दूर हो जाता है। हे नानक! उस प्रभू की शरण पड़े रहना चाहिए। जो जगत की रचना करने के समर्थ है। 2। 34। 64।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥

रागु बिलावलु महला 5 दुपदे घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥
ताप पाप सभि मिटे रोग सीतल मनु भइआ ॥1॥
गुरु पूरा आराधिआ सगला दुखु गइआ ॥
राखनहारै राखिआ अपनी करि मइआ ॥1॥ रहाउ ॥
बाह पकड़ि प्रभि काढिआ कीना अपनइआ ॥
सिमरि सिमरि मन तन सुखी नानक निरभइआ ॥2॥1॥65॥

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 दुपदे घरु 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई!) जिस मनुष्य ने सिर्फ गुरू का पल्ला पकड़ा है। अन्य सारे हीले-वसीले छोड़ दिए हैं और परमात्मा का नाम (की ही) दवा बरती है। उसके सारे दुख-कलेश। सारे पाप। सारे रोग मिट गए हैं; उसका मन (विकारों की तपश से बच के) ठंडा-ठार हुआ है। 1। हे भाई! जो मनुष्य पूरे गुरू को अपने दिल में बसाए रखता है। उसका सारा दुख-कलेश दूर हो जाता है। (क्योंकि) रक्षा करने के समर्थ परमात्मा ने (उस पर) कृपा करके (दुख-कलेशों से सदा) उसकी रक्षा की है। 1। रहाउ। (हे भाई! जिस मनुष्य ने गुरू को अपने हृदय में बसाया है) प्रभू ने (उसकी) बाँह पकड़ के उसको अपना बना लिया है। हे नानक! प्रभू का नाम सिमर सिमर के उसका मन उसका हृदय आनंद-भरपूर हो गया है। और उसको (ताप-पाप रोग आदि का) कोई डर नहीं रह जाता। 2। 1। 65।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥

बिलावलु महला 5 ॥
करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥
सफल सेवा पारब्रहम की ता की नही हानि ॥1॥
आपे ही प्रभु राखता भगतन की आनि ॥
जो जो चितवहि साध जन सो लेता मानि ॥1॥ रहाउ ॥
सरणि परे चरणारबिंद जन प्रभ के प्रान ॥
सहजि सुभाइ नानक मिले जोती जोति समान ॥2॥2॥66॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई! (प्रभू अपने भक्तजनों के) माथे पर (अपना) हाथ रख के उनको आर्शिवाद देता है और बख्शिश के तौर पर (उनको अपना) नाम देता है। हे भाई! परमात्मा की की हुई सेवा-भक्ति जीवन-मनोरथ पूरा करती है। ये की हुई सेवा-भक्ती व्यर्थ नहीं जाती। 1। हे भाई! अपने भक्तों की इज्जत परमात्मा खुद ही बचाता है। परमात्मा के भक्त जो कुछ अपने मन में धारते हैं। परमात्मा वही कुछ मान लेता है। 1। रहाउ। हे भाई! जो संतजन प्रभू के सुंदर चरण-कमलों का आसरा लेते हैं। वे प्रभू को प्राणों के समान प्यारे हो जाते हैं। हे नानक! वह संत जन आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम में टिक के प्रभू के साथ मिल जाते हैं। उनकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में लीन हो जाती है। 2। 2। 66।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥

बिलावलु महला 5 ॥
चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥
प्रभ सरणागति जन परे ता का सद परतापु ॥1॥
राखनहार अपार प्रभ ता की निरमल सेव ॥
राम राज रामदास पुरि कीन॑े गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥
सदा सदा हरि धिआईऐ किछु बिघनु न लागै ॥
नानक नामु सलाहीऐ भइ दुसमन भागै ॥2॥3॥67॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई! (जिन सेवकों को साध-संगति में) प्रभू ने खुद अपने सुंदर चरण-कमलों का आसरा दिया है। वह सेवक उसका सदा कायम रहने वाला प्रताप देख के उसकी शरण पड़े रहते हैं। 1। हे भाई! गुरू ने साध-संगति में रूहानी राज कायम कर दिया है। प्रभू बेअंत और रक्षा करने में समर्थ है। (साध-संगति में टिक के की हुई) उसकी सेवा-भक्ति (जीवन को) पवित्र (बना देती है)। 1। रहाउ। हे नानक! (साध-संगति में टिक के) सदा ही परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए (इस तरह जीवन के रास्ते में) कोई रुकावट नहीं पड़ती। परमात्मा के नाम की वडिआई करनी चाहिए (प्रभू के) डर के कारण (कामादिक) सारे वैरी भाग जाते हैं। 2। 3। 67।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बिलावल

मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

बिलावलु महला 5 ॥
मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥
उचरत गुन गोपाल जसु दूर ते जमु भागै ॥1॥
राम नामु जो जनु जपै अनदिनु सद जागै ॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई! साध-संगति में मिल के मन से हृदय से परमात्मा के नाम की आराधना करते रहना चाहिए। जगत के रक्षक प्रभू के गुण और यश उचारने से जम (भी) दूर से ही भाग जाता है। 1। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपता रहता है। वह हर वक्त सदा (विकारों से) सचेत रहता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 817 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।