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अंग ८१६ · बिलावल

अंग
816
बिलावल
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  1. धंनु सु थानु बसंत धंनु जह जपीऐ नामु ॥
  2. जिनि तू बंधि करि छोडिआ फुनि सुख महि पाइआ ॥
  3. खोजत खोजत मै फिरा खोजउ बन थान ॥
  4. जीअ जंत सुप्रसंन भए देखि प्रभ परताप ॥
  5. सिमरि सिमरि पूरन प्रभू कारज भए रासि ॥

धंनु सु थानु बसंत धंनु जह जपीऐ नामु ॥

अंग ८१५ से चला आ रहा अंश

धंनु सु थानु बसंत धंनु जह जपीऐ नामु ॥
कथा कीरतनु हरि अति घना सुख सहज बिस्रामु ॥3॥
मन ते कदे न वीसरै अनाथ को नाथ ॥
नानक प्रभ सरणागती जा कै सभु किछु हाथ ॥4॥29॥59॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस जगह पर परमात्मा का नाम जपा जाता है। वह जगह भाग्यशाली हो जाती है। वहाँ बसने वाले भी भाग्यशाली बन जाते हैं (क्योंकि जिस जगह) परमात्मा की कथा-वार्ता। प्रभू की सिफत-सालाह बहुत होती रहे। वह जगह आत्मिक आनंद का। आत्मिक अडोलता का ठिकाना (श्रोत) बन जाता है। 3। (इस वास्ते) हे नानक ! (कह- हे भाई !) वह अनाथों का नाथ प्रभू कभी मन से भूलना नहीं चाहिए। उस प्रभू की शरण सदा पड़े रहना चाहिए। जिसके हाथ में सब कुछ है। 4। 29। 59।

जिनि तू बंधि करि छोडिआ फुनि सुख महि पाइआ ॥

बिलावलु महला 5 ॥
जिनि तू बंधि करि छोडिआ फुनि सुख महि पाइआ ॥
सदा सिमरि चरणारबिंद सीतल होताइआ ॥1॥
जीवतिआ अथवा मुइआ किछु कामि न आवै ॥
जिनि एहु रचनु रचाइआ कोऊ तिस सिउ रंगु लावै ॥1॥ रहाउ ॥
रे प्राणी उसन सीत करता करै घाम ते काढै ॥
कीरी ते हसती करै टूटा ले गाढै ॥2॥
अंडज जेरज सेतज उतभुजा प्रभ की इह किरति ॥
किरत कमावन सरब फल रवीऐ हरि निरति ॥3॥
हम ते कछू न होवना सरणि प्रभ साध ॥
मोह मगन कूप अंध ते नानक गुर काढ ॥4॥30॥60॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जिस परमात्मा ने आपको (पहले माँ के पेट में) बाँध के रखा हुआ था। फिर (माँ के पेट में से निकाल के जगत में ला के जगत के) सुखों में ला फसाया है। उसके सुंदर चरण सदा सिमरता रह। (इस तरह सदा) शांत-चित्त रह सकते हैं। 1। (हे भाई ! जो माया) इस लोक में और परलोक में कहीं भी साथ नहीं निभाती (जीव सदा ही उसके साथ मोह डाले रखता है)। जिस परमात्मा ने ये सारा जगत पैदा किया है। उसके साथ कोई विरला मनुष्य ही प्यार बनाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (विकारों की) गर्मी और (नाम की) ठंडक परमात्मा स्वयं ही बनाता है। वह (खुद ही विकारों की) तपश में से निकालता है। वह प्रभू कीड़ी (नाचीज जीव से) हाथी (विशालकाय आदर सम्मान वाला) बना देता है। (अपने चरणों से) टूटे हुए जीव को वह खुद ही (बाँह से) पकड़ कर (अपने चरणों से) बाँध लेता है (उसीकी शरण पड़ा रह)। 2। (हे भाई ! दुनिया में) अंडे से पैदा हुए जीव। जिओर से पैदा हुए जीव। पसीने से पैदा हुए जीव। सारी बनस्पति - ये सारी परमात्मा की ही पैदा की हुई रचना है। उस परमात्मा का नाम (इस रचना से) निर्मोह रह के सिमरना चाहिए- ये कमाई करने से (जीवन के) सारे मनोरथ पूरे हो जाते हैं। 3। हे प्रभू ! हम जीवों से तो कुछ भी नहीं हो सकता (हमें) गुरू की शरण डाले रख। हे नानक ! (अरदास किया कर-) हे गुरू ! हम जीव माया के मोह में डूबे रहते हैं। (हमें मोह के इस) अंधेरे कूएं में से निकाल ले। ४।३०।६०।

खोजत खोजत मै फिरा खोजउ बन थान ॥

बिलावलु महला 5 ॥
खोजत खोजत मै फिरा खोजउ बन थान ॥
अछल अछेद अभेद प्रभ ऐसे भगवान ॥1॥
कब देखउ प्रभु आपना आतम कै रंगि ॥
जागन ते सुपना भला बसीऐ प्रभ संगि ॥1॥ रहाउ ॥
बरन आस्रम सासत्र सुनउ दरसन की पिआस ॥
रूपु न रेख न पंच तत ठाकुर अबिनास ॥2॥
ओहु सरूपु संतन कहहि विरले जोगीसुर ॥
करि किरपा जा कउ मिले धनि धनि ते ईसुर ॥3॥
सो अंतरि सो बाहरे बिनसे तह भरमा ॥
नानक तिसु प्रभु भेटिआ जा के पूरन करमा ॥4॥31॥61॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! प्रभू को) ढूँढता-ढूँढता मैं (हर तरफ़) फिरता रहता हूँ। मैं कई जंगल। अनेकों जगहों में खोजता फिरता हॅूँ (पर मुझे प्रभू कहीं भी नहीं मिलता। मैंने सुना है कि वह) भगवान प्रभू जी ऐसे हैं कि उनको माया छल नहीं सकती। वे नाश-रहित हैं। और उनका भेद नहीं पाया जा सकता। 1। (हे भाई ! मुझे हर वक्त ये तमन्ना रहती है कि) अपनी जीवात्मा के चाव से कब मैं अपने (प्यारे) प्रभू को देख सकूँगा। (यदि रात को सोए हुए सपने में भी) प्रभू के साथ बस सकें। तो इस जागते रहने से बेहतर (सोए हुए का वह) सपना भला है। 1। रहाउ। (हे भाई ! प्रभू के दर्शन करने के लिए) मैं चारों वर्णों और चारों आश्रमों के कर्म करता हूँ। शास्त्रों (के उपदेश भी) सुनता हूँ (पर। दर्शन नहीं होते) दर्शनों की लालसा बनी ही रहती है। (हे भाई !) उस अविनाशी ठाकुर प्रभू का ना कोई रूप। चिन्ह-चक्र है और ना ही वह (जीवों की तरह) पाँच तत्वों का ही बना हुआ है। 2। वे विरले जोगीराज ही वे संत जन ही (उस प्रभू का) वह स्वरूप बयान करते हैं (कि उसका कोई रूप-रेख नहीं है) (हे भाई !) कृपा करके प्रभू स्वयं ही जिनको मिलता है। वह महान जोगी हैं वह बहुत भाग्यवान हैं। 3। (हे भाई ! विरले संतजन ही बताते हैं कि) वह प्रभू सब जीवों के अंदर बसता है। और वह सबसे अलग भी है। उस प्रभू के चरणों में जुड़ने से सारे भ्रम-वहिम नाश हो जाते हैं। हे नानक ! जिस मनुष्य के पूरे भाग्य जाग उठते हैं उसको वह प्रभू (स्वयं ही) मिल जाता है। 4। 31। 61।

जीअ जंत सुप्रसंन भए देखि प्रभ परताप ॥

बिलावलु महला 5 ॥
जीअ जंत सुप्रसंन भए देखि प्रभ परताप ॥
करजु उतारिआ सतिगुरू करि आहरु आप ॥1॥
खात खरचत निबहत रहै गुर सबदु अखूट ॥
पूरन भई समगरी कबहू नही तूट ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगि आराधना हरि निधि आपार ॥
धरम अरथ अरु काम मोख देते नही बार ॥2॥
भगत अराधहि एक रंगि गोबिंद गुपाल ॥
राम नाम धनु संचिआ जा का नही सुमारु ॥3॥
सरनि परे प्रभ तेरीआ प्रभ की वडिआई ॥
नानक अंतु न पाईऐ बेअंत गुसाई ॥4॥32॥62॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ वे सारे जीव परमात्मा की साक्षात महानता देख के निहाल हो जाते हैं हे भाई ! गुरू ने स्वयं उद्यम करके (जिस-जिस जीव को गुरू-शबद की दाति दे के उनके सिर पर पिछले जन्मों के किए हुए) विकारों का कर्जा (भार) उतार दिया। 1। हे भाई ! गुरू का शबद (आत्मिक जीवन के प्रफुल्लित होने के लिए एक ऐसा भोजन है जो) कभी समाप्त नहीं होता। (जिस मनुष्य की उम्र यह भोजन खुद) खाते हुए (और। औरों को) बाँटते हुए गुजरती है। उसके पास (इस) सामग्री के भण्डार भरे रहते हैं। (इस सामग्री में) कभी भी कमी नहीं आती। 1। रहाउ। (इस वास्ते। हे भाई !) गुरू की संगति में टिक के परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। ये एक ऐसा खजाना है जो कभी समाप्त नहीं होता। (दुनिया में) धर्म। काम। मोक्ष (ये चार ही प्रसिद्ध अमूल्य पदार्थ माने गए हैं। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है। परमात्मा उसको ये पदार्थ) देते हुए समय नहीं लगाता। 2। हे भाई ! गोबिंद गोपाल के भक्त एक-रस प्रेम-रंग में टिक के उसका नाम सिमरते हैं। वह मनुष्य परमात्मा के नाम का धन (इतना) इकट्ठा करते रहते हैं कि उसका अंदाजा नहीं लग सकता। 3। हे प्रभू ! (आपके भक्त आपकी कृपा से) आपकी शरण पड़े रहते हैं। (हे भाई ! प्रभू के भक्त) प्रभू की सिफत-सालाह ही करते रहते हैं। हे नानक ! जगत के पति प्रभू के गुण बेअंत हैं। उनका अंत नहीं पाया जा सकता। 4। 32। 62।

सिमरि सिमरि पूरन प्रभू कारज भए रासि ॥

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बिलावलु महला 5 ॥
सिमरि सिमरि पूरन प्रभू कारज भए रासि ॥
करतार पुरि करता वसै संतन कै पासि ॥1॥ रहाउ ॥
बिघनु न कोऊ लागता गुर पहि अरदासि ॥
रखवाला गोबिंद राइ भगतन की रासि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! साध-संगति में परमात्मा (स्वयं) बसता है। अपने संतजनों के अंग संग बसता है। (साध-संगति में) सारे गुणों से भरपूर प्रभू (का नाम) सिमर-सिमर के (मनुष्य के) सारे काम सफल हो जाते हैं। 1। रहाउ। (जो भी मनुष्य साध-संगति में आ के) गुरू के दर पर अरदास करते रहते हैं। (उनकी जिंदगी के रास्ते में) कोई रुकावट पैदा नहीं होती हे भाई ! प्रभू पातशाह अपने संत जनों का (हमेशा) स्वयं रखवाला है। प्रभू (का नाम) संत जनों की राशि पूँजी है। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८१६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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