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अंग 815

अंग
815
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक कउ किरपा भई दासु अपना कीनु ॥4॥25॥55॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गुरू की शरण पड़ने के कारण। मुझ) नानक पर परमात्मा की मेहर हुई। परमात्मा ने मुझे अपना सेवक बना लिया। 4। 25। 55।
बिलावलु महला 5 ॥
हरि भगता का आसरा अन नाही ठाउ ॥
ताणु दीबाणु परवार धनु प्रभ तेरा नाउ ॥1॥
करि किरपा प्रभि आपणी अपने दास रखि लीए ॥
निंदक निंदा करि पचे जमकालि ग्रसीए ॥1॥ रहाउ ॥
संता एकु धिआवना दूसर को नाहि ॥
एकसु आगै बेनती रविआ स्रब थाइ ॥2॥
कथा पुरातन इउ सुणी भगतन की बानी ॥
सगल दुसट खंड खंड कीए जन लीए मानी ॥3॥
सति बचन नानकु कहै परगट सभ माहि ॥
प्रभ के सेवक सरणि प्रभ तिन कउ भउ नाहि ॥4॥26॥56॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे हरी ! (तूने अपने भक्तों की रक्षा की है। क्योंकि) आपके भक्तों को आपका ही आसरा रहता है। (उनकी सहायता के लिए) और कोई जगह नहीं सूझती। हे प्रभू ! आपका नाम ही (आपके भक्तों के वास्ते) ताण है। सहारा है। परिवार है। धन है। 1। हे भाई ! परमात्मा ने मेहर करके अपने सेवकों की सदा ही स्वयं रक्षा की है। निंदक (सेवकों की) निंदा कर करके (सदा) जलते-भुजते रहे। उन्हें (बल्कि) आत्मिक मौत ने हड़प किए रखा। 1। रहाउ। (हे भाई ! प्रभू अपने संत जनों की सदा रक्षा करता है। क्योंकि) संतजन सदा एक प्रभू का ही ध्यान धरते हैं। किसी और का नहीं। जो प्रभू सब जगहों में व्यापक है। संत जन सिर्फ उसके दर पर ही अरजोई करते हैं। 2। हे भाई ! भक्तजनों की अपनी बाणी के द्वारा ही पुराने समय से ही इस प्रकार कथा सुनी जा रही है। कि परमात्मा ने (हर समय) अपने सेवकों का आदर किया। और (उनके) सारे वैरियों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। 3। हे भाई ! नानक कहता है- ये बचन सारी सृष्टि में ही प्रत्यक्ष तौर पर अटल हैं कि प्रभू के सेवक प्रभू की शरण पड़े रहते हैं। (इस वास्ते) उनको कोई डर छू नहीं सकता। 4। 26। 56।
बिलावलु महला 5 ॥
बंधन काटै सो प्रभू जा कै कल हाथ ॥
अवर करम नही छूटीऐ राखहु हरि नाथ ॥1॥
तउ सरणागति माधवे पूरन दइआल ॥
छूटि जाइ संसार ते राखै गोपाल ॥1॥ रहाउ ॥
आसा भरम बिकार मोह इन महि लोभाना ॥
झूठु समग्री मनि वसी पारब्रहमु न जाना ॥2॥
परम जोति पूरन पुरख सभि जीअ तुम॑ारे ॥
जिउ तू राखहि तिउ रहा प्रभ अगम अपारे ॥3॥
करण कारण समरथ प्रभ देहि अपना नाउ ॥
नानक तरीऐ साधसंगि हरि हरि गुण गाउ ॥4॥27॥57॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू के हाथों में (हरेक) ताकत है वह प्रभू (शरण पड़े मनुष्य के माया के सारे) बंधन काट देता है। (हे भाई ! प्रभू की शरण पड़े बिना) अन्य कामों के करने से (इन बंधनों से) खलासी नहीं मिल सकती (बस ! हर वक्त यह अरदास करो-) हे हरी ! हे नाथ ! हमारी रक्षा कर। 1। हे माया के पति प्रभू ! हे (सारे गुणों से) भरपूर प्रभू ! हे दया के श्रोत प्रभू ! (मैं) आपकी शरण आया (हूँ। मेरी संसार के मोह से रक्षा कर)। (हे भाई !) सृष्टि के पालक प्रभू (जिस मनुष्य की) रक्षा करता है। वह मनुष्य संसार के मोह से बच जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! दुर्भाग्यशाली जीव) दुनियावी आशाएं-वहिम-विकार-माया का मोह -इनमें ही फसा रहता है। जो माया। के साथ आखिर तक साथ नहीं निभना। वही इसके मन में टिकी रहती है। (कभी भी यह) परमात्मा के साथ सांझ नहीं डालता। 2। हे सबसे ऊँचे प्रकाश के श्रोत ! हे सब गुणों से भरपूर प्रभू ! हे सर्व-व्यापक प्रभू ! (हम) सारे जीव आपके ही पैदा किए हुए हैं। हे अपहुँच और बेअंत प्रभू ! जैसे आप ही हमें रखता है। मैं उसी तरह ही रह सकता हूँ (माया के बँधनों से आप ही मुझे बचा सकता है)। 3। हे नानक ! (कह-) हे जगत के रचनहार प्रभू ! हे सब कुछ कर सकने वाले प्रभू ! (मुझे) अपना नाम बख्श। (हे भाई !) साध-संगति में टिक के सदा परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाया कर। (इसी तरह ही संसार-समुंद्र से) पार लांघा जा सकता है। 4। 27। 57।
बिलावलु महला 5 ॥
कवनु कवनु नही पतरिआ तुम॑री परतीति ॥
महा मोहनी मोहिआ नरक की रीति ॥1॥
मन खुटहर तेरा नही बिसासु तू महा उदमादा ॥
खर का पैखरु तउ छुटै जउ ऊपरि लादा ॥1॥ रहाउ ॥
जप तप संजम तुम॑ खंडे जम के दुख डांड ॥
सिमरहि नाही जोनि दुख निरलजे भांड ॥2॥
हरि संगि सहाई महा मीतु तिस सिउ तेरा भेदु ॥
बीधा पंच बटवारई उपजिओ महा खेदु ॥3॥
नानक तिन संतन सरणागती जिन मनु वसि कीना ॥
तनु धनु सरबसु आपणा प्रभि जन कउ दीन॑ा ॥4॥28॥58॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे मन ! आपका ऐतबार कर-करके किस-किस ने धोखा नहीं खाया। आप बहुत बड़ी मोहने वाली माया के मोह में फसा रहता है (और। यह) रास्ता (सीधा) नर्कों का है। 1। हे खोटे मन ! आपका ऐतबार नहीं किया जा सकता। (क्योंकि) आप (माया के नशे में) बहुत मस्त रहता है। (जैसे) गधे की पिछाड़ी तब खोली जाती है। जब उसे ऊपर से लाद लिया जाता है (वैसे ही) आपको भी खरमस्ती करने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए। 1। रहाउ। हे मन ! आप जप-तप-संजम (आदि भले कामों के नियम) तोड़ देता है। (इस करके) जमराज के दुख और दण्ड सहता है। हे बेशर्म भांड ! आप जनम-मरण के चक्कर के दुख याद नहीं करता। 2। हे मन ! परमात्मा (ही सदा) आपके साथ है। आपका मददगार है आपका मित्र है। उससे आपकी दूरी बनी हुई है। आपको (कामादिक) पाँच लुटेरों ने अपने वश में कर रखा है (जिसके कारण आपके अंदर) बड़ा दुख-कलेश बना रहता है। 3। हे नानक ! जिन संत जनों ने (अपना) मन (अपने) वश में कर लिया है। जिन जनों को प्रभू ने (यह दाति) दी है। उनकी शरण पड़ना चाहिए। अपना तन। अपना धन। सब कुछ उन संत जनों के सदके करना चाहिए। 4। 28। 58।
बिलावलु महला 5 ॥
उदमु करत आनदु भइआ सिमरत सुख सारु ॥
जपि जपि नामु गोबिंद का पूरन बीचारु ॥1॥
चरन कमल गुर के जपत हरि जपि हउ जीवा ॥
पारब्रहमु आराधते मुखि अंम्रितु पीवा ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सभि सुखि बसे सभ कै मनि लोच ॥
परउपकारु नित चितवते नाही कछु पोच ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा का नाम जपने का) उद्यम करते हुए (मन में) सरूर पैदा हो है। नाम सिमरते हुए सबसे श्रेष्ठ सुख मिलता है। परमात्मा का नाम बारंबार जप-जप के सब गुणों से भरपूर परमात्मा के गुणों का विचार (मन में टिका रहता है)। 1। हे भाई ! गुरू के सुंदर चरणों का ध्यान धर के। परमात्मा का नाम जप-जप के। परमात्मा की आराधना करते हुए। (ज्यों-ज्यों) मैं मुँह से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीता हूँ। (त्यों-त्यों) मुझे आत्मिक जीवन प्राप्त होता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (परमात्मा की आराधना करते हुए) सारे जीव-जंतु आत्मिक आनंद में लीन रहते हैं। (जपने वाले) सबके मनों में (सिमरने की) तमन्ना पैदा हुई रहती है। (जो-जो मनुष्य नाम जपते हैं। वे) सदा दूसरों की भलाई करने का काम सोचते रहते हैं। कोई पाप-विकार उन पर अपना असर नहीं डाल सकता। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।