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अंग ८१४ · बिलावल

अंग
814
बिलावल
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  1. सुणि सुणि जीवै दासु तुम॑ बाणी जन आखी ॥
  2. बंधन काटे आपि प्रभि होआ किरपाल ॥
  3. भै ते उपजै भगति प्रभ अंतरि होइ सांति ॥
  4. त्रिसन बुझी ममता गई नाठे भै भरमा ॥

सुणि सुणि जीवै दासु तुम॑ बाणी जन आखी ॥

अंग ८१३ से चला आ रहा अंश

सुणि सुणि जीवै दासु तुम॑ बाणी जन आखी ॥
प्रगट भई सभ लोअ महि सेवक की राखी ॥1॥ रहाउ ॥
अगनि सागर ते काढिआ प्रभि जलनि बुझाई ॥
अंम्रित नामु जलु संचिआ गुर भए सहाई ॥2॥
जनम मरण दुख काटिआ सुख का थानु पाइआ ॥
काटी सिलक भ्रम मोह की अपने प्रभ भाइआ ॥3॥
मत कोई जाणहु अवरु कछु सभ प्रभ कै हाथि ॥
सरब सूख नानक पाए संगि संतन साथि ॥4॥22॥52॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आपके सेवक आपकी सिफत-सालाह की जो बाणी उचारते हैं। आपका दास उस बाणी को हर वक्त सुन-सुन के आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। (इस तरह विकारों से बचा के) आप अपने सेवक की जो इज्जत रखते हैं वह सारे संसार में प्रकट हो जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस सेवक ने सिफत-सालाह की बाणी सुन के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लिया) परमात्मा ने खुद उसको (विकारों की) आग के समुंद्र में से निकाल लिया। परमात्मा ने स्वयं (उसके अंदर से विकारों की जलन) शांत कर दी। सतिगुरू जी ने उस सेवक की सहायता की। और (उसके हृदय में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल छिड़का। 2। (हे भाई ! जिस सेवक ने सिफत-सालाह की बाणी सुन-सुन के आत्मिक जीवन पा लिया) उसने जनम-मरण के चक्कर का दुख काट लिया। उसने वह (आत्मिक) ठिकाना पा लिया जहाँ सुख ही सुख है। उसने (अपने अंदर से) भटकना और मोह की फाही काट ली। वह सेवक अपने प्रभू को प्यारा लगने लग पड़ा। 3। (पर। हे भाई !) कहीं यह ना समझ लेना (कि ऐसा आत्मिक) आनंद लेने के लिए हमारा (जीवों का) और कोई चारा चल सकता है (यकीन से जानो कि) हरेक जुगति परमात्मा के (अपने) हाथ में है। हे नानक ! वही सेवक सारे सुख प्राप्त करता है जो संत-जनों की संगति में रहता है जो संतजनों के साथ रहता है। 4। 22। 52।

बंधन काटे आपि प्रभि होआ किरपाल ॥

बिलावलु महला 5 ॥
बंधन काटे आपि प्रभि होआ किरपाल ॥
दीन दइआल प्रभ पारब्रहम ता की नदरि निहाल ॥1॥
गुरि पूरै किरपा करी काटिआ दुखु रोगु ॥
मनु तनु सीतलु सुखी भइआ प्रभ धिआवन जोगु ॥1॥ रहाउ ॥
अउखधु हरि का नामु है जितु रोगु न विआपै ॥
साधसंगि मनि तनि हितै फिरि दूखु न जापै ॥2॥
हरि हरि हरि हरि जापीऐ अंतरि लिव लाई ॥
किलविख उतरहि सुधु होइ साधू सरणाई ॥3॥
सुनत जपत हरि नाम जसु ता की दूरि बलाई ॥
महा मंत्रु नानकु कथै हरि के गुण गाई ॥4॥23॥53॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! जिस मनुष्य पर पूरे गुरू ने कृपा कर दी) प्रभू ने खुद (उसके सारे) बंधन काट दिए। प्रभू उस मनुष्य पर दयावान हो गया। (हे भाई !) प्रभू पारब्रहम दीनों पर दया करने वाला है (जिस भी गरीब पर प्रभू निगाह करता है) वह मनुष्य उस (प्रभू) की निगाह से आनंद-भरपूर हो जाता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य पर पूरे गुरू ने कृपा कर दी। ध्यान-करने-योग्य प्रभू का ध्यान धर के उस मनुष्य का (हरेक) दुख (हरेक) रोग दूर हो जाता है। उसका मन। उसका हृदय ठंडाठार हो जाता है। वह मनुष्य सुखी हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम (एक ऐसी) दवा है जिसकी बरकति से (कोई भी) रोग जोर नहीं डाल सकता। जब गुरू की संगति में टिक के (मनुष्य के) मन में तन में (हरी नाम) प्यारा लगने लग जाता है। तब (मनुष्य को) कोई दुख महसूस नहीं होता। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर अपने अंदर सुरति जोड़ कर। सदा परमात्मा का नाम जपते रहना चाहिए। (इस तरह सारे) पाप (मन से) उतर जाते हैं। (मन) पवित्र हो जाता है। 3। हे भाई ! नानक (एक) सबसे बड़ा मंत्र बताता है (मंत्र ये है कि जो मनुष्य) परमात्मा के गुण गाता रहता है। परमात्मा के नाम की महिमा सुनते और जपते हुए उस मनुष्य की हरेक बला (विपदा) दूर हो जाती है। 4। 23। 53।

भै ते उपजै भगति प्रभ अंतरि होइ सांति ॥

बिलावलु महला 5 ॥
भै ते उपजै भगति प्रभ अंतरि होइ सांति ॥
नामु जपत गोविंद का बिनसै भ्रम भ्रांति ॥1॥
गुरु पूरा जिसु भेटिआ ता कै सुखि परवेसु ॥
मन की मति तिआगीऐ सुणीऐ उपदेसु ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत सिमरत सिमरीऐ सो पुरखु दातारु ॥
मन ते कबहु न वीसरै सो पुरखु अपारु ॥2॥
चरन कमल सिउ रंगु लगा अचरज गुरदेव ॥
जा कउ किरपा करहु प्रभ ता कउ लावहु सेव ॥3॥
निधि निधान अंम्रितु पीआ मनि तनि आनंद ॥
नानक कबहु न वीसरै प्रभ परमानंद ॥4॥24॥54॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू की कृपा से परमात्मा का निर्मल डर हृदय में पैदा हो जाता है। उस) भय-अदब के द्वारा प्रभू की भक्ति (हृदय में) पैदा होती है। और मन में ठंड पड़ जाती है। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते-जपते (हरेक किस्म की) भ्रम-भटकना नाश हो जाती है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है। (विश्वास कीजिए कि) उस (मनुष्य) के हृदय में सुख ने प्रवेश कर लिया है। अपने मन की मति छोड़ देनी चाहिए। (गुरू का) उपदेश सुनना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! सब दातें बख्शने वाले उस सर्व-व्यापक प्रभू को हर वक्त ही सिमरते रहना चाहिए। (हे भाई ! ख़्याल रख कि) वह अकाल पुरख कभी भी मन से ना बिसरे। 2। हे भाई ! गुरू की यह आश्चर्यजनक महिमा है कि उसकी कृपा से परमात्मा के सुंदर चरणों से प्रीति बन जाती है। हे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप कृपा करते हैं (उसको गुरू मिलाते हैं और उसको) आप अपनी सेवा-भक्ति में लगा लेते हैं। 3। (हे भाई ! गुरू की कृपा से जिस मनुष्य ने) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी लिया (जो) सारे खजानों का खजाना है। (उस मनुष्य के) मन में हृदय में खुशी भरी रहती है। हे नानक ! (ख़्याल रख कि) सबसे ऊँचे आनंद का मालिक परमात्मा कभी भी (मन से) बिसर ना जाए। 4। 24। 54।

त्रिसन बुझी ममता गई नाठे भै भरमा ॥

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बिलावलु महला 5 ॥
त्रिसन बुझी ममता गई नाठे भै भरमा ॥
थिति पाई आनदु भइआ गुरि कीने धरमा ॥1॥
गुरु पूरा आराधिआ बिनसी मेरी पीर ॥
तनु मनु सभु सीतलु भइआ पाइआ सुखु बीर ॥1॥ रहाउ ॥
सोवत हरि जपि जागिआ पेखिआ बिसमादु ॥
पी अंम्रितु त्रिपतासिआ ता का अचरज सुआदु ॥2॥
आपि मुकतु संगी तरे कुल कुटंब उधारे ॥
सफल सेवा गुरदेव की निरमल दरबारे ॥3॥
नीचु अनाथु अजानु मै निरगुनु गुणहीनु ॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (उसके अंदर से माया की) तृष्णा मिट गई। (माया की) ममता दूर हो गई। उसके सारे डर-वहिम भाग गए। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू का आसरा लिया) गुरू ने उसकी सहायता करने का नेम-निर्वाह दिया। उसने आत्मिक अडोलता हासिल कर ली। उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो गया। 1। हे भाई ! (जिस भी मनुष्य ने) पूरे गुरू का आसरा लिया है। उसका (माया की) ममता वाला दुख दूर हो जाता है। उसका मन उसका तन ठंडा-ठार हो जाता है। उसको आत्मिक आनंद प्राप्त हो जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू का पल्ला पकड़ा। माया के मोह में) सोया हुआ उसका मन परमात्मा का नाम जप के जाग पड़ा। उसने (हर जगह) आश्चर्य-रूप परमात्मा के दर्शन कर लिए। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (अमृत) पी के उसका मन (माया की ओर से) तृप्त हो गया। हे भाई ! उस नाम-अमृत का स्वाद है ही आश्चर्य भरा। 2। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) खुद (माया के बँधनों से) आजाद हो जाता है। वह मनुष्य अपनी कुलों को। अपने परिवार को पार लंघा लेता है। उसके साथी भी (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। गुरू की की हुई सेवा उसे फलदायक साबित हो जाती है। (प्रभू की) पवित्र हजूरी में (उसे जगह मिल जाती है)। 3। हे भाई ! मैं नीच था। अनाथ था। अंजान था। मेरे अंदर कोई गुण नहीं थे। मैं गुणों से वंचित था (पर।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८१४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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