सुणि सुणि जीवै दासु तुम॑ बाणी जन आखी ॥ प्रगट भई सभ लोअ महि सेवक की राखी ॥1॥ रहाउ ॥ अगनि सागर ते काढिआ प्रभि जलनि बुझाई ॥ अंम्रित नामु जलु संचिआ गुर भए सहाई ॥2॥ जनम मरण दुख काटिआ सुख का थानु पाइआ ॥ काटी सिलक भ्रम मोह की अपने प्रभ भाइआ ॥3॥ मत कोई जाणहु अवरु कछु सभ प्रभ कै हाथि ॥ सरब सूख नानक पाए संगि संतन साथि ॥4॥22॥52॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आपके सेवक आपकी सिफत-सालाह की जो बाणी उचारते हैं। आपका दास उस बाणी को हर वक्त सुन-सुन के आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। (इस तरह विकारों से बचा के) आप अपने सेवक की जो इज्जत रखता है वह सारे संसार में प्रकट हैं जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस सेवक ने सिफत-सालाह की बाणी सुन के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लिया) परमात्मा ने खुद उसको (विकारों की) आग के समुंद्र में से निकाल लिया। परमात्मा ने स्वयं (उसके अंदर से विकारों की जलन) शांत कर दी। सतिगुरू जी ने उस सेवक की सहायता की। और (उसके हृदय में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल छिड़का। 2। (हे भाई ! जिस सेवक ने सिफत-सालाह की बाणी सुन-सुन के आत्मिक जीवन पा लिया) उसने जनम-मरण के चक्कर का दुख काट लिया। उसने वह (आत्मिक) ठिकाना पा लिया जहाँ सुख ही सुख है। उसने (अपने अंदर से) भटकना और मोह की फाही काट ली। वह सेवक अपने प्रभू को प्यारा लगने लग पड़ा। 3। (पर। हे भाई !) कहीं यह ना समझ लेना (कि ऐसा आत्मिक) आनंद लेने के लिए हमारा (जीवों का) और कोई चारा चल सकता है (यकीन से जानो कि) हरेक जुगति परमात्मा के (अपने) हाथ में है। हे नानक ! वही सेवक सारे सुख प्राप्त करता है जो संत-जनों की संगति में रहता है जो संतजनों के साथ रहता है। 4। 22। 52।
बिलावलु महला 5 ॥ बंधन काटे आपि प्रभि होआ किरपाल ॥ दीन दइआल प्रभ पारब्रहम ता की नदरि निहाल ॥1॥ गुरि पूरै किरपा करी काटिआ दुखु रोगु ॥ मनु तनु सीतलु सुखी भइआ प्रभ धिआवन जोगु ॥1॥ रहाउ ॥ अउखधु हरि का नामु है जितु रोगु न विआपै ॥ साधसंगि मनि तनि हितै फिरि दूखु न जापै ॥2॥ हरि हरि हरि हरि जापीऐ अंतरि लिव लाई ॥ किलविख उतरहि सुधु होइ साधू सरणाई ॥3॥ सुनत जपत हरि नाम जसु ता की दूरि बलाई ॥ महा मंत्रु नानकु कथै हरि के गुण गाई ॥4॥23॥53॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! जिस मनुष्य पर पूरे गुरू ने कृपा कर दी) प्रभू ने खुद (उसके सारे) बंधन काट दिए। प्रभू उस मनुष्य पर दयावान हो गया। (हे भाई !) प्रभू पारब्रहम दीनों पर दया करने वाला है (जिस भी गरीब पर प्रभू निगाह करता है) वह मनुष्य उस (प्रभू) की निगाह से आनंद-भरपूर हो जाता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य पर पूरे गुरू ने कृपा कर दी। ध्यान-करने-योग्य प्रभू का ध्यान धर के उस मनुष्य का (हरेक) दुख (हरेक) रोग दूर हो जाता है। उसका मन। उसका हृदय ठंडाठार हो जाता है। वह मनुष्य सुखी हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम (एक ऐसी) दवा है जिसकी बरकति से (कोई भी) रोग जोर नहीं डाल सकता। जब गुरू की संगति में टिक के (मनुष्य के) मन में तन में (हरी नाम) प्यारा लगने लग जाता है। तब (मनुष्य को) कोई दुख महसूस नहीं होता। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर अपने अंदर सुरति जोड़ कर। सदा परमात्मा का नाम जपते रहना चाहिए। (इस तरह सारे) पाप (मन से) उतर जाते हैं। (मन) पवित्र हो जाता है। 3। हे भाई ! नानक (एक) सबसे बड़ा मंत्र बताता है (मंत्र ये है कि जो मनुष्य) परमात्मा के गुण गाता रहता है। परमात्मा के नाम की महिमा सुनते और जपते हुए उस मनुष्य की हरेक बला (विपदा) दूर हो जाती है। 4। 23। 53।
बिलावलु महला 5 ॥ भै ते उपजै भगति प्रभ अंतरि होइ सांति ॥ नामु जपत गोविंद का बिनसै भ्रम भ्रांति ॥1॥ गुरु पूरा जिसु भेटिआ ता कै सुखि परवेसु ॥ मन की मति तिआगीऐ सुणीऐ उपदेसु ॥1॥ रहाउ ॥ सिमरत सिमरत सिमरीऐ सो पुरखु दातारु ॥ मन ते कबहु न वीसरै सो पुरखु अपारु ॥2॥ चरन कमल सिउ रंगु लगा अचरज गुरदेव ॥ जा कउ किरपा करहु प्रभ ता कउ लावहु सेव ॥3॥ निधि निधान अंम्रितु पीआ मनि तनि आनंद ॥ नानक कबहु न वीसरै प्रभ परमानंद ॥4॥24॥54॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू की कृपा से परमात्मा का निर्मल डर हृदय में पैदा हो जाता है। उस) भय-अदब के द्वारा प्रभू की भक्ति (हृदय में) पैदा होती है। और मन में ठंड पड़ जाती है। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते-जपते (हरेक किस्म की) भ्रम-भटकना नाश हो जाती है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है। (विश्वास कीजिए कि) उस (मनुष्य) के हृदय में सुख ने प्रवेश कर लिया है। अपने मन की मति छोड़ देनी चाहिए। (गुरू का) उपदेश सुनना चाहिए। 1। रहाउ। हे भाई ! सब दातें बख्शने वाले उस सर्व-व्यापक प्रभू को हर वक्त ही सिमरते रहना चाहिए। (हे भाई ! ख़्याल रख कि) वह अकाल पुरख कभी भी मन से ना बिसरे। 2। हे भाई ! गुरू की यह आश्चर्यजनक महिमा है कि उसकी कृपा से परमात्मा के सुंदर चरणों से प्रीति बन जाती है। हे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप कृपा करता है (उसको गुरू मिलाता है और उसको) आप अपनी सेवा-भक्ति में लगा लेता है। 3। (हे भाई ! गुरू की कृपा से जिस मनुष्य ने) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी लिया (जो) सारे खजानों का खजाना है। (उस मनुष्य के) मन में हृदय में खुशी भरी रहती है। हे नानक ! (ख़्याल रख कि) सबसे ऊँचे आनंद का मालिक परमात्मा कभी भी (मन से) बिसर ना जाए। 4। 24। 54।
बिलावलु महला 5 ॥ त्रिसन बुझी ममता गई नाठे भै भरमा ॥ थिति पाई आनदु भइआ गुरि कीने धरमा ॥1॥ गुरु पूरा आराधिआ बिनसी मेरी पीर ॥ तनु मनु सभु सीतलु भइआ पाइआ सुखु बीर ॥1॥ रहाउ ॥ सोवत हरि जपि जागिआ पेखिआ बिसमादु ॥ पी अंम्रितु त्रिपतासिआ ता का अचरज सुआदु ॥2॥ आपि मुकतु संगी तरे कुल कुटंब उधारे ॥ सफल सेवा गुरदेव की निरमल दरबारे ॥3॥ नीचु अनाथु अजानु मै निरगुनु गुणहीनु ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (उसके अंदर से माया की) तृष्णा मिट गई। (माया की) ममता दूर हो गई। उसके सारे डर-वहिम भाग गए। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू का आसरा लिया) गुरू ने उसकी सहायता करने का नेम-निर्वाह दिया। उसने आत्मिक अडोलता हासिल कर ली। उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो गया। 1। हे भाई ! (जिस भी मनुष्य ने) पूरे गुरू का आसरा लिया है। उसका (माया की) ममता वाला दुख दूर हो जाता है। उसका मन उसका तन ठंडा-ठार हो जाता है। उसको आत्मिक आनंद प्राप्त हो जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू का पल्ला पकड़ा। माया के मोह में) सोया हुआ उसका मन परमात्मा का नाम जप के जाग पड़ा। उसने (हर जगह) आश्चर्य-रूप परमात्मा के दर्शन कर लिए। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (अमृत) पी के उसका मन (माया की ओर से) तृप्त हो गया। हे भाई ! उस नाम-अमृत का स्वाद है ही आश्चर्य भरा। 2। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) खुद (माया के बँधनों से) आजाद हो जाता है। वह मनुष्य अपनी कुलों को। अपने परिवार को पार लंघा लेता है। उसके साथी भी (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। गुरू की की हुई सेवा उसे फलदायक साबित हो जाती है। (प्रभू की) पवित्र हजूरी में (उसे जगह मिल जाती है)। 3। हे भाई ! मैं नीच था। अनाथ था। अंजान था। मेरे अंदर कोई गुण नहीं थे। मैं गुणों से वंचित था (पर।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपके सेवक आपकी सिफत-सालाह की जो बाणी उचारते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।