गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: प्रभू दीनों पर दया करने वाला है। कृपा का श्रोत है। और (हरेक जीव की) हरेक सांस के साथ संभाल करता है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने (सही जीवन की) शिक्षा दी (उसे विश्वास हो गया कि) मालिक-प्रभू की रज़ा में रहने से ही सुख मिलता है। सब कुछ करने में समर्थ प्रभू जो कुछ कर रहा है वही जीवों की भलाई के लिए है। 3। हे नानक ! परमात्मा के दास ने (दुनिया वाले) चिंता-फिक्र-झोरे छोड़ के सदा परमात्मा के आदेश को (ही अपने भले के लिए) पहचाना है। प्रभू का दास सदा प्रभू के प्रेम रंग में रंगा रहता है (उसको यकीन है कि) प्रभू कभी मरता नहीं। और ना ही अपने सेवक का कभी साथ छोड़ता है। 4। 18। 48।
बिलावलु महला 5 ॥ महा तपति ते भई सांति परसत पाप नाठे ॥ अंध कूप महि गलत थे काढे दे हाथे ॥1॥ ओइ हमारे साजना हम उन की रेन ॥ जिन भेटत होवत सुखी जीअ दानु देन ॥1॥ रहाउ ॥ परा पूरबला लीखिआ मिलिआ अब आइ ॥ बसत संगि हरि साध कै पूरन आसाइ ॥2॥ भै बिनसे तिहु लोक के पाए सुख थान ॥ दइआ करी समरथ गुरि बसिआ मनि नाम ॥3॥ नानक की तू टेक प्रभ तेरा आधार ॥ करण कारण समरथ प्रभ हरि अगम अपार ॥4॥19॥49॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! (उन संत जनों के पैर) परसने से सारे पाप नाश हो जाते हैं। मन में विकारों की भारी तपश से शांति बनी रहती है। जो मनुष्य (विकारों-पापों के) घोर अंधेरे कूएं में गल-सड़ रहे होते हैं। उनको (वे संत-जन अपना) हाथ दे के (उस कूएं में से) निकाल लेते हैं। 1। वह (संतजन ही) मेरे (असल) मित्र हैं। मैं उनके चरणों की धूड़ (की चाहत रखता) हूँ। हे भाई ! जिनको मिलने से (मेरा मन) आनंद से भर जाता है। जो (मुझे) आत्मिक जीवन की दाति देते हैं।1। रहाउ। हे भाई ! इस मानस जन्म में (जब किसी मनुष्य को कोई संतजन मिल जाता है। तब) बड़े पूर्बले जन्मों से उसके माथे पर लेख उघड़ पड़ते हैं। प्रभू के सेवक-जन की संगति में बसते हुए (उस मनुष्य की) सारी आशाएं पूरी हो जाती है। 2। हे भाई ! सब कुछ कर सकने वाले गुरू ने जिस मनुष्य पर दया की। उसके मन में प्रभू का नाम बस पड़ता है। सारे जगत को डराने वाले (उसके) सारे डर नाश हो जाते हैं (क्योंकि गुरू की कृपा से) उसको सुखों का ठिकाना (साध-संगति) मिल जाता है। 3। नानक का आप ही आसरा है नानक की आप ही ओट है। (मुझे नानक को भी गुरू मिला। संत जन मिला)। हे जगत के मूल प्रभू ! हे सारी ताकतों के मालिक प्रभू ! हे अपहुँच हरी ! हे बेअंत हरी ! 4। 19। 49।
बिलावलु महला 5 ॥ सोई मलीनु दीनु हीनु जिसु प्रभु बिसराना ॥ करनैहारु न बूझई आपु गनै बिगाना ॥1॥ दूखु तदे जदि वीसरै सुखु प्रभ चिति आए ॥ संतन कै आनंदु एहु नित हरि गुण गाए ॥1॥ रहाउ ॥ ऊचे ते नीचा करै नीच खिन महि थापै ॥ कीमति कही न जाईऐ ठाकुर परतापै ॥2॥ पेखत लीला रंग रूप चलनै दिनु आइआ ॥ सुपने का सुपना भइआ संगि चलिआ कमाइआ ॥3॥ करण कारण समरथ प्रभ तेरी सरणाई ॥ हरि दिनसु रैणि नानकु जपै सद सद बलि जाई ॥4॥20॥50॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा भूल जाता है। वही मनुष्य गंदा है। कंगाल है। नीच है। वह मूर्ख मनुष्य अपने आप को (कोई बड़ी हस्ती) समझता रहता है। सब कुछ करने के समर्थ प्रभू को कुछ समझता नहीं। 1। (हे भाई ! मनुष्य को) तब ही दुख होता है जब इसे परमात्मा भूल जाता है। परमात्मा के मन में बसने से (हमेशा) सुख प्रतीत होता है। प्रभू का सेवक सदा प्रभू के गुण गाता रहता है। सेवक के हृदय में ये आनंद टिका रहता है। 1। रहाउ। (पर।हे भाई ! याद रख) परमात्मा ऊँचे (घमण्डी। अकड़वाले) से नीचा बना देता है। और नीचों को एक पल में इज्जत वाले बना देता है। उस परमात्मा के प्रताप का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 2। (हे भाई ! दुनिया के) खेल-तमाशे (दुनिया के) रंग-रूप देखते-देखते (ही मनुष्य के दुनिया से) चलने के दिन आ पहुँचते हैं। इन रंग-तमाशों से तो साथ खत्म ही होना था। वह साथ खत्म हो जाता है। मनुष्य के साथ तो किए हुए कर्म ही जाते हैं। 3। हे जगत के रचनहार प्रभू ! हे सारी ताकतों के मालिक प्रभू ! (आपका दास नानक) आपकी शरण आया है। हे हरी ! नानक दिन-रात (आपका ही नाम) जपता है। आपसे ही सदा-सदा सदके जाता है। 4। 20। 50।
बिलावलु महला 5 ॥ जलु ढोवउ इह सीस करि कर पग पखलावउ ॥ बारि जाउ लख बेरीआ दरसु पेखि जीवावउ ॥1॥ करउ मनोरथ मनै माहि अपने प्रभ ते पावउ ॥ देउ सूहनी साध कै बीजनु ढोलावउ ॥1॥ रहाउ ॥ अंम्रित गुण संत बोलते सुणि मनहि पीलावउ ॥ उआ रस महि सांति त्रिपति होइ बिखै जलनि बुझावउ ॥2॥ जब भगति करहि संत मंडली तिन॑ मिलि हरि गावउ ॥ करउ नमसकार भगत जन धूरि मुखि लावउ ॥3॥ ऊठत बैठत जपउ नामु इहु करमु कमावउ ॥ नानक की प्रभ बेनती हरि सरनि समावउ ॥4॥21॥51॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! मेरी यह तमन्ना है कि गुरू के घर में) मैं अपने सिर पर पानी ढोया करूँ। और अपने हाथों से (संत जनों के) पैर धोया करूँ। मैं लाखों बार (गुरू से) सदके जाऊँ और (गुरू की संगति के) दर्शन करके (अपने अंदर) आत्मिक जीवन पैदा करता रहूँ। 1। (हे भाई ! मेरी सदा यही आरजू है कि) मैं जो भी माँग अपने मन में करूँ। वह माँग मैं अपने परमात्मा से प्राप्त कर लूँ। मैं गुरू के घर में (साध-संगति में) झाड़ू दिया करूँ और पंखा झला करूँ। 1। रहाउ। (हे भाई ! मेरी ये अरदास है कि साध-संगति में) संत जन परमात्मा के आत्मिक जीवन देने वाले जो गुण उचारते हैं। उनको सुन के मैं अपने मन को (नाम अमृत) पिलाया करूँ। (नाम अमृत के) उस स्वाद में (मेरे अंदर) शांति और (तृष्णा से) तृप्ति पैदा हो। (नाम-अमृत की सहायता से) मैं (अपने अंदर से) विषियों की जलन बुझाता रहूँ। 2। (हे भाई ! मेरी यही अरदास है कि) जब संत जन साध-संगति में बैठ के परमात्मा की भक्ति करते हैं। उनके साथ मिल के मैं भी परमात्मा के गुण गान करूँ। मैं संतजनों के आगे सिर झुकाया करूँ। और उनके चरणों की धूड़ (अपने) माथे पर लगाया करूँ। 3। उठते-बैठते (हर वक्त) मैं (आपका) नाम जपा करूँ। मैं इस काम को (ही श्रेष्ठ जान के नित्य) करा करूँ। और। हे हरी ! मैं आपके ही चरणों में लीन रहूँ, हे प्रभू ! (आपके दर पर) नानक की यही विनती है 4। 21। 51।
बिलावलु महला 5 ॥ इहु सागरु सोई तरै जो हरि गुण गाए ॥ साधसंगति कै संगि वसै वडभागी पाए ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! ये जगत। मानो। एक समुंद्र है जिसमें विकारों का पानी भरा पड़ा है) इस समुंद्र में से वही मनुष्य पार लांघता है। जो परमात्मा के सिफत-सालाह के गीत गाता रहता है। जो साध-संगति के साथ मेल-जोल रखता है। (पर यह दाति) कोई भाग्यशाली मनुष्य ही प्राप्त करता है। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू दीनों पर दया करने वाला है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।