अंग
812
बिलावल
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स्रवनी सुनउ हरि हरि हरे ठाकुर जसु गावउ ॥
बिलावलु महला 5 ॥
स्रवनी सुनउ हरि हरि हरे ठाकुर जसु गावउ ॥
संत चरण कर सीसु धरि हरि नामु धिआवउ ॥1॥
करि किरपा दइआल प्रभ इह निधि सिधि पावउ ॥
संत जना की रेणुका लै माथै लावउ ॥1॥ रहाउ ॥
नीच ते नीचु अति नीचु होइ करि बिनउ बुलावउ ॥
पाव मलोवा आपु तिआगि संतसंगि समावउ ॥2॥
सासि सासि नह वीसरै अन कतहि न धावउ ॥
सफल दरसन गुरु भेटीऐ मानु मोहु मिटावउ ॥3॥
सतु संतोखु दइआ धरमु सीगारु बनावउ ॥
सफल सुहागणि नानका अपुने प्रभ भावउ ॥4॥15॥45॥
स्रवनी सुनउ हरि हरि हरे ठाकुर जसु गावउ ॥
संत चरण कर सीसु धरि हरि नामु धिआवउ ॥1॥
करि किरपा दइआल प्रभ इह निधि सिधि पावउ ॥
संत जना की रेणुका लै माथै लावउ ॥1॥ रहाउ ॥
नीच ते नीचु अति नीचु होइ करि बिनउ बुलावउ ॥
पाव मलोवा आपु तिआगि संतसंगि समावउ ॥2॥
सासि सासि नह वीसरै अन कतहि न धावउ ॥
सफल दरसन गुरु भेटीऐ मानु मोहु मिटावउ ॥3॥
सतु संतोखु दइआ धरमु सीगारु बनावउ ॥
सफल सुहागणि नानका अपुने प्रभ भावउ ॥4॥15॥45॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं अपने कानों से सदा (आप) हरी का नाम सुनता रहूँ। (आप) ठाकुर की सिफत-सालाह गाता रहूँ। संतों के चरणों पर मैं अपने दोनों हाथ और अपना सिर रख कर (आप) हरी का नाम सिमरता रहूँ। 1। (मैं आपके दर से) यह (दाति) हासिल कर लूँ। (यही मेरे वास्ते दुनिया के) नौ खजाने (हैं। यही मेरे वास्ते अठारह) सिद्धियाँ (हैं)। हे दया के श्रोत प्रभू ! मेहर कर। मैं आपके संत-जनों की चरण-धूड़ ले के अपने माथे पर (सदा) लगाता रहूँ।1। रहाउ। (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं नीच से नीचा बहुत नीचा हो के (संतों के आगे) विनती करके उनको बुलाता रहूँ। मैं स्वै भाव छोड़ के संतों के पैर मलता रहूँ और संतों की संगति में टिका रहूँ। 2। (हे प्रभू ! मेहर कर) मुझे हरेक साँस के साथ कभी आपका नाम ना भूले (गुरू का दर छोड़ के) मैं किसी और तरफ़ ना भटकता फिरूँ। (हे प्रभू ! अगर आपकी मेहर हो तो) मुझे वह गुरू मिल जाए। जिसका दर्शन जीवन को कामयाब कर देता है। (गुरू के दर पर टिक के) मैं (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लूँ। मोह को मिटा दूँ। 3। (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं सत्य को। संतोख को। दया को। धर्म को। (अपने आत्मिक जीवन की) सजावट बनाए रखूँ। हे नानक ! (कह- जैसे) सोहागिन स्त्री (अपनी पति को प्यारी लगती है। वैसे ही। अगर उसकी मेहर हो। तो) कामयाब जीवन वाला बन के अपने प्रभू को प्यारा लग सकता हूँ। 4। 15। 45।
अटल बचन साधू जना सभ महि प्रगटाइआ ॥
बिलावलु महला 5 ॥
अटल बचन साधू जना सभ महि प्रगटाइआ ॥
जिसु जन होआ साधसंगु तिसु भेटै हरि राइआ ॥1॥
इह परतीति गोविंद की जपि हरि सुखु पाइआ ॥
अनिक बाता सभि करि रहे गुरु घरि लै आइआ ॥1॥ रहाउ ॥
सरणि परे की राखता नाही सहसाइआ ॥
करम भूमि हरि नामु बोइ अउसरु दुलभाइआ ॥2॥
अंतरजामी आपि प्रभु सभ करे कराइआ ॥
पतित पुनीत घणे करे ठाकुर बिरदाइआ ॥3॥
मत भूलहु मानुख जन माइआ भरमाइआ ॥
नानक तिसु पति राखसी जो प्रभि पहिराइआ ॥4॥16॥46॥
अटल बचन साधू जना सभ महि प्रगटाइआ ॥
जिसु जन होआ साधसंगु तिसु भेटै हरि राइआ ॥1॥
इह परतीति गोविंद की जपि हरि सुखु पाइआ ॥
अनिक बाता सभि करि रहे गुरु घरि लै आइआ ॥1॥ रहाउ ॥
सरणि परे की राखता नाही सहसाइआ ॥
करम भूमि हरि नामु बोइ अउसरु दुलभाइआ ॥2॥
अंतरजामी आपि प्रभु सभ करे कराइआ ॥
पतित पुनीत घणे करे ठाकुर बिरदाइआ ॥3॥
मत भूलहु मानुख जन माइआ भरमाइआ ॥
नानक तिसु पति राखसी जो प्रभि पहिराइआ ॥4॥16॥46॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू के बचन कभी टलने वाले नहीं हैं। गुरू ने सारे जगत में ये बात प्रकट रूप से सुना दी है कि जिस मनुष्य को गुरू का संग प्राप्त होता है। उसको प्रभू-पातशाह मिल जाता है। 1। (गुरू ही) परमात्मा के बारे में यह निश्चय (जीव के अंदर पैदा करता है कि) परमात्मा का नाम जप के (मनुष्य) आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। हे भाई ! सारे जीव (और और) अनेकों बातें कर कर के थक जाते हैं (और और बातें सफल नहीं होतीं)। गुरू (ही) प्रभू चरनों में (जीव को) ला जोड़ता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू बताता है कि) परमात्मा उस मनुष्य की इज्जत रख लेता है जो उसकी शरण आ पड़ता है- इसमें रक्ती भर भी शक नहीं। (इस वास्ते। हे भाई !) इस मनुष्य शरीर में परमात्मा के नाम का बीज बीजो। यह मौका बड़ी मुश्किल से मिलता है। 2। (हे भाई ! गुरू बताता है कि) परमात्मा स्वयं ही हरेक के दिल की जानने वाला है। सारी सृष्टि वैसे ही करती है जैसे परमात्मा प्रेरता है। (शरण पड़े) अनेकों ही विकारियों को परमात्मा पवित्र जीवन वाला बना देता है- ये उसका मूल बिरद भरा स्वभाव है। 3। हे नानक ! (कह-) हे मनुष्यो ! माया की भटकना में पड़ कर ये बात भूल ना जाना कि जिस मनुष्य को प्रभू ने खुद आदर बख्शा (वडिआई दी) उसकी वह इज्जत जरूर रख लेता है। 4। 16। 46।
माटी ते जिनि साजिआ करि दुरलभ देह ॥
बिलावलु महला 5 ॥
माटी ते जिनि साजिआ करि दुरलभ देह ॥
अनिक छिद्र मन महि ढके निरमल द्रिसटेह ॥1॥
किउ बिसरै प्रभु मनै ते जिस के गुण एह ॥
प्रभ तजि रचे जि आन सिउ सो रलीऐ खेह ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरहु सिमरहु सासि सासि मत बिलम करेह ॥
छोडि प्रपंचु प्रभ सिउ रचहु तजि कूड़े नेह ॥2॥
जिनि अनिक एक बहु रंग कीए है होसी एह ॥
करि सेवा तिसु पारब्रहम गुर ते मति लेह ॥3॥
ऊचे ते ऊचा वडा सभ संगि बरनेह ॥
दास दास को दासरा नानक करि लेह ॥4॥17॥47॥
माटी ते जिनि साजिआ करि दुरलभ देह ॥
अनिक छिद्र मन महि ढके निरमल द्रिसटेह ॥1॥
किउ बिसरै प्रभु मनै ते जिस के गुण एह ॥
प्रभ तजि रचे जि आन सिउ सो रलीऐ खेह ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरहु सिमरहु सासि सासि मत बिलम करेह ॥
छोडि प्रपंचु प्रभ सिउ रचहु तजि कूड़े नेह ॥2॥
जिनि अनिक एक बहु रंग कीए है होसी एह ॥
करि सेवा तिसु पारब्रहम गुर ते मति लेह ॥3॥
ऊचे ते ऊचा वडा सभ संगि बरनेह ॥
दास दास को दासरा नानक करि लेह ॥4॥17॥47॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जिस परमात्मा ने (जीव का) दुर्लभ मानस शरीर बना के मिट्टी से इसको पैदा कर दिया। उसने ही जीव के अनेकों ही ऐब उसके अंदर छुपा कर रखे हैं। जीव का शरीर फिर भी साफ-सुथरा दिखता है। 1। हे भाई ! जिस (परमात्मा) के यह (अनेकों) गुण हैं। वह हमारे मन से कभी भी भूलना नहीं चाहिए। जो मनुष्य प्रभू (की याद) छोड़ के और-और पदार्थों के साथ मोह बनाता है। वह मिट्टी में मिल जाता है (उसका जीवन व्यर्थ चला जाता है)। 1। रहाउ। हे भाई ! हरेक सांस के साथ हर वक्त उस परमात्मा को याद करते रहो। देखना। रक्ती भर भी ढील नहीं करनी। हे भाई ! दुनिया के नाशवंत पदार्थों का प्यार त्याग के। दिखाई देते जगत का मोह छोड़ के। परमात्मा के साथ प्यार बनाए रखो। 2। हे भाई ! जिस एक परमात्मा ने (अपने आप से जगत के) यह अनेकों बहुत रंग बना दिए हैं। वह अब भी (हर जगह) मौजूद है। आगे को भी (सदा) कायम रहेगा। गुरू से शिक्षा ले के उस परमात्मा की सेवा-भक्ति किया करो। 3। हे भाई ! वह प्रभू (जगत की) ऊँची से ऊँची हस्ती से भी ऊँचा है। बड़ों से भी बड़ा है। वैसे वह सारे जीवों के साथ (बसता हुआ भी) बताया जाता है। हे नानक ! (उस प्रभू के दर पर अरदास कर। और कह- हे प्रभू !) मुझे अपने दासों के दासों का छोटा सा दास बना ले। 4। 17। 47।
एक टेक गोविंद की तिआगी अन आस ॥
बिलावलु महला 5 ॥
एक टेक गोविंद की तिआगी अन आस ॥
सभ ऊपरि समरथ प्रभ पूरन गुणतास ॥1॥
जन का नामु अधारु है प्रभ सरणी पाहि ॥
परमेसर का आसरा संतन मन माहि ॥1॥ रहाउ ॥
आपि रखै आपि देवसी आपे प्रतिपारै ॥
एक टेक गोविंद की तिआगी अन आस ॥
सभ ऊपरि समरथ प्रभ पूरन गुणतास ॥1॥
जन का नामु अधारु है प्रभ सरणी पाहि ॥
परमेसर का आसरा संतन मन माहि ॥1॥ रहाउ ॥
आपि रखै आपि देवसी आपे प्रतिपारै ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! प्रभू के भक्त एक प्रभू की ही ओट लेते हैं। अन्य (आसरों की) आस त्याग देते हैं। (उन्हें विश्वास रहता है कि) प्रभू सब जीवों पर ताकत रखने वाला है। सब ताकतों से भरपूर है। सब गुणों का खजाना है। 1। हे भाई ! परमात्मा के सेवकों (की जिंदगी) का आसरा परमात्मा का नाम (ही होता) है। सेवक सदा परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। सेवकों के मन में सदा परमात्मा (के नाम) का ही सहारा होता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! संतजनों को यकीन है कि) परमात्मा स्वयं हरेक जीव की रक्षा करता है। खुद हरेक दाति देता है। खुद ही (हरेक की) पालना करता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८१२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।