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अंग ८१० · बिलावल

अंग
810
बिलावल
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  1. स्रमु करते दम आढ कउ ते गनी धनीता ॥3॥
  2. अहंबुधि परबाद नीत लोभ रसना सादि ॥
  3. चरन भए संत बोहिथा तरे सागरु जेत ॥
  4. बिनु साधू जो जीवना तेतो बिरथारी ॥
  5. टहल करउ तेरे दास की पग झारउ बाल ॥

स्रमु करते दम आढ कउ ते गनी धनीता ॥3॥

अंग ८०९ से चला आ रहा अंश

स्रमु करते दम आढ कउ ते गनी धनीता ॥3॥
कवन वडाई कहि सकउ बेअंत गुनीता ॥
करि किरपा मोहि नामु देहु नानक दर सरीता ॥4॥7॥37॥

हिन्दी अर्थ: (जो मनुष्य पहले) आधी-आधी कौड़ी के लिए धक्के खाते फिरते हैं। वे दौलत-मंद धनाढ बन जाते हैं (माया की ओर से बेमुथाज हो जाते हैं)। 3। (हे मित्र ! साध-संगति में से मिलते हरी-नाम की) मैं कौन-कौन सी महिमा बताऊँ। परमात्मा का नाम बेअंत गुणों का मालिक है। हे नानक ! अरदास कर। और। (कह- हे प्रभू !) मैं आपके दर का गुलाम हूँ। मेहर कर और। मुझे अपना नाम बख्श। 4। 7। 37।

अहंबुधि परबाद नीत लोभ रसना सादि ॥

बिलावलु महला 5 ॥
अहंबुधि परबाद नीत लोभ रसना सादि ॥
लपटि कपटि ग्रिहि बेधिआ मिथिआ बिखिआदि ॥1॥
ऐसी पेखी नेत्र महि पूरे गुर परसादि ॥
राज मिलख धन जोबना नामै बिनु बादि ॥1॥ रहाउ ॥
रूप धूप सोगंधता कापर भोगादि ॥
मिलत संगि पापिसट तन होए दुरगादि ॥2॥
फिरत फिरत मानुखु भइआ खिन भंगन देहादि ॥
इह अउसर ते चूकिआ बहु जोनि भ्रमादि ॥3॥
प्रभ किरपा ते गुर मिले हरि हरि बिसमाद ॥
सूख सहज नानक अनंद ता कै पूरन नाद ॥4॥8॥38॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (प्रभू के नाम से टूट के मनुष्य) अहंकार की बुद्धि के आसरे दूसरों को ललकारने वाले कड़वे बोल बोलता है। सदा लालच और जीभ के स्वाद में (फसा रहता है); घर (के मोह) में। ठॅगी-फरेब में फस के। नाशवंत माया (के मोह) में भेदा रहता है। 1। हे भाई ! गुरू की कृपा से मैंने अपनी आँखों से ही (जगत के पदार्थों की) ऐसी हालत देख ली है (कि दुनिया की) बादशाहियाँ। ज़मीनों (की मल्कियत)। धन और जवानी (आदि सारे ही) परमात्मा के नाम के बिना व्यर्थ हैं। 1। रहाउ। सुंदर रूप, धूप आदि सुगंधियाँ। बढ़िया कपड़े। बढ़िया पकवान (ये सारे ही) सुंदर-सुंदर पदार्थ (प्रभू के नाम से विछुडे) महा विकारी मनुष्य शरीर के साथ छू के दुर्गन्धि देने वाले बन जाते हैं। 2। हे भाई ! अनेकों जूनियों में भटकता-भटकता जीव मनुष्य बनता है। ये शरीर भी एक छिन में नाश हो जाने वाला है (इसका गुमान भी कैसा। इस शरीर में भी परमात्मा के नाम से टूटा रहता है)। इस मौके से विछुड़ा हुआ जीव (फिर) अनेकों जूनियों में जा भटकता है। 3। हे नानक ! परमात्मा की कृपा से जो मनुष्य गुरू को मिल गए। उन्होंने आश्चर्य रूप से हरी का नाम जपा। उनके हृदय में आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद के बाजे सदा बजने लग पड़े। 4। 8। 38।

चरन भए संत बोहिथा तरे सागरु जेत ॥

बिलावलु महला 5 ॥
चरन भए संत बोहिथा तरे सागरु जेत ॥
मारग पाए उदिआन महि गुरि दसे भेत ॥1॥
हरि हरि हरि हरि हरि हरे हरि हरि हरि हेत ॥
ऊठत बैठत सोवते हरि हरि हरि चेत ॥1॥ रहाउ ॥
पंच चोर आगै भगे जब साधसंगेत ॥
पूंजी साबतु घणो लाभु ग्रिहि सोभा सेत ॥2॥
निहचल आसणु मिटी चिंत नाही डोलेत ॥
भरमु भुलावा मिटि गइआ प्रभ पेखत नेत ॥3॥
गुण गभीर गुन नाइका गुण कहीअहि केत ॥
नानक पाइआ साधसंगि हरि हरि अंम्रेत ॥4॥9॥39॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू के चरण (उस मनुष्य के लिए) जहाज बन गए और उस जहाज) के माध्यम से वह मनुष्य (संसार-) समुंद्र से पार लांघ गया (जिस मनुष्य को हरी-नाम सिमरन का) भेद गुरू ने बता दिया। उसने (विकारों की ओर ले जाने वाले) बीयाबान-जंगल में (भी जीवन का सही) रास्ता ढूँढ लिया।1। परमात्मा का नाम याद करा कर। हे भाई ! उठते-बैठते-सोए हुए (हर वक्त) सदा ही हर वक्त परमात्मा के नाम में प्यार डाल। 1। रहाउ। (हे भाई !) जब (मनुष्य) साध-संगत में (जा टिकता है। तब कामादिक) पाँचों चोर उससे टकराने का साहस नहीं करते (उससे दूर भाग जाते हैं)। (तब ना सिर्फ) उसके आत्मिक जीवन की सारी की सारी राशि-पूँजी (लूटे जाने से) बच जाती है। (बल्कि। उसको इस नाम के व्यापार में) बहुत सारा फायदा भी होता है। और परलोक में शोभा ले के जाता है। 2। (विकारों के मुकाबले में) उसका हृदय-आसन अटल हो जाता है। उसकी (हरेक किस्म की) चिंता मिट जाती है। वह मनुष्य (विकारों के सामने) डोलता नहीं। (हे भाई ! साध-संगति की बरकति से हर जगह) आँखों से परमात्मा के दर्शन करके उस मनुष्य की भटकना समाप्त हो जाती है। गलत रास्ते पर जाने वाली आदत दूर हो जाती है।3। हे नानक ! परमात्मा गुणों का अथाह समुंद्र है। गुणों का खजाना है (बयान करने से) उसके सारे गुण बयान नहीं किए जा सकते। पर जो मनुष्य साध-संगति में टिक के आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जल पीता है। उसको परमात्मा का मिलाप प्राप्त हो जाता है। 4। 9। 39।

बिनु साधू जो जीवना तेतो बिरथारी ॥

बिलावलु महला 5 ॥
बिनु साधू जो जीवना तेतो बिरथारी ॥
मिलत संगि सभि भ्रम मिटे गति भई हमारी ॥1॥
जा दिन भेटे साध मोहि उआ दिन बलिहारी ॥
तनु मनु अपनो जीअरा फिरि फिरि हउ वारी ॥1॥ रहाउ ॥
एत छडाई मोहि ते इतनी द्रिड़तारी ॥
सगल रेन इहु मनु भइआ बिनसी अपधारी ॥2॥
निंद चिंद पर दूखना ए खिन महि जारी ॥
दइआ मइआ अरु निकटि पेखु नाही दूरारी ॥3॥
तन मन सीतल भए अब मुकते संसारी ॥
हीत चीत सभ प्रान धन नानक दरसारी ॥4॥10॥40॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई !) गुरू (के मिलाप) के बिना जितनी भी उम्र गुजारनी है। वह सारी व्यर्थ चली जाती है। गुरू की संगति में मिलते ही सारी भटकनें मिट जाती हैं। (गुरू की कृपा से) हम जीवों को उच्च आत्मिक अवस्था मिल जाती है। 1। (हे भाई !) मैं तो उस दिन पर सदके जाता हूँ। जिस दिन मुझे मेरे गुरू (पातशाह) मिल गए। अब मैं (अपने गुरू से) अपना शरीर। अपना मन। अपनी प्यारी जीवात्मा बारंबार सदके करता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू ने कृपा करके) मुझसे अपनत्व (मोह की पकड़) इतना छुड़वा दिया है। और विनम्रता (मेरे हृदय में) इतनी पक्की कर दी है कि अब मेरा ये मन सभी की चरण-धूड़ बन गया है। हर वक्त अपने ही स्वार्थ का ख्याल मेरे अंदर से खत्म हो गया है। 2। हे भाई ! गुरू ने मेरे अंदर से पराई निंदा का ख्याल। दूसरों का बुरा देखना - ये सब कुछ एक छिन में ही जला दिए हैं। (दूसरों पर) दया (करनी)। (जरूरतमंदों पर) तरस (करना)। और (परमात्मा को हर वक्त) अपने नजदीक देखना- ये हर वक्त मेरे अंदर बसते हैं। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जब से मुझे गुरू मिल गया है। उसकी मेहर से) अब मेरा मन और तन (विकारों की तरफ से) शांत हो गए हैं। दुनियाँ के मोह और बँधनों से आजाद हो गए हैं। अब मेरी लगन। मेरी सुरति। मेरी जीवात्मा प्रभू के दर्शनों में ही मगन है। प्रभू के दर्शन ही मेरे वास्ते धन (पदार्थ) हैं। 4। 10। 40।

टहल करउ तेरे दास की पग झारउ बाल ॥

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बिलावलु महला 5 ॥
टहल करउ तेरे दास की पग झारउ बाल ॥
मसतकु अपना भेट देउ गुन सुनउ रसाल ॥1॥
तुम॑ मिलते मेरा मनु जीओ तुम॑ मिलहु दइआल ॥
निसि बासुर मनि अनदु होत चितवत किरपाल ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं आपके सेवक की सेवा करता रहूँ। मैं (आपके सेवक के) चरण (अपने) केसों से झाड़ता रहूँ। मैं अपना सिर (आपके सेवक के आगे) भेटा कर दूँ। (और उससे आपके) रस भरे गुण सुनता रहूँ। 1। हे दया के श्रोत प्रभू ! आपको मिलके मेरा मन आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। हे कृपा के घर प्रभू ! (आपके गुण) याद करते हुए दिन-रात मेरे मन में आनंद बना रहता है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८१० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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