अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मेहर कर) मैं आपके सेवक के पैरों की खाक़ हासिल कर सकूँ। मैं आपके सेवक पर से सदके जाऊँ। 4। 3। 33।
बिलावलु महला 5 ॥ राखहु अपनी सरणि प्रभ मोहि किरपा धारे ॥ सेवा कछू न जानऊ नीचु मूरखारे ॥1॥ मानु करउ तुधु ऊपरे मेरे प्रीतम पिआरे ॥ हम अपराधी सद भूलते तुम॑ बखसनहारे ॥1॥ रहाउ ॥ हम अवगन करह असंख नीति तुम॑ निरगुन दातारे ॥ दासी संगति प्रभू तिआगि ए करम हमारे ॥2॥ तुम॑ देवहु सभु किछु दइआ धारि हम अकिरतघनारे ॥ लागि परे तेरे दान सिउ नह चिति खसमारे ॥3॥ तुझ ते बाहरि किछु नही भव काटनहारे ॥ कहु नानक सरणि दइआल गुर लेहु मुगध उधारे ॥4॥4॥34॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! मेहर करके आप मुझे अपनी ही शरण में रख। मैं नीच जीवन वाला हूँ। मैं मूर्ख हूँ। मुझ में आपकी सेवा-भक्ति करने की समझ-अक्ल नहीं। 1। हे मेरे प्रीतम ! हे मेरे प्यारे ! हम जीव सदा अपराध करते रहते हैं। भूलें करते रहते हैं। आप हमेशा हमें क्षमा करने वाला है (इसलिए) मैं आपके पर ही (आपकी बख्शिश पर ही) भरोसा रखता हूँ। 1। रहाउ। हे प्रभू ! हम हमेशा ही अनगिनत अवगुण करते रहते हैं। आप (फिर भी) हम गुण-हीनों को अनेकों दातें देने वाला है। हे प्रभू ! हमारे नित्य के कर्म तो ये हैं कि हम आपको भुला के आपकी सेविका (माया) की संगति में टिके रहते हैं। 2। हे प्रभू ! हम (जीव) अकृतघ्न हैं (एहसान फरामोश हैं)। आप (फर भी) मेहर करके हमें हरेक चीज़ देता है। हे पति-प्रभू ! हम आपको अपने चित्त में नहीं बसाते। सदा आपकी दी हुई दातों को ही चिपके रहते हैं। 3। हे (जीवों के) जन्मों के चक्र काटने वाले ! (जगत में) कोई भी चीज आपसे आकी नहीं हैं सकती (हमें भी सही जीवन-राह पर डाले रख)। हे नानक ! कह- हे दया के श्रोत गुरू ! हम आपकी शरण आए हैं। हम मूर्खों को (अवगुणों व भूलों से) बचाए रख। 4। 4। 34।
बिलावलु महला 5 ॥ दोसु न काहू दीजीऐ प्रभु अपना धिआईऐ ॥ जितु सेविऐ सुखु होइ घना मन सोई गाईऐ ॥1॥ कहीऐ काइ पिआरे तुझु बिना ॥ तुम॑ दइआल सुआमी सभ अवगन हमा ॥1॥ रहाउ ॥ जिउ तुम॑ राखहु तिउ रहा अवरु नही चारा ॥ नीधरिआ धर तेरीआ इक नाम अधारा ॥2॥ जो तुम॑ करहु सोई भला मनि लेता मुकता ॥ सगल समग्री तेरीआ सभ तेरी जुगता ॥3॥ चरन पखारउ करि सेवा जे ठाकुर भावै ॥ होहु क्रिपाल दइआल प्रभ नानकु गुण गावै ॥4॥5॥35॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे मेरे मन ! (अपनी की हुई भूलों के कारण मिल रहे दुखों के बारे) किसी और को दोष नहीं देना चाहिए (इन दुखों से बचने के लिए) अपने परमात्मा को (ही) याद करना चाहिए क्योंकि उस परमात्मा की सेवा-भक्ति करने से बहुत सुख मिलता है। उसकी ही सिफत-सालाह के गीत गाने चाहिए। 1। हे प्यारे प्रभू ! आपके बिना और किस के पास विनती की जाए हे (मेरे) मालिक प्रभू ! आप तो सदा दया का घर है। सारे अवगुण हम जीवों के ही हैं (जिनके कारण हमें दुख-कलेश होते हैं)। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आप जैसे मुझे रखता है। मैं उसी तरह रह सकता हूँ। (आपकी रजा के उलट) मेरा कोई जोर नहीं चल सकता। हे प्रभू ! आप ही निओटिओं की ओट है। मुझे तो सिर्फ आपके नाम का ही आसरा है। 2। हे प्रभू ! जो कुछ आप करता है उसको जो मनुष्य (अपने) भले के लिए (होता) मान लेता है। वह (दुखों कलेशों की मार से) बच जाता है। हे प्रभू ! जगत के सारे पदार्थ आपके बनाए हुए हैं। सारी ही सामग्री आपकी ही मर्यादा में चल रही है। 3। हे प्रभू ! हे मालिक ! अगर आपको अच्छा लगे। तो मैं आपकी सेवा-भक्ति करके आपके चरण धोता रहूँ (भाव। अहंकार को त्याग के आपके दर पर गिरा रहूँ)। हे प्रभू ! दयावान हो। कृपा कर (ताकि आपकी दया और कृपा के बल पर आपका दास) नानक आपके गुण गाता रहे। 4। 5। 35।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! मौत (हरेक मनुष्य के) सिर पर (खड़ी) हस रही है (कि मूर्ख मनुष्य माया के मोह में फस के अपनी मौत को याद ही नहीं करता। पर) पशु (स्वभाव वाला मनुष्य ये बात) समझता ही नहीं। झगड़ों में (पदार्थों के) स्वादों में। अहंकार में (फस के) मनुष्य को मौत सूझती ही नहीं। 1। हे अभागे ! क्यों भटकता फिरता है। अपने गुरू की शरण पड़ा रह। सुंदर रंग वाला कुसंभी (मन-मोहनी माया) देख क्यों गलत रास्ते पड़ रहा है। 1। रहाउ। हे भाई ! (सारी उम्र) पाप कर कर के ही मनुष्य अपने बरतने के लिए धन एकत्र करता रहा। (पर मौत आने पर इसके शरीर की) मिट्टी धरती से मिल गई। और जीव खाली हाथ ही उठ के चल पड़ा। 2। जिन संबंधियों की खातिर मनुष्य (धन एकत्र करने की) मेहनत करता है वह (आखिर तक इसका साथ नहीं निबाह सकते। इस वास्ते इसके साथ) वैर करने वाले विरोध करने वाले ही बनते हैं। हे भाई ! आप (इनकी खातिर औरों से वैर सहेड़-सहेड़ के) क्यों क्रोध में जलता है। ये तो आखिरी वक्त पर आपका साथ छोड़ जाएंगें3। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य के माथे पर भाग्य जागते हैं। वही मनुष्य प्रभू के भगतों की चरण-धूड़ बनता है। गुरू की शरण पड़ने से (माया के मोह के) बंधन टूट जाते हैं। 4। 6। 36।
बिलावलु महला 5 ॥ पिंगुल परबत पारि परे खल चतुर बकीता ॥ अंधुले त्रिभवण सूझिआ गुर भेटि पुनीता ॥1॥ महिमा साधू संग की सुनहु मेरे मीता ॥ मैलु खोई कोटि अघ हरे निरमल भए चीता ॥1॥ रहाउ ॥ ऐसी भगति गोविंद की कीटि हसती जीता ॥ जो जो कीनो आपनो तिसु अभै दानु दीता ॥2॥ सिंघु बिलाई होइ गइओ त्रिणु मेरु दिखीता ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (मानो) पिंगले मनुष्य पहाड़ों से पार लांघ जाते हैं। महा मूर्ख मनुष्य समझदार व्याख्यान-कर्ता बन जाते हैं। अंधे को तीनों भवनों की समझ पड़ जाती है। हे मित्र ! गुरू को मिल के (मनुष्य) पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 1। हे मेरे मित्र ! गुरू की संगति की महिमा (ध्यान से) सुन। (जो भी मनुष्य नित्य गुरू की संगति में बैठता है। उसका) मन पवित्र हो जाता है। (उसके अंदर से विकारों की) मैल दूर हो जाती है। उसके करोड़ों पाप नाश हो जाते हैं। 1। रहाउ। (हे मित्र ! साध-संगति में आ के की हुई) परमात्मा की भक्ति आश्चर्यजनक (ताकत रखती है। इसकी बरकति से) कीड़ी (विनम्रता) ने हाथी (अहंकार) को जीत लिया है। (भक्ति पर प्रसन्न हो के) जिस-जिस मनुष्य को (परमात्मा ने) अपना बना लिया। उसको परमात्मा ने निर्भयता की दाति दे दी। 2। (हे मित्र ! गुरू की संगति की बरकति से) शेर (अहंकार) बिल्ली (निम्रता) बन जाता है। तीला (गरीबी स्वभाव) सुमेर पर्वत (जैसी बहुत बड़ी ताकत) दिखने लग जाता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मेहर कर) मैं आपके सेवक के पैरों की खाक़ हासिल कर सकूँ।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।