अंतरि बाहरि सरबति रविआ मनि उपजिआ बिसुआसो ॥
नानकु सिख देइ मन प्रीतम करि संता संगि निवासो ॥4॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि जल मिलि जीवे मीना ॥
हरि पी आघाने अंम्रित बाने स्रब सुखा मन वुठे ॥
स्रीधर पाए मंगल गाए इछ पुंनी सतिगुर तुठे ॥
लड़ि लीने लाए नउ निधि पाए नाउ सरबसु ठाकुरि दीना ॥
नानक सिख संत समझाई हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥5॥1॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
डखणा ॥
हठ मझाहू मा पिरी पसे किउ दीदार ॥
संत सरणाई लभणे नानक प्राण अधार ॥1॥
चरन कमल सिउ प्रीति रीति संतन मनि आवए जीउ ॥
दुतीआ भाउ बिपरीति अनीति दासा नह भावए जीउ ॥
दासा नह भावए बिनु दरसावए इक खिनु धीरजु किउ करै ॥
नाम बिहूना तनु मनु हीना जल बिनु मछुली जिउ मरै ॥
मिलु मेरे पिआरे प्रान अधारे गुण साधसंगि मिलि गावए ॥
नानक के सुआमी धारि अनुग्रहु मनि तनि अंकि समावए ॥1॥
सोहंदड़ो हभ ठाइ कोइ न दिसै डूजड़ो ॥
खुल॑ड़े कपाट नानक सतिगुर भेटते ॥1॥
तेरे बचन अनूप अपार संतन आधार बाणी बीचारीऐ जीउ ॥
सिमरत सास गिरास पूरन बिसुआस किउ मनहु बिसारीऐ जीउ ॥
किउ मनहु बेसारीऐ निमख नही टारीऐ गुणवंत प्रान हमारे ॥
मन बांछत फल देत है सुआमी जीअ की बिरथा सारे ॥
अनाथ के नाथे स्रब कै साथे जपि जूऐ जनमु न हारीऐ ॥
नानक की बेनंती प्रभ पहि क्रिपा करि भवजलु तारीऐ ॥2॥
धूड़ी मजनु साध खे साई थीए क्रिपाल ॥
लधे हभे थोकड़े नानक हरि धनु माल ॥1॥
सुंदर सुआमी धाम भगतह बिस्राम आसा लगि जीवते जीउ ॥
मनि तने गलतान सिमरत प्रभ नाम हरि अंम्रितु पीवते जीउ ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पहिले जन्म में की नेक कमाई के संस्कारों के अनुसार चिरों से विछुड़ा लक्ष्मी पति प्रभू (फिर) मिल पड़ता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।