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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 80 · सिरी राग

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अंग
80
सिरी राग
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  1. पुरबे कमाए स्रीरंग पाए हरि मिले चिरी विछुंनिआ ॥
  2. डखणा ॥
  3. छंतु ॥
  4. डखणा ॥
  5. छंतु ॥
  6. डखणा ॥
  7. छंतु ॥

पुरबे कमाए स्रीरंग पाए हरि मिले चिरी विछुंनिआ ॥

अंग 79 से चला आ रहा अंश

पुरबे कमाए स्रीरंग पाए हरि मिले चिरी विछुंनिआ ॥
अंतरि बाहरि सरबति रविआ मनि उपजिआ बिसुआसो ॥
नानकु सिख देइ मन प्रीतम करि संता संगि निवासो ॥4॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि जल मिलि जीवे मीना ॥
हरि पी आघाने अंम्रित बाने स्रब सुखा मन वुठे ॥
स्रीधर पाए मंगल गाए इछ पुंनी सतिगुर तुठे ॥
लड़ि लीने लाए नउ निधि पाए नाउ सरबसु ठाकुरि दीना ॥
नानक सिख संत समझाई हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥5॥1॥2॥

हिन्दी अर्थ: पहिले जन्म में की नेक कमाई के संस्कारों के अनुसार चिरों से विछुड़ा लक्ष्मी पति प्रभू (फिर) मिल पड़ता है। (हे भाई गुरमुखों की संगति करने से) मन में एक निश्चय बन जाता है कि परमात्मा (जीवों के) अंदर बाहर हर जगह व्यापक है। हे प्रीतम मन ! नानक (आपको) शिक्षा देता है गुरमुखों की संगति में टिका कर।4। हे (मेरे) प्यारे मन ! हे (मेरे) मित्र मन ! (जिस मनुष्य का) मन परमात्मा की प्रेमा भक्ति में मस्त रहता है, हे प्यारे मित्र मन ! वह मनुष्य परमात्मा को मिल के (ऐसे) आत्मिक जीवन हासिल करता है (जैसे) मछली पानी को मिल के जीती है। सतिगुरू की प्रसन्नता का पात्र बन के जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सलाह की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी (-रूप) पाणी पी के (माया की प्यास से) तृप्त हो जाता है, उसके मन में सारे सुख आ बसते हैं, वह मनुष्य लक्ष्मी पति प्रभू का मेल हासिल कर लेता है, प्रभू के सिफत सलाह के गीत गाता है, उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। उसे ठाकुर ने अपने पल्ले से लगा लिया है, ठाकुर की ओर से उसे (मानो) नौ खजाने मिल गए हैं क्योंकि, ठाकुर ने उसको अपना नाम दे दिया है जो (मानो, जगत का) सारा ही धन है हे नानक ! जिस मनुष्य को संत जनों ने (परमात्मा के सिमरन की) शिक्षा समझा दी है, उसका मन परमात्मा की प्रेमा भक्ति में लीन रहता है ।5।1।2।

डखणा ॥

सिरीराग के छंत महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
डखणा ॥
हठ मझाहू मा पिरी पसे किउ दीदार ॥
संत सरणाई लभणे नानक प्राण अधार ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग के छंद महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। डखणा ॥ मेरा प्यारा प्रभू पति (मेरे) हृदय में (बसता है, पर उसका) दीदार कैसे हो? हे नानक ! वह प्राणों का आसरा प्रभू संत जनों की शरण पड़ने से ही मिलता है।1।

छंतु ॥

छंतु ॥
चरन कमल सिउ प्रीति रीति संतन मनि आवए जीउ ॥
दुतीआ भाउ बिपरीति अनीति दासा नह भावए जीउ ॥
दासा नह भावए बिनु दरसावए इक खिनु धीरजु किउ करै ॥
नाम बिहूना तनु मनु हीना जल बिनु मछुली जिउ मरै ॥
मिलु मेरे पिआरे प्रान अधारे गुण साधसंगि मिलि गावए ॥
नानक के सुआमी धारि अनुग्रहु मनि तनि अंकि समावए ॥1॥

हिन्दी अर्थ: छंद॥ परमात्मा के सुंदर चरणों से प्यार डाले रखने की मर्यादा संत जनों के मन में (ही) बसती है। परमात्मा के बिना किसी और के साथ प्यार डालना (संत जनों को) उल्टी रीति लगती है, प्रभू के दासों को ये पसंद नहीं आती। परमात्मा के दर्शन के बगैर (कोई और जीवन जुगति) परमात्मा के दासों को अच्छी नहीं लगती। (परमात्मा का दास परमात्मा के दर्शन के बिनां) एक पल भी धैर्य नहीं कर सकता। दास का मन दास का तन प्रभू के नाम के बिना कमजोर (क्षीर्ण) हो जाता है, (नाम के बिना उसको) आत्मिक मौत आ गई प्रतीत होती है जैसे मछली पानी के बिना मर जाती है। हे मेरे प्यारे प्रभू ! हे मेरी जिंद के आसरे प्रभू ! (मुझे अपने दास को) मिल, ता कि आपका दास साध-संगति में मिल के आपके गुण गा सके। हे नानक के खसम प्रभू ! मिहर कर, ता कि आपका दास नानक मन से तन से आपकी गोद में (ही) समाया रहे।1।

डखणा ॥

डखणा ॥
सोहंदड़ो हभ ठाइ कोइ न दिसै डूजड़ो ॥
खुल॑ड़े कपाट नानक सतिगुर भेटते ॥1॥

हिन्दी अर्थ: डखणा ॥ कोई भी जीव ऐसा नहीं दिखता जो परमात्मा से अलग कोई और हो हे नानक ! गुरू को मिलने से (माया के मोह से मनुष्य की बुद्धि के बंद हुए) किवाड़ खुल जाते हैं (और मनुष्य को समझ आ जाती है कि परमात्मा) हरेक जगह में (बस रहा है और) शोभायमान है ।1।

छंतु ॥

छंतु ॥
तेरे बचन अनूप अपार संतन आधार बाणी बीचारीऐ जीउ ॥
सिमरत सास गिरास पूरन बिसुआस किउ मनहु बिसारीऐ जीउ ॥
किउ मनहु बेसारीऐ निमख नही टारीऐ गुणवंत प्रान हमारे ॥
मन बांछत फल देत है सुआमी जीअ की बिरथा सारे ॥
अनाथ के नाथे स्रब कै साथे जपि जूऐ जनमु न हारीऐ ॥
नानक की बेनंती प्रभ पहि क्रिपा करि भवजलु तारीऐ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: छंद॥ हे सुंदर प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! हे संतो के आसरे प्रभॅ ! (संतों ने आपकी सिफत सलाह के) बचन विचारे हैं (आपकी सिफत सलाह की) बाणी विचारी है (हृदय में बसाई है) स्वास स्वास (आपका नाम) सिमरते हुए (उन्हें ये) पूरा भरोसा बन जाता है कि (प्रभू का नाम) कभी भी मन से नहीं भुलाना चाहिए। हे गुणों के श्रोत प्रभू ! हे संतों की जिंद जान प्रभू ! (संतों को यह भरोसा बंध जाता है कि आपका नाम) कभी भी मन से नहीं भुलाना चाहिए, पलक झपकने जितने समय के लिए भी (मन में से) परे हटाना नहीं चाहिए। (उन्हें ये निश्चय हो जाता है कि) मालिक प्रभू मन-इच्छित फल बख्शता है और हरेक जीव की पीड़ा की सार लेता है। हे अनाथों के नाथ प्रभू ! हे जीवों के अंग संग रहने वाले प्रभू ! (आपका नाम) जपके मानस जनम (किसी जुआरिए की तरह) जूए (की बाजी) में व्यर्थ नहीं गवाया जाता। परमात्मा के पास नानक की ये विनती है, हे प्रभू ! कृपा कर (मुझे अपना नाम दे और) संसार समुंद्र से पार लंघा दे ।2।

डखणा ॥

डखणा ॥
धूड़ी मजनु साध खे साई थीए क्रिपाल ॥
लधे हभे थोकड़े नानक हरि धनु माल ॥1॥

हिन्दी अर्थ: डखणा ॥ हे नानक ! (जिन भाग्यशालियों पर) खसम प्रभू कृपाल होता है, उन्हें गुरमुखों की चरण धूड़ में स्नान (करना नसीब होता है)। जिनको हरि नाम धन प्राप्त होता है, जिनको हरि नाम पदार्थ मिल जाता है, उन्हें (मानो) सारे ही सुंदर पदार्थ मिल जाते हैं।1।

छंतु ॥

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छंतु ॥
सुंदर सुआमी धाम भगतह बिस्राम आसा लगि जीवते जीउ ॥
मनि तने गलतान सिमरत प्रभ नाम हरि अंम्रितु पीवते जीउ ॥

हिन्दी अर्थ: छंद॥ मालिक प्रभू के सुंदर चरण भगत जनों (के मन) वास्ते निवास स्थल होते हैं (भगत जन प्रभू चरणों में टिके रहने की ही) आशा धार के अपना जीवन ऊँचा करते हैं। परमात्मा का नाम सिमर सिमर के (भगत जन अपने) मन से (अपने) शरीर से प्रभू नाम में मस्त रहते हैं, और आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम जल सदा पीते रहते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 80 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।