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अंग 808

अंग
808
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जै जै कारु जगत्र महि लोचहि सभि जीआ ॥
सुप्रसंन भए सतिगुर प्रभू कछु बिघनु न थीआ ॥1॥
जा का अंगु दइआल प्रभ ता के सभ दास ॥
सदा सदा वडिआईआ नानक गुर पासि ॥2॥12॥30॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारे जगत में हर जगह उसकी शोभा होती है। (ज्रगत के) सारे जीव (उसके दर्शन करना) चाहते हैं हे भाई ! जिस मनुष्य पर गुरू परमात्मा अच्छी तरह प्रसन्न हो गए। उस मनुष्य के जीवन-राह में कोई रुकावट नहीं आती। 1। हे भाई ! दया का श्रोत प्रभू। जिस (मनुष्य) का पक्ष करता है। सब जीव उसके सेवक हो जाते हैं। हे नानक ! गुरू के चरणों में रहने से सदा ही आदर-मान मिलता है। 2। 12। 30।
रागु बिलावलु महला 5 घरु 5 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
म्रित मंडल जगु साजिआ जिउ बालू घर बार ॥
बिनसत बार न लागई जिउ कागद बूंदार ॥1॥
सुनि मेरी मनसा मनै माहि सति देखु बीचारि ॥
सिध साधिक गिरही जोगी तजि गए घर बार ॥1॥ रहाउ ॥
जैसा सुपना रैनि का तैसा संसार ॥
द्रिसटिमान सभु बिनसीऐ किआ लगहि गवार ॥2॥
कहा सु भाई मीत है देखु नैन पसारि ॥
इकि चाले इकि चालसहि सभि अपनी वार ॥3॥
जिन पूरा सतिगुरु सेविआ से असथिरु हरि दुआरि ॥
जनु नानकु हरि का दासु है राखु पैज मुरारि ॥4॥1॥31॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ (हे मेरे मन !) ये जगत (परमात्मा ने ऐसा) बनाया है (कि इस पर) मौत का राज है। ये ऐसे है जैसे रेत के बनें हुए घर आदि हों। जिस प्रकार बरसात की बूँदों से कागज़ (तुरंत) गल जाते हैं। ठीक उसी तरह इन (घरों) के नाश होते हुए वक्त नहीं लगता। 1। हे मेरे मन के फुरने ! (हे मेरे भटकते मन !) ध्यान से सुन। विचार के देख ले। (ये) सच (है कि) सिद्ध-साधिक-जोगी-गृहस्ती – सारे ही (मौत आने पर) अपना सब कुछ (यहीं) छोड़ के (यहाँ से) चले जा रहे हैं। 1। रहाउ। (हे मेरे भटकते मन !) ये जगत यूँ ही है जैसे रात को (सोए हुए ही) सपना आता है। हे मूर्ख ! जो कुछ दिखाई दे रहा है। ये सारा नाशवंत है। आप इस में क्यों मोह बना रहा है। 2। हे मूर्ख ! आँखें खोल के देख। (आपके) वह भाई वे मित्र कहाँ गए हैं। अपनी बारी आने पर कई (यहाँ से) जा चुके हैं। कई चले जाएंगे। सारे ही जीव अपनी-अपनी बारी (आने पर जाते जा रहे हैं)। 3। हे भाई ! जिन लोगों ने पूरे गुरू का आसरा लिया है वह (दिखते इस संसार में मोह डालने की जगह) परमात्मा के दर पर (परमात्मा के चरणों में) टिके रहते हैं। दास नानक (तो) परमात्मा का ही सेवक है (प्रभू के दर पर ही अरदास करता है कि) हे प्रभू ! (मैं आपकी शरण आया हूँ। मेरी) लाज रख। 4। 1। 31।
बिलावलु महला 5 ॥
लोकन कीआ वडिआईआ बैसंतरि पागउ ॥
जिउ मिलै पिआरा आपना ते बोल करागउ ॥1॥
जउ प्रभ जीउ दइआल होइ तउ भगती लागउ ॥
लपटि रहिओ मनु बासना गुर मिलि इह तिआगउ ॥1॥ रहाउ ॥
करउ बेनती अति घनी इहु जीउ होमागउ ॥
अरथ आन सभि वारिआ प्रिअ निमख सोहागउ ॥2॥
पंच संगु गुर ते छुटे दोख अरु रागउ ॥
रिदै प्रगासु प्रगट भइआ निसि बासुर जागउ ॥3॥
सरणि सोहागनि आइआ जिसु मसतकि भागउ ॥
कहु नानक तिनि पाइआ तनु मनु सीतलागउ ॥4॥2॥32॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई ! परमात्मा के मिलाप के मुकाबले में) लोगों द्वारा मिल रहे आदर-सम्मान को तो मैं आग में फेंक देने को तैयार हूँ। (दुनिया के लोगों की खुशमद करने की जगह) मैं तो वही बोल बोलूँगा। जिसके सदका मुझे मेरा प्यारा प्रभू मिल जाए। 1। हे भाई ! जब प्रभू जी मेरे ऊपर दयावान हों। तब ही मैं उनकी भक्ति में लग सकता हूँ। यह मन (सांसारिक पदार्थों की) वासनाओं में फंसा रहता है। गुरू की शरण पड़ कर ये वासनाएं छोड़ी जा सकती हैं (मैं छोड़ सकता हूँ)। 1। रहाउ। (हे भाई ! प्रभू के दर पर) मैं बहुत ही विनम्रता से प्रार्थनाएं करूँगा। अपनी ये जिंद भी कुर्बान कर दूँगा। प्यारे के एक-पल भर के मिलाप के आनंद के बदले में मैं (दुनिया के) सारे पदार्थ सदके कर दूँगा। 2। (हे भाई !) गुरू की कृपा से (मेरे अंदर से कामादिक) पाँचों (विकारों) का साथ खत्म हो गया है। (मेरे अंदर से) द्वैष और मोह दूर हो गए हैं। मेरे हृदय में (सही जीवन का) प्रकाश हो गया है। अब मैं (कामादिक के हमलों से) रात-दिन सचेत रहता हूँॅ। 3। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य के माथे पर सौभाग्य जागते हैं। वह सोहागन स्त्री की तरह (गुरू की) शरण पड़ता है। (गुरू की कृपा से) उसने प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है। उसका मन। उसका शरीर (कामादिक विकारों से निजात हासिल करके) ठंडा-ठार हो जाता है। 4। 2। 32।
बिलावलु महला 5 ॥
लाल रंगु तिस कउ लगा जिस के वडभागा ॥
मैला कदे न होवई नह लागै दागा ॥1॥
प्रभु पाइआ सुखदाईआ मिलिआ सुख भाइ ॥
सहजि समाना भीतरे छोडिआ नह जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जरा मरा नह विआपई फिरि दूखु न पाइआ ॥
पी अंम्रितु आघानिआ गुरि अमरु कराइआ ॥2॥
सो जानै जिनि चाखिआ हरि नामु अमोला ॥
कीमति कही न जाईऐ किआ कहि मुखि बोला ॥3॥
सफल दरसु तेरा पारब्रहम गुण निधि तेरी बाणी ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के सौभाग्य जाग जाएं। उसके ही मन को प्रभू-प्यार का गाढ़ा लाल रंग चढ़ता है। ये रंग ऐसा है कि इसको (विकारों की) मैल नहीं लगती। इसको विकारों का दाग़ नहीं लगता। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य ने (सारे) सुखों को देने वाला परमात्मा पा लिया। जिस मनुष्य को आत्मिक आनंद और प्रेम में टिक के प्रभू मिल गया। वह (हमेशा) अंदर से आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। (उसको इतना रस आता है कि फिर वह उसको) छोड़ नहीं सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! उसकी इस आत्मिक उच्चता को कभी बुढ़ापा नहीं आता। कभी मौत नहीं आती। उसे फिर कभी कोई दुख छू नहीं सकता। जिस मनुष्य को गुरू ने अटल आत्मिक जीवन दे दिया। वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी के (माया की भूख से) तृप्त हो जाता है।2। हे भाई ! परमात्मा का नाम किसी भी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिल सकता। इसकी कद्र वही मनुष्य जानता है जिसने कभी चख के देखा है। हे भाई ! हरी-नाम का मूल्य बताया नहीं जा सकता। मैं क्या कह के मुँह से (इसका मोल) बताऊँ। 3। हे परमात्मा ! आपके दर्शन मानस जन्म के मनोरथ पूरा करने वाले हैं। आपकी सिफत-सालाह की बाणी गुणों का खजाना है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारे जगत में हर जगह उसकी शोभा होती है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।