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अंग ८०१ · बिलावल

अंग
801
बिलावल
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  1. हरि भरिपुरे रहिआ ॥
  2. नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥
  3. सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥
  4. सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥

हरि भरिपुरे रहिआ ॥

अंग ८०० से चला आ रहा अंश

हरि भरिपुरे रहिआ ॥
जलि थले राम नामु ॥
नित गाईऐ हरि दूख बिसारनो ॥1॥ रहाउ ॥
हरि कीआ है सफल जनमु हमारा ॥
हरि जपिआ हरि दूख बिसारनहारा ॥
गुरु भेटिआ है मुकति दाता ॥
हरि कीई हमारी सफल जाता ॥
मिलि संगती गुन गावनो ॥1॥
मन राम नाम करि आसा ॥
भाउ दूजा बिनसि बिनासा ॥
विचि आसा होइ निरासी ॥
सो जनु मिलिआ हरि पासी ॥
कोई राम नाम गुन गावनो ॥
जनु नानकु तिसु पगि लावनो ॥2॥1॥7॥4॥6॥7॥17॥

हिन्दी अर्थ: जो (सारे जगत में) हर जगह मौजूद है। हे भाई ! जो पानी में है। जो धरती में है। उस हरी की सिफत-सालाह के गीत सदा गाने चाहिए। जो (जीवों के) सारे दुख दूर करने वाला है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा ने मेरी जिंदगी कामयाब बना दी है। (क्योंकि गुरू की कृपा से) मैं उस परमात्मा का नाम जपने लग पड़ा हूँ। जो सारे दुखों का नाश करने वाला है। (हे भाई !) विकारों से खलासी दिलाने वाला गुरू मुझे मिल गया। (इसलिए) परमात्मा ने मेरी जीवन-यात्रा कामयाब कर दी है। (अब) मैं साध-संगति में मिल के प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाता हूँ। 1। हे (मेरे) मन ! परमात्मा के नाम के ऊपर ही डोरी रख। परमात्मा का नाम माया के मोह को पूर्ण तौर पर (अंदर से) खत्म कर देता है। (हे भाई !) जो मनुष्य दुनिया के काम-काज में रहता हुआ माया के मोह से निर्लिप रहता है। वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में मिला रहता है। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है। दास नानक उसके पैर लगता है। 2। 1। 7। 4। 6। 7। 17।

नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥

रागु बिलावलु महला 5 चउपदे घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥
किउ मिलीऐ प्रभ अबिनासी तोहि ॥
करि किरपा मोहि मारगि पावहु ॥
साधसंगति कै अंचलि लावहु ॥1॥
किउ तरीऐ बिखिआ संसारु ॥
सतिगुरु बोहिथु पावै पारि ॥1॥ रहाउ ॥
पवन झुलारे माइआ देइ ॥
हरि के भगत सदा थिरु सेइ ॥
हरख सोग ते रहहि निरारा ॥
सिर ऊपरि आपि गुरू रखवारा ॥2॥
पाइआ वेड़ु माइआ सरब भुइअंगा ॥
हउमै पचे दीपक देखि पतंगा ॥
सगल सीगार करे नही पावै ॥
जा होइ क्रिपालु ता गुरू मिलावै ॥3॥
हउ फिरउ उदासी मै इकु रतनु दसाइआ ॥
निरमोलकु हीरा मिलै न उपाइआ ॥
हरि का मंदरु तिसु महि लालु ॥
गुरि खोलिआ पड़दा देखि भई निहालु ॥4॥
जिनि चाखिआ तिसु आइआ सादु ॥
जिउ गूंगा मन महि बिसमादु ॥
आनद रूपु सभु नदरी आइआ ॥
जन नानक हरि गुण आखि समाइआ ॥5॥1॥

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 चउपदे घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे सदा-स्थिर रहने वाले ! जो कुछ आँखों से दिख रहा है। मेरा उससे सदा मोह बना रहता है (पर आप इन आँखों से दिखता नहीं) आपको मैं किस तरह मिलूँ। (हे प्रभू !) कृपा करके मुझे (जीवन के सही) रास्ते पर चला। मुझे साध-संगति के पल्ले से लगे दे। 1। (हे भाई !) ये संसार माया (के मोह की लहरों से भरपूर) है (इसमें से) कैसे पार लांघा जाए। (उक्तर-) गुरू जहाज़ है (गुरू इस समुंद्र में से) पार लंघाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) हवा (की तरह) माया (जीवों को) हिलोरे देती रहती है। (इन हिलौरों के सामने सिर्फ) वही लोग अडोल रहते हैं जो सदा प्रभू की भक्ति करते हैं। वह मनुष्य खुशी-ग़मी (के हिलौरों) से अलग (निर्लिप) रहते हैं। जिन मनुष्यों के सिर पर गुरू स्वयं रखवाली करने वाला है।2। (हे भाई !) साँप (की तरह) माया ने सारे जीवों के चारों तरफ घेरा डाला हुआ है। जीव अहंकार (की आग) में जले हुए हैं जैसे दीयों को देख के पतंगे जलते हैं। (माया-ग्रसित जीव चाहे बाहर के भेष आदि के) सारे श्रृंगार करता रहे। (फिर भी वह) परमात्मा को मिल नहीं सकता। जब परमात्मा स्वयं (जीव पर) दयावान होता है। तो (उसको) गुरू मिलाता है। 3। (हे भाई !) मैं (भी) नाम-रत्न को तलाशती-तलाशती (बाहर) उदास फिर रही थी। पर वह नाम हीरा अमूल्य है वह (बाहरी भेख आदि) उपायों से नहीं मिलता। (ये शरीर भी) परमात्मा के रहने का घर है। इस (शरीर) में वह लाल बस रहा है। जब गुरू ने (मेरे अंदर से भरम-भुलेखे का) परदा खोल दिया। मैं (उस लाल को अपने अंदर ही) देख के पूरी तरह से खिल उठी। 4। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने (नाम-रस) चखा है। उसको (ही) स्वाद आया है। (पर वह यह स्वाद बता नहीं सकता) जैसे गूँगा (कोई स्वादिष्ट पदार्थ खा के औरों को बता नहीं सकता वैसे अपने) मन में बहुत गद-गद हो जाता है। उसको वह आनंद का श्रोत हर जगह बसता दिखता है- हे दास नानक ! जो मनुष्य प्रभू के गुण गा-गा के (प्रभू में) लीन रहता है। 5। 1।

सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥

बिलावलु महला 5 ॥
सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥
सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥
बिघनु न लागै जपि अलख अभेव ॥1॥
धरति पुनीत भई गुन गाए ॥
दुरतु गइआ हरि नामु धिआए ॥1॥ रहाउ ॥
सभनी थांई रविआ आपि ॥
आदि जुगादि जा का वड परतापु ॥
गुर परसादि न होइ संतापु ॥2॥
गुर के चरन लगे मनि मीठे ॥
निरबिघन होइ सभ थांई वूठे ॥
सभि सुख पाए सतिगुर तूठे ॥3॥
पारब्रहम प्रभ भए रखवाले ॥
जिथै किथै दीसहि नाले ॥
नानक दास खसमि प्रतिपाले ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे भाई !) गुरू उसको सारे सुख दे देता है। जिस सेवक को प्रभू अपनी सेवा-भक्ति में लगाता है। अलख और अभेव परमात्मा का नाम जप के (उस मनुष्य की जिंदगी के रास्ते में विकारों की कोई) रुकावट नहीं पड़ती। 1। (हे भाई ! जो भी मनुष्य) परमात्मा के गुण गाता है। उसका हृदय पवित्र हो जाता है। जो भी मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है (उसके हृदय में से) पाप दूर हो जाता है। 1। रहाउ। (जिस मनुष्य को प्रभू अपनी सेवा-भगती में जोड़ता है। उसको) वह प्रभू ही हर जगह मौजूद दिखता है। जिसका तेज-प्रताप शुरू से जुगों के आरम्भ से बहुत ज्यादा चला । गुरू की कृपा से उस मनुष्य को कोई दुख-कलेश छू नहीं सकता। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू के (सोहणे) चरण (अपने) मन में प्यारे लगते हैं। वह जहाँ भी बसता है हर जगह (विकारों की) रुकावट से बचा रहता है। उस मनुष्य पर गुरू दयावान होता है। और। वह सारे सुख प्राप्त कर लेता है। 3। हे नानक ! पति-प्रभू ने सदा ही अपने दासों की रक्षा की है। प्रभू-पारब्रहम जी सदा अपने सेवकों के रखवाले बनते हैं। सेवकों को प्रभू जी हर जगह अपने अंग-संग दिखते हैं। 4। 2।

सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥

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बिलावलु महला 5 ॥
सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे सुखों के खजाने प्रभू ! हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे ठाकुर प्रभू !

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८०१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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