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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 800 · बिलावल

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अंग
800
बिलावल
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  1. काइआ नगर महि राम रसु ऊतमु किउ पाईऐ उपदेसु जन करहु ॥
  2. खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥
  3. अनद मूलु धिआइओ पुरखोतमु अनदिनु अनद अनंदे ॥
  4. बोलहु भईआ राम नामु पतित पावनो ॥

गुरु राम दास जी · शबद · राग बिलावल

काइआ नगर महि राम रसु ऊतमु किउ पाईऐ उपदेसु जन करहु ॥

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काइआ नगर महि राम रसु ऊतमु किउ पाईऐ उपदेसु जन करहु ॥
सतिगुरु सेवि सफल हरि दरसनु मिलि अंम्रितु हरि रसु पीअहु ॥2॥
हरि हरि नामु अंम्रितु हरि मीठा हरि संतहु चाखि दिखहु ॥
गुरमति हरि रसु मीठा लागा तिन बिसरे सभि बिख रसहु ॥3॥
राम नामु रसु राम रसाइणु हरि सेवहु संत जनहु ॥
चारि पदारथ चारे पाए गुरमति नानक हरि भजहु ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: (शहरों में खाने-पीने के लिए कई किस्मों के स्वादिष्ट पदार्थ मिलते हैं। मनुष्य का) शरीर (भी, जैसे। एक शहर है। इस) शहर में परमात्मा का नाम (सब पदार्थों से) उक्तम स्वादिष्ट पदार्थ है। (पर) हे संतजनो! (मुझे) समझाएँ कि ये कैसे हासिल हो। (संत जन यही बताते हैं कि गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का (आत्मिक जीवन-) फल देने वाले दर्शन करें। गुरू को मिल के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते रहें। 2। हे संतजनो! बेशक चख के देख लें। परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला मीठा जल है। गुरू की शिक्षा पर चल के जिन मनुष्यों को यह नाम-रस स्वादिष्ट लगता है। आत्मिक जीवन को खत्म कर देने वाले और सारे रस उनको भूल जाते हैं। 3। हे संत जनो! परमात्मा का नाम स्वादिष्ट पदार्थ है। रसायन है। सदा इसका सेवन करते रहें (इसका प्रयोग हमेशा करते रहें)। हे नानक! (जगत में कुल) चार पदार्थ (गिने गए हैं। नाम-रसायन की बरकति से यह) चारों ही मिल जाते हैं। (इस वास्ते) गुरू की मति ले के हमेशा हरी-नाम का भजन करते रहें। 4। 4।

गुरु राम दास जी · शबद · राग बिलावल

खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥

बिलावलु महला 4 ॥
खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥
गुरु सतिगुरु पारब्रहमु करि पूजहु नित सेवहु दिनसु सभ रैनी ॥1॥
हरि जन देखहु सतिगुरु नैनी ॥
जो इछहु सोई फलु पावहु हरि बोलहु गुरमति बैनी ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक उपाव चितवीअहि बहुतेरे सा होवै जि बात होवैनी ॥
अपना भला सभु कोई बाछै सो करे जि मेरै चिति न चितैनी ॥2॥
मन की मति तिआगहु हरि जन एहा बात कठैनी ॥
अनदिनु हरि हरि नामु धिआवहु गुर सतिगुर की मति लैनी ॥3॥
मति सुमति तेरै वसि सुआमी हम जंत तू पुरखु जंतैनी ॥
जन नानक के प्रभ करते सुआमी जिउ भावै तिवै बुलैनी ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ कोई खत्री हो। चाहे ब्राहमण हो। कोई शूद्र हो चाहे वैश हो। हरेक (श्रेणी का) मनुष्य प्रभू का नाम-मंत्र जप सकता है (ये सबके लिए) जपने-योग्य है। हे हरी जनो! गुरू को परमात्मा का रूप जान के गुरू की शरण पड़ें। दिन-रात हर वक्त गुरू की शरण पड़े रहें। 1। हे प्रभू के सेवक जनो! गुरू को आँखें खोल के देखें (गुरू पारब्रहम का रूप है)। गुरू की दी हुई मति पर चल कर परमात्मा के सिफत सालाह के वचन बोलें। जो इच्छा करेंगे वही फॅल प्राप्त कर लेंगे। 1। रहाउ। (गुरू परमेश्वर का आसरा-सहारा भुला के अपनी भलाई के) अनेकों और बहुत सारे ढंग सोचे जाते हैं। पर बात वही होती है जो (रजा के अनुसार) जरूर होनी होती है। हरेक जीव अपना भला चाहता है। पर प्रभू वह काम कर देता है जो मेरे आपके चित्त में भी नहीं होता। 2। हे संतजनो! अपने मन की मर्जी (पर चलना) छोड़ दें (गुरू के हुकम में चलें)। पर ये बात है बहुत मुश्किल। (फिर भी) गुरू पातशाह की मति ले के हर वक्त परमात्मा का नाम जपा करें। 3। हे मालिक प्रभू! अच्छी-बुरी मति आपके अपने वश में है (आपकी प्रेरणा के अनुसार ही कोई जीव भले राह पर चलता है और कोई बुरे राह पर)। हम तो आपके बाजे (साज) हैं। आप हमें बजाने वाले सबमें बसने वाले प्रभु हैं। हे दास नानक के मालिक प्रभू करतार! जैसे आपको अच्छा लगता है वैसे ही आप हमसे कहलवाते हैं (हमारे मुँह से बोल निकलवाते हैं)। 4। 5।

गुरु राम दास जी · शबद · राग बिलावल

अनद मूलु धिआइओ पुरखोतमु अनदिनु अनद अनंदे ॥

बिलावलु महला 4 ॥
अनद मूलु धिआइओ पुरखोतमु अनदिनु अनद अनंदे ॥
धरम राइ की काणि चुकाई सभि चूके जम के छंदे ॥1॥
जपि मन हरि हरि नामु गोुबिंदे ॥
वडभागी गुरु सतिगुरु पाइआ गुण गाए परमानंदे ॥1॥ रहाउ ॥
साकत मूड़ माइआ के बधिक विचि माइआ फिरहि फिरंदे ॥
त्रिसना जलत किरत के बाधे जिउ तेली बलद भवंदे ॥2॥
गुरमुखि सेव लगे से उधरे वडभागी सेव करंदे ॥
जिन हरि जपिआ तिन फलु पाइआ सभि तूटे माइआ फंदे ॥3॥
आपे ठाकुरु आपे सेवकु सभु आपे आपि गोविंदे ॥
जन नानक आपे आपि सभु वरतै जिउ राखै तिवै रहंदे ॥4॥6॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे मन! जिस मनुष्य ने आनंद के श्रोत उक्तम पुरख प्रभू का नाम सिमरा। वह हर वक्त आनंद ही आनंद में लीन रहता है। उसको धर्मराज की मुहताजी नहीं रहती। वह मनुष्य यमराज के भी सारे डर खत्म कर देता है। 1। हे (मेरे) मन! हरी गोबिंद का नाम सदा जपा करें। जिस अति भाग्यशाली मनुष्य को गुरू मिल गया। वह सबसे ऊँचे आनंद के मालिक प्रभू के गुण गाता है (सो, हे मन! गुरू की शरण पड़ें)। 1। रहाउ। हे मन! परमात्मा से टूटे हुए मूर्ख मनुष्य माया (के मोह) में बँधे रहते हैं। और माया की खातिर ही सदा भटकते रहते हैं। अपने किए कर्मों के संस्कारों में बँधे हुए वह मनुष्य तृष्णा (की आग) में जलते रहते हैं और (जनम-मरण के चक्कर में) भटकते रहते हैं जैसे तेलियों के बैल कोहलू के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। 2। हे मन! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर प्रभू की सेवा-भक्ति में लग गए। वे (तृष्णा की आग में जलने से) बच गए। (पर, हे मन!) बहुत भाग्यशाली मनुष्य ही सेवा-भक्ति करते हैं। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम जपा। उन्होंने (तृष्णा अग्नि में जलने से बचने का) फल प्राप्त कर लिया। उनकी माया की सारी ही बँदिशें टूट जाती हैं। 3। (पर हे मन!) प्रभू स्वयं ही (जीवों का) मालिक है (सब में व्यापक हो के) खुद ही (अपनी) सेवा-भक्ति करने वाला है। हर जगह गोबिंद-रूप खुद ही खुद मौजूद है। हे दास नानक! हर जगह प्रभू स्वयं ही स्वयं बस रहा है। जैसे वह (जीवों को) रखता है उसी तरह ही जीव जीवन निर्वाह करते हैं (कोई उसका सिमरन करते हैं। कोई माया में भटकते हैं)। 4। 6।

गुरु राम दास जी · शबद · राग बिलावल

बोलहु भईआ राम नामु पतित पावनो ॥

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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु बिलावलु महला 4 पड़ताल घरु 13 ॥
बोलहु भईआ राम नामु पतित पावनो ॥
हरि संत भगत तारनो ॥

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु बिलावलु महला 4 पड़ताल घरु 13 ॥ हे भाई! उस परमात्मा का नाम सिमरा करें। जो विकारियों को पवित्र बनाने वाला है। जो अपने संतों को अपने भक्तों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाला है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 800 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।