काइआ नगर महि राम रसु ऊतमु किउ पाईऐ उपदेसु जन करहु ॥ सतिगुरु सेवि सफल हरि दरसनु मिलि अंम्रितु हरि रसु पीअहु ॥2॥ हरि हरि नामु अंम्रितु हरि मीठा हरि संतहु चाखि दिखहु ॥ गुरमति हरि रसु मीठा लागा तिन बिसरे सभि बिख रसहु ॥3॥ राम नामु रसु राम रसाइणु हरि सेवहु संत जनहु ॥ चारि पदारथ चारे पाए गुरमति नानक हरि भजहु ॥4॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: (शहरों में खाने-पीने के लिए कई किस्मों के स्वादिष्ट पदार्थ मिलते हैं।मनुष्य का) शरीर (भी।जैसे।एक शहर है।इस) शहर में परमात्मा का नाम (सब पदार्थों से) उक्तम स्वादिष्ट पदार्थ है।(पर) हे संतजनो ! (मुझे) समझाओ कि ये कैसे हासिल हो। (संत जन यही बताते हैं कि गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का (आत्मिक जीवन-) फल देने वाले दर्शन करो।गुरू को मिल के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते रहो। 2। हे संतजनो ! बेशक चख के देख लो।परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला मीठा जल है। गुरू की शिक्षा पर चल के जिन मनुष्यों को यह नाम-रस स्वादिष्ट लगता है।आत्मिक जीवन को खत्म कर देने वाले और सारे रस उनको भूल जाते हैं। 3। हे संत जनो ! परमात्मा का नाम स्वादिष्ट पदार्थ है।रसायन है।सदा इसका सेवन करते रहो (इसका प्रयोग हमेशा करते रहो)। हे नानक ! (जगत में कुल) चार पदार्थ (गिने गए हैं।नाम-रसायन की बरकति से यह) चारों ही मिल जाते हैं।(इस वास्ते) गुरू की मति ले के हमेशा हरी-नाम का भजन करते रहो। 4। 4।
बिलावलु महला 4 ॥ खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥ गुरु सतिगुरु पारब्रहमु करि पूजहु नित सेवहु दिनसु सभ रैनी ॥1॥ हरि जन देखहु सतिगुरु नैनी ॥ जो इछहु सोई फलु पावहु हरि बोलहु गुरमति बैनी ॥1॥ रहाउ ॥ अनिक उपाव चितवीअहि बहुतेरे सा होवै जि बात होवैनी ॥ अपना भला सभु कोई बाछै सो करे जि मेरै चिति न चितैनी ॥2॥ मन की मति तिआगहु हरि जन एहा बात कठैनी ॥ अनदिनु हरि हरि नामु धिआवहु गुर सतिगुर की मति लैनी ॥3॥ मति सुमति तेरै वसि सुआमी हम जंत तू पुरखु जंतैनी ॥ जन नानक के प्रभ करते सुआमी जिउ भावै तिवै बुलैनी ॥4॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ कोई खत्री हो।चाहे ब्राहमण हो।कोई शूद्र हो चाहे वैश हो।हरेक (श्रेणी का) मनुष्य प्रभू का नाम-मंत्र जप सकता है (ये सबके लिए) जपने-योग्य है। हे हरी जनो ! गुरू को परमात्मा का रूप जान के गुरू की शरण पड़ो।दिन-रात हर वक्त गुरू की शरण पड़े रहो। 1। हे प्रभू के सेवक जनो ! गुरू को आँखें खोल के देखो (गुरू पारब्रहम का रूप है)। गुरू की दी हुई मति पर चल कर परमात्मा के सिफत सालाह के वचन बोलो।जो इच्छा करेंगे वही फॅल प्राप्त कर लेंगे। 1।रहाउ। (गुरू परमेश्वर का आसरा-सहारा भुला के अपनी भलाई के) अनेकों और बहुत सारे ढंग सोचे जाते हैं।पर बात वही होती है जो (रजा के अनुसार) जरूर होनी होती है। हरेक जीव अपना भला चाहता है।पर प्रभू वह काम कर देता है जो मेरे आपके चित्त में भी नहीं होता। 2। हे संतजनो ! अपने मन की मर्जी (पर चलना) छोड़ दो (गुरू के हुकम में चलो)।पर ये बात है बहुत मुश्किल। (फिर भी) गुरू पातशाह की मति ले के हर वक्त परमात्मा का नाम जपा करो। 3। हे मालिक प्रभू ! अच्छी-बुरी मति आपके अपने वश में है (आपकी प्रेरणा के अनुसार ही कोई जीव भले राह पर चलता है और कोई बुरे राह पर)।हम तो आपके बाजे (साज) हैं।आप हमें बजाने वाला सबमें बसने वाला प्रभू है। हे दास नानक के मालिक प्रभू करतार ! जैसे आपको अच्छा लगता है वैसे ही आप हमें बुलाता है (हमारे मुँह से बोल निकलवाता है)। 4। 5।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 4 ॥ हे मन ! जिस मनुष्य ने आनंद के श्रोत उक्तम पुरख प्रभू का नाम सिमरा।वह हर वक्त आनंद ही आनंद में लीन रहता है। उसको धर्मराज की मुहताजी नहीं रहती।वह मनुष्य यमराज के भी सारे डर खत्म कर देता है। 1। हे (मेरे) मन ! हरी गोबिंद का नाम सदा जपा कर। जिस अति भाग्यशाली मनुष्य को गुरू मिल गया।वह सबसे ऊँचे आनंद के मालिक प्रभू के गुण गाता है (सो।हे मन ! गुरू की शरण पड़)। 1।रहाउ। हे मन ! परमात्मा से टूटे हुए मूर्ख मनुष्य माया (के मोह) में बँधे रहते हैं।और माया की खातिर ही सदा भटकते रहते हैं। अपने किए कर्मों के संस्कारों में बँधे हुए वह मनुष्य तृष्णा (की आग) में जलते रहते हैं और (जनम-मरण के चक्कर में) भटकते रहते हैं जैसे तेलियों के बैल कोहलू के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। 2। हे मन ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर प्रभू की सेवा-भक्ति में लग गए।वे (तृष्णा की आग में जलने से) बच गए।(पर। हे मन !) बहुत भाग्यशाली मनुष्य ही सेवा-भक्ति करते हैं।जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम जपा।उन्होंने (तृष्णा अग्नि में जलने से बचने का) फल प्राप्त कर लिया।उनकी माया की सारी ही बँदिशें टूट जाती हैं। 3। (पर हे मन !) प्रभू स्वयं ही (जीवों का) मालिक है (सब में व्यापक हो के) खुद ही (अपनी) सेवा-भक्ति करने वाला है।हर जगह गोबिंद-रूप खुद ही खुद मौजूद है। हे दास नानक ! हर जगह प्रभू स्वयं ही स्वयं बस रहा है।जैसे वह (जीवों को) रखता है उसी तरह ही जीव जीवन निर्वाह करते हैं (कोई उसका सिमरन करते हैं।कोई माया में भटकते हैं)। 4। 6।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु बिलावलु महला 4 पड़ताल घरु 13 ॥ हे भाई ! उस परमात्मा का नाम सिमरा कर। जो विकारियों को पवित्र बनाने वाला है। जो अपने संतों को अपने भक्तों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघाने वाला है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(शहरों में खाने-पीने के लिए कई किस्मों के स्वादिष्ट पदार्थ मिलते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।