मोहि अनाथ तुमरी सरणाई ॥
करि किरपा हरि चरन धिआई ॥1॥
दइआ करहु बसहु मनि आइ ॥
मोहि निरगुन लीजै लड़ि लाइ ॥ रहाउ ॥
प्रभु चिति आवै ता कैसी भीड़ ॥
हरि सेवक नाही जम पीड़ ॥
सरब दूख हरि सिमरत नसे ॥
जा कै संगि सदा प्रभु बसै ॥2॥
प्रभ का नामु मनि तनि आधारु ॥
बिसरत नामु होवत तनु छारु ॥
प्रभ चिति आए पूरन सभ काज ॥
हरि बिसरत सभ का मुहताज ॥3॥
चरन कमल संगि लागी प्रीति ॥
बिसरि गई सभ दुरमति रीति ॥
मन तन अंतरि हरि हरि मंत ॥
नानक भगतन कै घरि सदा अनंद ॥4॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥
अवर सिआणपा बिरथीआ पिआरे राखन कउ तुम एक ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु पूरा जे मिलै पिआरे सो जनु होत निहाला ॥
गुर की सेवा सो करे पिआरे जिस नो होइ दइआला ॥
सफल मूरति गुरदेउ सुआमी सरब कला भरपूरे ॥
नानक गुरु पारब्रहमु परमेसरु सदा सदा हजूरे ॥1॥
सुणि सुणि जीवा सोइ तिना की जिन॑ अपुना प्रभु जाता ॥
हरि नामु अराधहि नामु वखाणहि हरि नामे ही मनु राता ॥
सेवकु जन की सेवा मागै पूरै करमि कमावा ॥
नानक की बेनंती सुआमी तेरे जन देखणु पावा ॥2॥
वडभागी से काढीअहि पिआरे संतसंगति जिना वासो ॥
अंम्रित नामु अराधीऐ निरमलु मनै होवै परगासो ॥
जनम मरण दुखु काटीऐ पिआरे चूकै जम की काणे ॥
तिना परापति दरसनु नानक जो प्रभ अपणे भाणे ॥3॥
ऊच अपार बेअंत सुआमी कउणु जाणै गुण तेरे ॥
गावते उधरहि सुणते उधरहि बिनसहि पाप घनेरे ॥
पसू परेत मुगध कउ तारे पाहन पारि उतारै ॥
नानक दास तेरी सरणाई सदा सदा बलिहारै ॥4॥1॥4॥
बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥
बिनु रस चाखे बुडि गई सगली सुखी न होवत जीओ ॥
मानु महतु न सकति ही काई साधा दासी थीओ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।