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अंग ८०२ · बिलावल

अंग
802
बिलावल
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  1. अगनत गुण ठाकुर प्रभ तेरे ॥
  2. मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥
  3. बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥

अगनत गुण ठाकुर प्रभ तेरे ॥

अंग ८०१ से चला आ रहा अंश

अगनत गुण ठाकुर प्रभ तेरे ॥
मोहि अनाथ तुमरी सरणाई ॥
करि किरपा हरि चरन धिआई ॥1॥
दइआ करहु बसहु मनि आइ ॥
मोहि निरगुन लीजै लड़ि लाइ ॥ रहाउ ॥
प्रभु चिति आवै ता कैसी भीड़ ॥
हरि सेवक नाही जम पीड़ ॥
सरब दूख हरि सिमरत नसे ॥
जा कै संगि सदा प्रभु बसै ॥2॥
प्रभ का नामु मनि तनि आधारु ॥
बिसरत नामु होवत तनु छारु ॥
प्रभ चिति आए पूरन सभ काज ॥
हरि बिसरत सभ का मुहताज ॥3॥
चरन कमल संगि लागी प्रीति ॥
बिसरि गई सभ दुरमति रीति ॥
मन तन अंतरि हरि हरि मंत ॥
नानक भगतन कै घरि सदा अनंद ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: आपके गुण गिने नहीं जा सकते। मैं अनाथ आपकी शरण आया हूँ। हे हरी ! मेरे पर मेहर कर। मैं आपके चरणों का ध्यान धरता रहूँ। 1। हे प्रभू ! (मुझ पर) मेहर कर। मेरे मन में आ बस। मुझ गुण-हीन को अपने लड़ लगा लो। रहाउ। हे भाई ! जब प्रभू मन में आ बसे। तो कोई भी विपदा छू नहीं सकती। प्रभू की सेवा भक्ति करने वाले मनुष्य को जमों का दुख भी डरा नहीं सकता। उस मनुष्य के सारे दुख दूर हो जाते हैं जिस मनुष्य के अंग-संग सदा परमात्मा बसता है। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही मनुष्य के) मन को शरीर को आसरा (देने वाला) है। परमात्मा का नाम भूलने से शरीर (जैसे) राख (की ढेरी) हो जाता है जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम आ बसता है। उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। परमात्मा का नाम बिसर जाने से मनुष्य जगह-जगह का मुहताज हो जाता है। 3। हे भाई ! परमात्मा के सुंदर चरणों से जिस मनुष्य का प्यार बन जाता है। उसे खोटी मति वाला सारा (जीवन-) तौर-तरीका (रवईया) भूल जाता है। उन मनुष्यों के मन में उनके शरीर में परमात्मा का नाम-मंत्र बसता रहता है (जो दुर्मति को नजदीक नहीं फटकने देता) हे नानक ! प्रभू के भक्तों के हृदय में सदा आनंद बना रहता है। 4। 3।

मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥

रागु बिलावलु महला 5 घरु 2 यानड़ीए कै घरि गावणा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥
अवर सिआणपा बिरथीआ पिआरे राखन कउ तुम एक ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु पूरा जे मिलै पिआरे सो जनु होत निहाला ॥
गुर की सेवा सो करे पिआरे जिस नो होइ दइआला ॥
सफल मूरति गुरदेउ सुआमी सरब कला भरपूरे ॥
नानक गुरु पारब्रहमु परमेसरु सदा सदा हजूरे ॥1॥
सुणि सुणि जीवा सोइ तिना की जिन॑ अपुना प्रभु जाता ॥
हरि नामु अराधहि नामु वखाणहि हरि नामे ही मनु राता ॥
सेवकु जन की सेवा मागै पूरै करमि कमावा ॥
नानक की बेनंती सुआमी तेरे जन देखणु पावा ॥2॥
वडभागी से काढीअहि पिआरे संतसंगति जिना वासो ॥
अंम्रित नामु अराधीऐ निरमलु मनै होवै परगासो ॥
जनम मरण दुखु काटीऐ पिआरे चूकै जम की काणे ॥
तिना परापति दरसनु नानक जो प्रभ अपणे भाणे ॥3॥
ऊच अपार बेअंत सुआमी कउणु जाणै गुण तेरे ॥
गावते उधरहि सुणते उधरहि बिनसहि पाप घनेरे ॥
पसू परेत मुगध कउ तारे पाहन पारि उतारै ॥
नानक दास तेरी सरणाई सदा सदा बलिहारै ॥4॥1॥4॥

हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला 5 घरु 2 यानड़ीए कै घरि गावणा सतिगुर प्रसादि ॥ हे प्यारे प्रभू ! मेरे मन में (एक) आपका ही आसरा है। हे प्यारे प्रभू ! सिर्फ आप ही (हम जीवों की) रक्षा करने योग्य हैं। (आपको भुला के रक्षा के लिए) और और चतुराईयाँ (सोचनी) किसी भी काम की नहीं। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाए। वह सदा खिला रहता है। पर हे भाई ! वही मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है जिस पर (प्रभू खुद) दयावान होता है। हे भाई ! गुरू स्वामी मानस जनम का मनोरथ पूरा करने में समर्थ है (क्योंकि) वह सारी ताकतों का मालिक है। हे नानक ! गुरू परमात्मा का रूप है। (अपने सेवकों के) सदा ही अंग-संग रहता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य अपने परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाले रखते हैं। उनकी शोभा सुन-सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। (वे भाग्यशाली मनुष्य सदा) परमात्मा का नाम सिमरते हैं। परमात्मा का नाम उचारते हैं। परमात्मा के नाम में ही उनका मन रंगा रहता है। हे प्रभू ! (आपका यह) सेवक (आपके उन) सेवकों की सेवा (की दाति आपके पास से) माँगता है। (आपकी) पूर्ण बख्शिश से (ही) मैं (उनकी) सेवा की कार कर सकता हूँ। हे मालिक प्रभू ! (आपके सेवक) नानक की (आपके दर पर) प्रार्थना है। (-मेहर कर) मैं आपके सेवकों के दर्शन कर सकूँ। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों का बैठना-उठना सदा गुरमुखों की संगति में है। वे मनुष्य अति भाग्यशाली कहे जा सकते हैं। (गुरमुखों की संगति में ही रह के) आत्मिक जीवन देने वाला पवित्र नाम सिमरा जा सकता है। और मन में (उच्च आत्मिक जीवन का) प्रकाश (ज्ञान) पैदा होता है। हे भाई ! (गुरमुखों की संगति में ही) सारी उम्र दुख काटा जा सकता है। और यमराज की धौंस भी समाप्त हो जाती है। पर। हे नानक ! (गुरमुखों के) दर्शन उन मनुष्यों को ही नसीब होते हैं जो अपने परमात्मा को प्यारे लगते हैं। 3। हे सबसे ऊँचे। अपार और बेअंत मालिक प्रभू ! कोई भी मनुष्य आपके (सारे) गुण नहीं जान सकता। जो मनुष्य (आपके गुण) गाते हैं। वे विकारों से बच निकलते हैं। जो मनुष्य (आपकी सिफतें) सुनते हैं। उनके अनेकों पाप नाश हो जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा पशु-स्वभाव लोगों को। और महामूर्खों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। बड़े-बड़े कठोर-चित्त मनुष्यों को भी पार लंघा देता है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) आपके दास आपकी शरण पड़े रहते हैं और सदा ही आप पर से बलिहार जाते हैं। 4। 1। 4।

बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥

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बिलावलु महला 5 ॥
बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥
बिनु रस चाखे बुडि गई सगली सुखी न होवत जीओ ॥
मानु महतु न सकति ही काई साधा दासी थीओ ॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे सहेलिए ! विषौ-विकारों का बे-स्वादा पानी (पीना) छोड़ दे। सदा नाम-अमृत पीया कर। यह बहुत स्वादिष्ट है। (नाम अमृत का) स्वाद ना चखने के कारण। सारी सृष्टि (विषौ-विकारों के पानी में) डूब रही है। (फिर भी) जिंद सुखी नहीं होती। कोई (अन्य) आसरा। कोई महानता। कोई ताकत (नाम-अमृत की प्राप्ति का साधन नहीं बन सकते)। हे सहेलिए ! (नाम-जल की प्राप्ति के लिए) गुरमुखों की दासी बनी रह।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ८०२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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