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जपु · सो दरु
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· जपु
सरम खंड की बाणी रूपु ॥
सरम खंड की बाणी रूपु ॥
तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु ॥
ता कीआ गला कथीआ ना जाहि ॥
जे को कहै पिछै पछुताइ ॥
तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि ॥
तिथै घड़ीऐ सुरा सिधा की सुधि ॥36॥
तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु ॥
ता कीआ गला कथीआ ना जाहि ॥
जे को कहै पिछै पछुताइ ॥
तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि ॥
तिथै घड़ीऐ सुरा सिधा की सुधि ॥36॥
हिन्दी अर्थ: श्रम अवस्था की बनावट सुंदरता है (भाव, इस अवस्था में आ के मन दिनों दिन खूबसूरत बनना शुरू हो जाता है)। इस अवस्था में (नई) घाढ़त के कारण मन बहुत सुंदर घढ़ा जाता है। उस अवस्था की बातें ब्यान नहीं की जा सकतीं। यदि कोई मनुष्य बयान करता है, तो बाद में पछताता है (क्योंकि वह बयान करने से अस्मर्थ रहता है)। उस मेहनत वाली अवस्था में मनुष्य की सुरति और मति घढ़ी जाती है, (भाव, श्रुति और मति ऊँची हो जाती है) और मन में जागृति पैदा हो जाती है। श्रम खण्ड में देवताओं और सिद्धों वाली बुद्धि (मनुष्य के भीतर) बन जाती है। 36।
· जपु
करम खंड की बाणी जोरु ॥
करम खंड की बाणी जोरु ॥
तिथै होरु न कोई होरु ॥
तिथै जोध महाबल सूर ॥
तिन महि रामु रहिआ भरपूर ॥
तिथै सीतो सीता महिमा माहि ॥
ता के रूप न कथने जाहि ॥
ना ओहि मरहि न ठागे जाहि ॥
जिन कै रामु वसै मन माहि ॥
तिथै भगत वसहि के लोअ ॥
करहि अनंदु सचा मनि सोइ ॥
सच खंडि वसै निरंकारु ॥
करि करि वेखै नदरि निहाल ॥
तिथै खंड मंडल वरभंड ॥
जे को कथै त अंत न अंत ॥
तिथै लोअ लोअ आकार ॥
जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार ॥
वेखै विगसै करि वीचारु ॥
नानक कथना करड़ा सारु ॥37॥
तिथै होरु न कोई होरु ॥
तिथै जोध महाबल सूर ॥
तिन महि रामु रहिआ भरपूर ॥
तिथै सीतो सीता महिमा माहि ॥
ता के रूप न कथने जाहि ॥
ना ओहि मरहि न ठागे जाहि ॥
जिन कै रामु वसै मन माहि ॥
तिथै भगत वसहि के लोअ ॥
करहि अनंदु सचा मनि सोइ ॥
सच खंडि वसै निरंकारु ॥
करि करि वेखै नदरि निहाल ॥
तिथै खंड मंडल वरभंड ॥
जे को कथै त अंत न अंत ॥
तिथै लोअ लोअ आकार ॥
जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार ॥
वेखै विगसै करि वीचारु ॥
नानक कथना करड़ा सारु ॥37॥
हिन्दी अर्थ: बख्शिश, रहिमत वाली अवस्था की बनावट बल है, (भाव, जब मनुष्य पर अकाल-पुरख की मेहर की नज़र होती है, तो उसके अंदर ऐसा बल पैदा होता है कि विषय-विकार उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते), क्योंकि उस अवस्था में (मनुष्य के अंदर) अकाल-पुरख के बिना और कोई दूसरा बिल्कुल नहीं रहता। उस अवस्था में (जो मनुष्य हैं वह) योद्धे, महांबली व सूरमें हैं, उन के रोम रोम में अकाल-पुरख बस रहा है। उस (बख्शिश) अवस्था में पहुँचे हुए मनुष्य का मन पूरी तरह से अकाल-पुरख की वडिआईमें परोया रहता है, (उनके शरीर ऐसे कंचन सी चमक वाले हो जाते हैं कि) उनके सुंदर रूप का वर्णननहीं किया जा सकता। (उनके मुख पर नूर ही नूर लिशकारे मारता है)। वे आत्मिक मौत नहीं मरतेऔर माया उनको ठग नहीं सकती, (इस अवस्था में) मन में अकाल-पुरख बसता है, उस अवस्था में कई भवनों के भक्तजन बसते हैं, जो सदा प्रसन्न रहते हैं, (क्योंकि) वह सच्चा अकाल पुरख उनके मन में (मौजूद) है। सच खंड में (भाव, अकाल-पुरख के साथ एकरूप होने वाली अवस्था में) मनुष्य के अंदर वह अकाल-पुरख खुद ही बसता है, जो सृष्टि को रच रच के मेहर की नजर से उसकी संभाल करता है। उस अवस्था में (भाव, अकाल-पुरख के साथ एकरूप होने वाली अवस्था में) मनुष्य को बेअंत खण्ड, मण्डल व बेअंत ब्रह्मिण्ड (दिखाई देते हैं, इतने बेअंत कि) यदि कोई मनुष्य उनका कथन करने लगे, तो उसकी कमी नहीं पड़ सकती, कभी ना खत्म होने वाला सिलसिला। उस अवस्था में बेअंत भवन तथा आकार दिखाई देते हैं (जिन सभी में) उसी तरह कार-व्यवहार चल रहा है जिस तरह अकाल-पुरख का हुकम होता है (भाव, इस अवस्था में पहुँच के मनुष्य को हर जगह अकाल-पुरख की रजा वर्तती दिखती है)। (उसको प्रत्यक्ष दिखाई देता है कि) अकाल-पुरख विचार करके (सभ जीवों की) संभाल करता है और खुश होता है। हे नानक! इस अवस्था का कथन करना बहुत मुश्किल है (भाव, ये अवस्था बयान नहीं हो सकती, अनुभव ही की जा सकती है बस!)। 37।
· जपु
जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु ॥
जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु ॥
अहरणि मति वेदु हथीआरु ॥
भउ खला अगनि तप ताउ ॥
भांडा भाउ अंम्रितु तितु ढालि ॥
घड़ीऐ सबदु सची टकसाल ॥
जिन कउ नदरि करमु तिन कार ॥
नानक नदरी नदरि निहाल ॥38॥
अहरणि मति वेदु हथीआरु ॥
भउ खला अगनि तप ताउ ॥
भांडा भाउ अंम्रितु तितु ढालि ॥
घड़ीऐ सबदु सची टकसाल ॥
जिन कउ नदरि करमु तिन कार ॥
नानक नदरी नदरि निहाल ॥38॥
हिन्दी अर्थ: (यदि) जत-रूप दुकान (हो), धैर्य सोनार बने, मनुष्य की अपनी बुद्धि अहिरण हो, (उस मति अहिरण पर) ज्ञान का हथौड़ा (चोट करे)। (यदि) अकाल-पुरख का डर धौकणी (हो), मेहनत आग (हो), प्रेम कुठाली हो, तो (हे भाई!) उस (कुठाली) में अकाल-पुरख का अमृत साथ गलाएँ, (क्योंकि ऐसी ही) सच्ची टकसाल में (गुरू का) शबद घढ़ा जा सकता है। ये कार्य-व्यवहार उन्हीं मनुष्यों का ही है, जिन पे मेहर की नजर होती है। हे नानक! वे मनुष्य अकाल-पुरख की कृपा-दृष्टि से निहाल हो जाते हैं।38
· जपु
पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥
सलोकु ॥
पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥
दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु ॥
चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि ॥
करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि ॥
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि ॥
नानक ते मुख उजले केती छुटी नालि ॥1॥
पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥
दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु ॥
चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि ॥
करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि ॥
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि ॥
नानक ते मुख उजले केती छुटी नालि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक प्राण (शरीर में इस प्रकार हैं जैसे) गुरू (जीवों की आत्मा के लिए) है। पानी (सभी जीवों का) पिता है और धरती (सबकी) बड़ी माँ है। दिन और रात दोनों खेल खिलाने वाला और खिलाने वाली हैं, सारा संसार खेल रहा है (भाव, संसार के सारे जीव रात को सोने में और दिन के कार्य-व्यवहार में परखे जा रहे हैं) धर्मराज अकाल पुरख की हज़ूरी में (जीवों के किये हुए) सही कामों को विचारता है। अपने अपने (इन किए हुये) कर्मों के अनुसार कई जीव अकाल-पुरख के नज़दीक हो जाते हैं और कई अकाल-पुरख से दूर रह जाते हैं। हे नानक! जिन मनुष्यों ने अकाल-पुरख का नाम सिमरा है, वे अपनी मेहनत सफल कर गये हैं। (अकाल-पुरख के दर पर) वे उज्जवल मुख वाले हैं और (और भी) कई जीव, उनकी संगत में (रह के) (‘कूड़ की पालि’ गिरा के माया के बंधनों से) आज़ाद हो गए हैं। 1।
· शबद
सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले ॥
सो दरु रागु आसा महला 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले ॥
वाजे तेरे नाद अनेक असंखा केते तेरे वावणहारे ॥
केते तेरे राग परी सिउ कहीअहि केते तेरे गावणहारे ॥
गावनि तुधनो पवणु पाणी बैसंतरु गावै राजा धरमु दुआरे ॥
गावनि तुधनो चितु गुपतु लिखि जाणनि लिखि लिखि धरमु बीचारे ॥
गावनि तुधनो ईसरु ब्रहमा देवी सोहनि तेरे सदा सवारे ॥
गावनि तुधनो इंद्र इंद्रासणि बैठे देवतिआ दरि नाले ॥
गावनि तुधनो सिध समाधी अंदरि गावनि तुधनो साध बीचारे ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले ॥
वाजे तेरे नाद अनेक असंखा केते तेरे वावणहारे ॥
केते तेरे राग परी सिउ कहीअहि केते तेरे गावणहारे ॥
गावनि तुधनो पवणु पाणी बैसंतरु गावै राजा धरमु दुआरे ॥
गावनि तुधनो चितु गुपतु लिखि जाणनि लिखि लिखि धरमु बीचारे ॥
गावनि तुधनो ईसरु ब्रहमा देवी सोहनि तेरे सदा सवारे ॥
गावनि तुधनो इंद्र इंद्रासणि बैठे देवतिआ दरि नाले ॥
गावनि तुधनो सिध समाधी अंदरि गावनि तुधनो साध बीचारे ॥
हिन्दी अर्थ: सो दरु रागु आसा महला 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे प्रभू!) आपका वह घर और (उस घर का) वह दरवाजा बड़ा ही आश्चर्य भरा है जहाँ बैठ के आप सारे जीवों की संभाल कर रहे हैं। (आपकी इस रची हुई कुदरत में) अनेकों और अनगिनत वाजे (संगीत-यंत्र) और राग हैं; बेअंत ही जीव (इन बाजों को) बजाने वाले हैं। रागनियों समेत बेअंत ही रागों के नाम लिए जाते हैं। अनेकों ही जीव (इन राग रागनियों के द्वारा आपको) गाने वाले हैं (आपकी सिफत के गीत गा रहे हैं)। (हे निरंकार!) पवन, पानी, अग्नि (आदि तत्व) आपका गुण गान कर रहे हैं (आपकी मर्जी में चल रहे हैं)। धर्मराज आपके दर पे (खड़ा होकर) आपकी उस्तति कर रहा है। वह चित्रगुप्त भी जो (जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों के लेखे) लिखने जानते हैं और जिनके लिखे हुए को धर्मराज विचारता है, आपकी महानताओं का गुणगान कर रहे हैं। (हे अकाल पुरख!) अनेकों देवियां, शिव व ब्रह्मा, जो आपके संवारे हुए हैं सदा (आपके दर पे) शोभायमान होकर आपको गा रहे हैं (आपके गुण गा रहे हैं)। कई इंद्र देवते अपने तख्त पे बिराजमान देवताओं समेत आपको गा रहे हैं (आपकी सिफत सलाह के गीत गा रहे हैं)। (हे प्रभू!) सिद्ध लोग समाधियां लगा के आपको गा रहे हैं। साधु जन (आपके गुणों का) चिंतन कर कर के आपको सालाह रहे हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 8 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।