अंग 9, सो दरु निरंतर (deepened)

SGGS, Ang
9
सो दरु (निरंतर)
राग: राग आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी · महला 1
पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट
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॥ आसा महला १ ॥ आखणि जोरु चुपै नह जोरु ॥ जोरु न मगणि देणि न जोरु ॥ जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु ॥ जोरु न राजि मालि मनि सोरु ॥ जोरु न सुरती गिआनि वीचारि ॥ जोरु न जुगती छुटै संसारु ॥ जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ ॥ नानक उतमु नीचु न कोइ ॥१॥

अगर पहला शबद scale था, यह शबद powerlessness है। नानक एक list बना रहे हैं, हम किस-किस चीज़ पर बस नहीं रखते।

“आखणि जोरु, चुपै नह जोरु।” बोलने पर ज़ोर नहीं, चुप होने पर भी नहीं। यानी कब बोलूँ, कब चुप रहूँ, यह भी मेरे control में नहीं।

अगर आप अपनी ज़िंदगी का कोई एक argument याद करो, जहाँ आप ने कुछ कह दिया जो नहीं कहना चाहिए था। उस moment पर “चुप होने” का “ज़ोर” आप के पास था? या किसी ने आपकी बात काट दी, और आप जो कहना चाहते थे, मन में रह गया। उस moment पर “बोलने” का ज़ोर भी आपके पास नहीं था।

“जोरु न मगणि, देणि न जोरु।” माँगने पर ज़ोर नहीं, देने पर भी नहीं। यह subtler है। कब मन की चीज़ माँगें, और कब वो माँग चुपचाप छोड़ दें, यह भी हम नहीं तय करते। और देने पर भी? कब मन उदार होगा, कब कंजूस, यह भी कहाँ हमारे हाथ?

“जोरु न जीवणि, मरणि नह जोरु।” जीवन पर ज़ोर नहीं, मरने पर भी नहीं। यह सबसे bedrock truth है। हम अपनी birth नहीं चुनते, अपनी मौत नहीं चुनते। बीच के साठ-सत्तर साल हम मानते हैं कि “हम चला रहे हैं”, मगर actually we are riding a wave।

“जोरु न राजि मालि, मनि सोरु।” राज पर ज़ोर नहीं, माल पर नहीं, मन की हलचल पर भी नहीं। और यह सबसे clever line है। पैसा, status, यह भी हमारी मर्ज़ी से नहीं आता-जाता। और सबसे close, “मन का सोरु,” भी हमारे हाथ में नहीं। मन कब उदास होगा, कब प्रसन्न, हम decide कर सकते हैं?

“जोरु न सुरती गिआनि वीचारि।” सुरती (concentration) पर नहीं, ज्ञान पर नहीं, विचार पर नहीं। यानी spiritual progress पर भी हमारा “ज़ोर” नहीं। यह बड़ी bold बात है। हम चाहें कि मन एकाग्र हो, और मन भटक जाए। हम चाहें कि ज्ञान हो, और हम blind रह जाएँ।

“जोरु न जुगती छुटै संसारु।” “जुगति” यानी method, या “yukti” (skill)। संसार से छूटने की skill पर भी हमारा ज़ोर नहीं। यह सबसे humbling realization है। मोक्ष भी हमारे “करने” से नहीं होता।

फिर एक मोड़: “जिसु हथि जोरु, करि वेखै सोइ।” जिसके हाथ में “ज़ोर” है, वो करता है और देखता है। यह “जोर” वाला कौन? वही हरि।

और final twist: “नानक उतमु नीचु न कोइ।” इसलिए, उत्तम और नीच कोई नहीं। यह pure non-judgmental line है। अगर सब कुछ उसके हाथ में है, तो “उच्च” आदमी ने अपनी मर्ज़ी से उच्च हालत नहीं चुनी, “नीच” ने नीच हालत नहीं चुनी। दोनों उसकी मर्ज़ी हैं।

दिल्ली के social class system में यह radical बात है। “जिनके पास power है, उनको humble होना चाहिए। जिनके पास कम है, उनको ख़ुद को कमतर नहीं मानना चाहिए।” क्योंकि बात “उत्तम-नीच” की है ही नहीं। बात उसके “ज़ोर” की है।

देखें: जपजी साहिब, पौड़ी 33 (same shabad in morning recitation) · गीता 18.61, “ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति”
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॥ आसा महला १ ॥ आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥ आखणि अउखा साचा नाउ ॥ साचे नाम की लागै भूख ॥ उतु भूखै खाइ चलीअहि दूख ॥१॥ सो किउ विसरै मेरी माइ ॥ साचा साहिबु साचै नाइ ॥१॥ रहाउ ॥ साचे नाम की तिलु वडिआई ॥ आखि थके कीमति नही पाई ॥ जे सभि मिलि कै आखण पाहि ॥ वडा न होवै घाटि न जाइ ॥२॥ ना ओहु मरै न होवै सोगु ॥ देदा रहै न चूकै भोगु ॥ गुणु एहो होरु नाही कोइ ॥ ना को होआ ना को होइ ॥३॥

यह शबद बहुत intimate है। एक भक्त अपनी माँ से बात कर रहा है। “मेरी माइ।” यह family-relationship के अंदर theology कर रहा है।

“आखा जीवा, विसरै मरि जाउ।” जब उसका नाम कहता हूँ, जीता हूँ। जब भूल जाता हूँ, मर जाता हूँ। यह life-death का definition है।

गुरु नानक यहाँ “जीना” को redefine कर रहे हैं। पुरानी biology कहती है, “साँस लेना ही जीना है।” नानक कह रहे हैं, “नहीं। नाम बोलना जीना है। बाक़ी सब biological function है।”

दिल्ली में आप किसी एक से पूछो, “तू कब last सच में alive feel हुआ?” अगर वो honest है, तो वो बताएगा एक moment जब वो किसी experience में पूरी तरह present था, बिना मन के बक-बक के। नानक कह रहे हैं, उस presence का name “नाम” है।

“आखणि अउखा साचा नाउ।” सच्चा नाम कहना “औखा” (मुश्किल) है। यह बहुत honest admission है। यह कोई easy task नहीं। मन भटकता है, distraction आती है, थकान होती है।

मगर “साचे नाम की लागै भूख।” अगर एक बार सच्चे नाम की भूख लग गई, “उतु भूखै खाइ चलीअहि दूख।” तो वही भूख खा कर दुख चले जाते हैं।

यह बहुत precise spiritual psychology है। हम सब किसी न किसी की भूख रखते हैं, food, success, validation, security। नानक कह रहे हैं, अगर एक नई भूख जग जाए, “नाम” की, तब वो बाक़ी सारी भूखों को replace कर देती है। यह hunger का substitution है, suppression नहीं।

फिर “रहाउ” (chorus): “सो किउ विसरै मेरी माइ।” तो वो कैसे भूले जाए, मेरी माँ? “साचा साहिबु, साचै नाइ।” वो सच्चा साहिब है, उसके नाम भी सच्चे हैं।

इस पंक्ति में बहुत intimacy है। एक बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा है, “इतनी अच्छी चीज़ कोई कैसे भूल सकता है?” यह existential confusion है, क्यों हम सब उसको भूल जाते हैं, जबकि वो ही सच है?

दूसरे verse में नानक scale वापस लाते हैं। “तिलु वडिआई।” यानी तिल भर महिमा। “आखि थके कीमति नही पाई।” कहते-कहते थक गए, मगर कीमत नहीं पाई। “जे सभि मिलि कै आखण पाहि।” अगर सब लोग मिल कर बोलने लगें। “वडा न होवै, घाटि न जाइ।” तो भी वो बड़ा नहीं होगा, घटेगा भी नहीं।

यह scale-invariance का concept है। हरि unchanging है। हमारी प्रशंसा से वो बड़ा नहीं होता, हमारी निंदा से छोटा नहीं होता। यह बहुत stabilizing realization है। हम कुछ कहें या न कहें, उसका impact ख़ुद पर है, उस पर नहीं।

तीसरे verse में: “ना ओहु मरै, न होवै सोगु।” वो मरता नहीं, इसलिए शोक भी नहीं होता। “देदा रहै, न चूकै भोगु।” देता रहता है, उसका “भोग” (देने का supply) ख़त्म नहीं होता।

“गुणु एहो होरु नाही कोइ।” यह उसका गुण है, और कोई नहीं। “ना को होआ, ना को होइ।” न कोई हुआ है, न होगा।

अंतिम पंक्ति बहुत stark है। नानक कह रहे हैं, “उसकी तरह कोई और हुआ नहीं, होगा नहीं।” यह monotheism का सबसे direct statement है, मगर बिना आक्रामकता के। “मेरा वाला बड़ा” नहीं कह रहे, “वही एक है” कह रहे हैं।

देखें: ईशावास्य उपनिषद्, “ईशावास्यमिदं सर्वं” (वो सब में बसता है) · अंग 8, सो दरु (पहले की पंक्तियाँ, scale वाली)
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आसा महला १ ॥ आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥ पुरखाँ बिरखाँ तीरथाँ ततं ॥ मेघाँ खेताँ दीपाँ लोआँ ॥ मंडलाँ खंडाँ वरभंडाँ ॥ अंडज जेरज उतभुजाँ खाणी सेतजाँ ॥ सो मिति जाणै नानका सराँ मेराँ जंताँ ॥१॥

और एक तीसरा M1 शबद इसी अंग पर। नानक scale को और expand कर रहे हैं।

“पुरखाँ बिरखाँ तीरथाँ ततं।” “पुरुष, पेड़, तीर्थ, तत्त्व।”

“मेघाँ खेताँ दीपाँ लोआँ।” “बादल, खेत, द्वीप, लोक।”

“मंडलाँ खंडाँ वरभंडाँ।” “मंडल, खंड, ब्रह्मांड।”

“अंडज जेरज उतभुजाँ खाणी सेतजाँ।” “अंडज (अंडों से), जेरज (जरायुज, गर्भ से), उत्भुज (पौधे, mineral-emergent), खाणी (categories), सेतज (sweat-born)।”

यह scale की हर dimension list कर रहा है। small (पुरुष-पेड़) से big (लोक-ब्रह्मांड) तक। और जीवन की हर श्रेणी, biological taxonomy।

“सो मिति जाणै नानका।” “उसकी मिति (माप) जानता है, नानक।” “सराँ मेराँ जंताँ।” “सरों, मेरों, जंतों (सब के माप)।”

closing: सब का माप वो ही जानता है। हमारी समझ limit-bound है।

दिल्ली में हम सब अपनी “size” आँकने में busy हैं, salary, follower count, network size, achievement list। नानक एक different scale propose करते हैं, “सरों, मेरों, जंतों” (पहाड़, समुद्र, और हर जीव)। यह humbling है।

पूरा यह शबद रात के contemplation की energy को carry करता है। आदमी आसमान देख रहा है, और पूरी सृष्टि को mentally scan कर रहा है। यह passive activity नहीं, यह deep awareness है।