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अंग 7

अंग
7
राग Jap
राग: Jap · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जपजी साहिब का हिस्सा। पूरी 38 पउड़ियों की commentary /japji/ पर है।
आदेसु तिसै आदेसु ॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥29॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (सो, झूठ की दीवार दूर करने के लिए) केवल उस को (अकाल-पुरख) प्रणाम करो, जो (सब का) आरम्भ है, जो शुद्ध-स्वरूप है, जिसका कोई अंत नहीं (ढूँढ सकता), जो नाश रहित है और जो सदैव इकसार रहता है।29।
एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु ॥
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीबाणु ॥
जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु ॥
ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥30॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (लोगों में ये ख़्याल आम प्रचलित है कि) अकेली माया (किसी) जुगति (युक्ति) से गर्भवती हुई और प्रत्यक्ष तौर पे उसके तीन पुत्र पैदा हो गए। उनमें से एक (ब्रह्मा) घरबारी बन गया (भाव, जीव-जन्तुओं को पैदा करने लग पड़ा), एक (विष्णु) भण्डारे का मालिक बन गया (भाव, जीवों को रिजक पहुँचाने का काम करने लगा), और एक (शिव) कचहरी लगाता है (भाव, जीवों को संहारता है)। (पर असल में बात ये है कि) जिस तरह उस अकाल-पुरख को ठीक लगता है और जैसे उसका हुकम होता है, वैसे ही वह संसार की (कार) कार्रवाही चला रहा है, (इन ब्रह्मा, विष्णु और शिव के हाथ में कुछ नहीं)। ये बड़ा आश्चर्य जनक चमत्कार है कि वह अकाल-पुरख (सभी जीवों को) देख रहा है, पर जीवों को अकाल-पुरख नहीं दिखाई देता। (सो, ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि की जगह) केवल उस को (अकाल-पुरख) प्रणाम करो, जो (सब का) आरम्भ है, जो शुद्ध-स्वरूप है, जिसका कोई अंत नहीं (ढूँढ सकता), जो नाश रहित है और जो सदैव एक जैसा ही रहता है (यही है तरीका उस प्रभू से दूरी दूर करने का)।30।
आसणु लोइ लोइ भंडार ॥
जो किछु पाइआ सु एका वार ॥
करि करि वेखै सिरजणहारु ॥
नानक सचे की साची कार ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥31॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: अकाल-पुरख के भण्डारों का ठिकाना हरेक भवन में है (भाव, हरेक भवन में अकाल-पुरख के भण्डारे चल रहे हैं)। जो कुछ (अकाल-पुरख ने उन भण्डारों में) डाला है, एक बार में ही डाल दिया है (भाव, उसके भण्डारे सदा अतुट हैं)। सृष्टि को पैदा करने वाला अकाल-पुरख (जीवों को) पैदा करके (उनकी) सम्भाल कर रहा है। हे नानक! सदा स्थिर रहने वाले (अकाल-पुरख) की (सृष्टि की संभाल वाली) यह कार सदा अटॅल है। (सो) केवल उस को (अकाल-पुरख) प्रणाम करो, जो (सब का) आरम्भ है, जो शुद्ध-स्वरूप है, जिसका कोई अंत नहीं (ढूँढ सकता), जो नाश रहित है और जो सदैव एक जैसा ही रहता है (यही है तरीका उस प्रभू से दूरी मिट सकती है)।31।
इक दू जीभौ लख होहि लख होवहि लख वीस ॥
लखु लखु गेड़ा आखीअहि एकु नामु जगदीस ॥
एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीऐ होइ इकीस ॥
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस ॥
नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस ॥32॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: यदि एक जीभ (जिहवा) से लाखों जीभें हो जाएं, और लाखों जीभों से बीस लाख बन जाएं, (इन बीस लाख जीभों से) अकाल-पुरख के एक नाम को एक-एक लाख बार कहें (तो भी झूठे मनुष्य की झूठी ही ठीस है, अर्थात, जो ये सोचे कि मैं अपनी मेहनत के बल पर इस तरह नाम सिमर के अकाल-पुरख को पा सकता हूँ, तो ये एक झूठा अहंकार है)। इस रास्ते में (परमात्मा से दूरी दूर करने वाले राह में) अकाल-पुरख को मिलने के लिए जो सीढ़ीयां हैं, उन के ऊपर स्वैभाव गवा के ही चढ़ सकते हैं। (लाखों जीभों के साथ भी गिनती के सिमरन से कुछ नहीं बनता। अहम् भाव दूर करने के बिना इन गिनती के पाठों का उद्यम यूँ है, मानों) आकाश की बातें सुन के कीड़ियों को भी ये रीस आ गयी है (कि हम भी आकाश पर पहुँच जाएं)। हे नानक! यदि अकाल-पुरख मेहर की नज़र करे, तभी उससे मिला जा सकता है, (वर्ना) झूठे मनुष्य की खुद की निरी झूठी ही वडियाई है (कि मैं सिमरन कर रहा हूँ)।32।
आखणि जोरु चुपै नह जोरु ॥
जोरु न मंगणि देणि न जोरु ॥
जोरु न जीवणि मरणि नह जोरु ॥
जोरु न राजि मालि मनि सोरु ॥
जोरु न सुरती गिआनि वीचारि ॥
जोरु न जुगती छुटै संसारु ॥
जिसु हथि जोरु करि वेखै सोइ ॥
नानक उतमु नीचु न कोइ ॥33॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: बोलने में और चुप रहने में भी हमारा कोई अपना इख्तियार नहीं। ना ही मांगने में हमारी मन-मर्जी चलती है और ना ही देने में। जीने में और मरने में भी हमारी कोई ताकत (काम नहीं देती)। इस राज व वैभव की प्राप्ति में भी हमारा कोई जोर नहीं चलता (जिस राज माल की वजह से हमारे) मन में इतनी फूँ-फां होती है। आत्मिक जागृति अवस्था में, ज्ञान में और विचार में रहने की भी हमारी स्मर्था नहीं। उस जुगती में रहने के लिए भी हमारा इख्तियार नहीं है कि जिससे जनम मरण खत्म हो सके। वही अकाल-पुरख रचना रच के (उसकी हर प्रकार से) सम्भाल करता है, जिसके हाथ में स्मर्था है। हे नानक! अपने आप में ना कोई मनुष्य उत्तम है और ना ही नीच (भाव, जीवों को सदाचारी या दुराचारी बनाने वाला भी वह प्रभू स्वयं ही है) (अगर सिमरन की बरकत से ये निश्चय बन जाए तो ही प्रमात्मा से जीव का फासला दूर होता है।33।
राती रुती थिती वार ॥
पवण पाणी अगनी पाताल ॥
तिसु विचि धरती थापि रखी धरम साल ॥
तिसु विचि जीअ जुगति के रंग ॥
तिन के नाम अनेक अनंत ॥
करमी करमी होइ वीचारु ॥
सचा आपि सचा दरबारु ॥
तिथै सोहनि पंच परवाणु ॥
नदरी करमि पवै नीसाणु ॥
कच पकाई ओथै पाइ ॥
नानक गइआ जापै जाइ ॥34॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रातें, ऋतुएं, तिथिआं और वार, हवा, पानी, अग्नि व पाताल- इन सभी की एकत्रता में (अकाल-पुरख ने) धरती को धर्म कमाने का स्थान बना के टिका दिया है। इस धरती पर कई जुगतियों और रंगों के जीव (बसते हैं), जिनके अनेकों और अनगिनत नाम हैं। (इन अनेकों नामों और रंगों वाले जीवों के) अपने अपने किये कर्मों के अनुसार (अकाल-पुरख के दर पे) निर्णय होता है (जिसमें कोई कोताही नहीं होती क्योंकि न्याय करने वाला) अकालपुख खुद सच्चा है, उसका दरबार भी सच्चा है। उस दरबार में संत जन प्रत्यक्ष तौर पे शोभायमान होते हैं और मेहर की नजर करने वाले अकाल-पुरख की बख्शिश से (उन संत जनों के माथे पे) वडियाई का निशान चमक पड़ता है। (यहाँ संसार में किसी का बड़ा छोटा कहलाना कोई मायने नहीं रखता, इनके) कच्चे-पक्के की परख तो अकाल-पुरख के दर पे होती है। हे नानक! अकाल-पुरख के दर पर पहुँच के ही ये समझ आती है (कि असल में कौन पक्का है कौन कच्चा)।
धरम खंड का एहो धरमु ॥
गिआन खंड का आखहु करमु ॥
केते पवण पाणी वैसंतर केते कान महेस ॥
केते बरमे घाड़ति घड़ीअहि रूप रंग के वेस ॥
केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस ॥
केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस ॥
केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस ॥
केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद ॥
केतीआ खाणी केतीआ बाणी केते पात नरिंद ॥
केतीआ सुरती सेवक केते नानक अंतु न अंतु ॥35॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: धर्म खण्ड का मात्र यही कर्तव्य है, (जो ऊपर बताया गया है)। अब ज्ञान खण्ड के कर्तव्यों को भी समझ लो (जो अगली तुकों में है)। (अकाल-पुरख की रचना में) कई प्रकार की पवन, पानी और अग्निायां हैं, कई कृष्ण हैं और कई शिव हैं। कई ब्रह्मा पैदा किए जा रहे हैं, जिन के कई रूप, कई रंग और कई वेश हैं। (अकाल-पुरख की कुदरत में) बेअंत धरतियां हैं, बेअंत मेरु पर्बत, बेअंत ध्रुअ भगत व उनके उपदेश हैं। बेअंत इंद्र देवते, चंद्रमा, बेअंत सूरज और बेअंत भवन-चक्र हैं। बेअंत सिद्ध हैं, बेअंत बुद्ध अवतार हैं, बेअंत नाथ हैं और बेअंत देवियों के पहिरावे हैं। (अकाल-पुरख की रचना में) बेअंत देवते व दैंत हैं, बेअंत मुनि हैं, बेअंत प्रकार के रतन तथा (रत्नों के) समुंद्र हैं। (जीव रचना की) बेअंत खाणीयां हैं। (जीवों की बोली भी चार नहीं) बेअंत बाणियां हैं। बेअंत बादशाह और राजे हैं, बेअंत प्रकार के ध्यान हैं (जो जीव मन द्वारा लगाते हैं), बेअंत सेवक हैं। हे नानक! कोई अंत नहीं पा सकता।35।
गिआन खंड महि गिआनु परचंडु ॥
तिथै नाद बिनोद कोड अनंदु ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: ज्ञानखण्ड में (भाव मनुष्य की ज्ञान अवस्था में) ज्ञान ही बलवान होता है। इस अवस्था में (मानों) सभी रागों, तमाशों व चमत्कारों का आनन्द आ जाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ये नित्य की प्रार्थनाएँ हैं, अधिकांश पन्द्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी की शुरुआत में रची गयीं।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(सो, झूठ की दीवार दूर करने के लिए) केवल उस को (अकाल-पुरख) प्रणाम करो, जो (सब का) आरम्भ है, जो शुद्ध-स्वरूप है, जिसका कोई अंत नहीं (ढूँढ सकता), जो नाश रहित है और जो सदैव इकसार रहता ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।