जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी संम॑ालिओइ ॥
नानकु कहै सिआणीए इउ कंत मिलावा होइ ॥2॥
हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥
तू अगम दइआलु अगंमु है आपि लैहि मिलाई ॥
मै तुझ बिनु बेली को नही तू अंति सखाई ॥
जो तेरी सरणागती तिन लैहि छडाई ॥
नानक वेपरवाहु है तिसु तिलु न तमाई ॥20॥1॥
कबीर के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥
राम को नामु न कबहू लीना ॥1॥
राम न जपहु कवन मति लागे ॥
मरि जइबे कउ किआ करहु अभागे ॥1॥ रहाउ ॥
दुख सुख करि कै कुटंबु जीवाइआ ॥
मरती बार इकसर दुखु पाइआ ॥2॥
कंठ गहन तब करन पुकारा ॥
कहि कबीर आगे ते न संम॑ारा ॥3॥1॥
थरहर कंपै बाला जीउ ॥
ना जानउ किआ करसी पीउ ॥1॥
रैनि गई मत दिनु भी जाइ ॥
भवर गए बग बैठे आइ ॥1॥ रहाउ ॥
काचै करवै रहै न पानी ॥
हंसु चलिआ काइआ कुमलानी ॥2॥
कुआर कंनिआ जैसे करत सीगारा ॥
किउ रलीआ मानै बाझु भतारा ॥3॥
काग उडावत भुजा पिरानी ॥
कहि कबीर इह कथा सिरानी ॥4॥2॥
अमलु सिरानो लेखा देना ॥
आए कठिन दूत जम लेना ॥
किआ तै खटिआ कहा गवाइआ ॥
चलहु सिताब दीबानि बुलाइआ ॥1॥
चलु दरहालु दीवानि बुलाइआ ॥
हरि फुरमानु दरगह का आइआ ॥1॥ रहाउ ॥
करउ अरदासि गाव किछु बाकी ॥
लेउ निबेरि आजु की राती ॥
किछु भी खरचु तुम॑ारा सारउ ॥
सुबह निवाज सराइ गुजारउ ॥2॥
साधसंगि जा कउ हरि रंगु लागा ॥ धनु धनु सो जनु पुरखु सभागा ॥
ईत ऊत जन सदा सुहेले ॥
जनमु पदारथु जीति अमोले ॥3॥
जागतु सोइआ जनमु गवाइआ ॥
मालु धनु जोरिआ भइआ पराइआ ॥
कहु कबीर तेई नर भूले ॥
खसमु बिसारि माटी संगि रूले ॥4॥3॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।