लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 792 · सूही

इस पृष्ठ पर
अंग
792
सूही
अंग बदलें या अंश चुनें · 6 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. किउ न मरीजै रोइ जा लगु चिति न आवही ॥1॥
  2. जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी संम॑ालिओइ ॥
  3. हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥
  4. रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥
  5. सूही कबीर जी ॥
  6. सूही कबीर जीउ ॥

किउ न मरीजै रोइ जा लगु चिति न आवही ॥1॥

अंग 791 से चला आ रहा अंश

किउ न मरीजै रोइ जा लगु चिति न आवही ॥1॥

हिन्दी अर्थ: जब तक आप मेरे चित्त में ना बसे। क्यों ना रो रो के मरूँ। (आपको बिसार के दुखों में ही तो खपना है)। 1।

जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी संम॑ालिओइ ॥

मः 2 ॥
जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी संम॑ालिओइ ॥
नानकु कहै सिआणीए इउ कंत मिलावा होइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ अगर सुख है तो भी पति-प्रभू को याद करें। दुख में भी मालिक को चेते रखें। तो। नानक कहता है। हे समझदार जीव-स्त्री ! इस तरह पति से मेल होता है। 2।

हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥

पउड़ी ॥
हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥
तू अगम दइआलु अगंमु है आपि लैहि मिलाई ॥
मै तुझ बिनु बेली को नही तू अंति सखाई ॥
जो तेरी सरणागती तिन लैहि छडाई ॥
नानक वेपरवाहु है तिसु तिलु न तमाई ॥20॥1॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! मैं एक कीड़ा सा हूँ। आपकी महिमा बहुत अपार है। मैं आपके क्या-क्या गुण बयान करूँ। आप बड़े दयालु हैं। अपहुँच हैं। आप खुद ही अपने साथ मिलाते हैं। मुझे आपके बिना और कोई बेली नहीं दिखता। अंत में आप ही मेरे साथी और सहायक हैं। जो जो जीव आपकी शरण आते हैं उनको (आप अहंकार के चक्करों से) बचा लेते हैं। हे नानक ! प्रभू स्वयं बेमुहताज है। उसको रक्ती भर भी कोई लालच नहीं। 20। 1।

रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥

रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥
कबीर के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥
राम को नामु न कबहू लीना ॥1॥
राम न जपहु कवन मति लागे ॥
मरि जइबे कउ किआ करहु अभागे ॥1॥ रहाउ ॥
दुख सुख करि कै कुटंबु जीवाइआ ॥
मरती बार इकसर दुखु पाइआ ॥2॥
कंठ गहन तब करन पुकारा ॥
कहि कबीर आगे ते न संम॑ारा ॥3॥1॥

हिन्दी अर्थ: रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥ कबीर के ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) जगत में आ के जनम ले के आपने किया क्या। (अर्थात। आपने कुछ भी नहीं कमाया)। 1। आपने परमात्मा का नाम (तो) कभी सिमरा नहीं। आप प्रभू का नाम नहीं सिमरते। कौन सी कोझी मति से लगे हुए हैं। हे भाग्यहीन बंदे ! आप मरने के वक्त के लिए क्या तैयारी कर रहे हैं।रहाउ। कई तरह की मुश्किलें सह के आप (सारी उम्र) कुटंब ही पालते रहे। पर मरने के वक्त आपको अकेले ही (अपनी गलतियों के लिए) दुख सहने पड़े (पड़ेंगे)। 2। कबीर कहता है, (जब जमों ने आपको) गले से आ के पकड़ा (भाव। जब मौत सिर पर आ गई)।तब रोने पुकारने (से कोई लाभ नहीं होगा); (उस वक्त के आने से) पहले ही आप क्यों नहीं परमात्मा को याद करते। 3। 1।

सूही कबीर जी ॥

सूही कबीर जी ॥
थरहर कंपै बाला जीउ ॥
ना जानउ किआ करसी पीउ ॥1॥
रैनि गई मत दिनु भी जाइ ॥
भवर गए बग बैठे आइ ॥1॥ रहाउ ॥
काचै करवै रहै न पानी ॥
हंसु चलिआ काइआ कुमलानी ॥2॥
कुआर कंनिआ जैसे करत सीगारा ॥
किउ रलीआ मानै बाझु भतारा ॥3॥
काग उडावत भुजा पिरानी ॥
कहि कबीर इह कथा सिरानी ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: सूही कबीर जी ॥ (इतनी उम्र भक्ति के बिना गुजर जाने के कारण अब) मेरी अंजान जिंद बहुत सहमी हुई है कि पता नहीं पति प्रभू (मेरे साथ) क्या सलूक करेगा। 1। (परमात्मा का नाम जपे बिना ही मेरी) जवानी की उम्र बीत गई है। (मुझे अब ये डर है कि) कहीं (इसी तरह) बुढ़ापा भी ना बीत जाए। (मेरे) काले केश चले गए हैं (उनकी जगह अब) सफेद आ गए हैं।1।रहाउ। (अब तक बेपरवाही में ख्याल ही नहीं किया कि ये शरीर तो कच्चे बर्तन की तरह है) कच्चे कुजे में पानी टिका नहीं रह सकता (सांसें बीतती गई। अब) शरीर कुम्हला रहा है और (जीव-) भवरा उडारी मारने को तैयार है (पर अपना कुछ भी ना सवारा)। 2। जैसे कँवारी कन्या श्रृंगार करती रहे। पति मिलने के बिना (इन श्रृंगारों का) उसको कोई आनंद नहीं आ सकता। (वैसे ही मैं भी सारी उम्र निरे शरीर की खातिर ही आहर-पाहर करती रही। प्रभू को विसारने के कारण कोई आत्मिक सुख ना मिला)। 3। कबीर कहता है, (हे पति-प्रभू ! अब तो आ के मिल। आपके इन्तजार में) कौए उड़ाती-उड़ाती मेरी तो बाँह भी थक चुकी है। (और उधर से मेरी उम्र की) कहानी भी समाप्त होने को आ गई है। 4। 2।

सूही कबीर जीउ ॥

सूही कबीर जीउ ॥
अमलु सिरानो लेखा देना ॥
आए कठिन दूत जम लेना ॥
किआ तै खटिआ कहा गवाइआ ॥
चलहु सिताब दीबानि बुलाइआ ॥1॥
चलु दरहालु दीवानि बुलाइआ ॥
हरि फुरमानु दरगह का आइआ ॥1॥ रहाउ ॥
करउ अरदासि गाव किछु बाकी ॥
लेउ निबेरि आजु की राती ॥
किछु भी खरचु तुम॑ारा सारउ ॥
सुबह निवाज सराइ गुजारउ ॥2॥
साधसंगि जा कउ हरि रंगु लागा ॥ धनु धनु सो जनु पुरखु सभागा ॥
ईत ऊत जन सदा सुहेले ॥
जनमु पदारथु जीति अमोले ॥3॥
जागतु सोइआ जनमु गवाइआ ॥
मालु धनु जोरिआ भइआ पराइआ ॥
कहु कबीर तेई नर भूले ॥
खसमु बिसारि माटी संगि रूले ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: सूही कबीर जीउ ॥ (हे जीव ! जगत में) नौकरी का समय (उम्र का नियत समय) निकल गया है। (यहाँ जो कुछ करता रहा है) उसका हिसाब देना पड़ेगा; कठोर जमदूत लेने आ गए हैं। यहाँ रह के आपने क्या कमाई की है। और कहाँ गवाया है (वे कहेंगे-) जल्दी चलो। धर्मराज ने बुलाया है। 1। जल्दी चल। धर्मराज ने बुलाया है; प्रभू की दरगाह का हुकम आया है। 1।रहाउ। मैं विनती करता हूँ कि गाँव का कुछ हिसाब-किताब रह गया है। (अगर आज्ञा हो) तो मैं आज की रात ही वह हिसाब समाप्त कर लूँगा। कुछ आपके लिए भी खर्च का प्रबंध कर लूँगा। और सुबह की नमाज़ राह में ही पढ़ लूँगा (भाव। बहुत सुबह ही आपके साथ चल दॅूँगा)। 2। जिस मनुष्य को सत्संग में रह के प्रभू का प्यार प्राप्त होता है। वह मनुष्य धन्य है। भाग्यशाली है। प्रभू के सेवक लोक-परलोक में सुख से रहते हैं क्योंकि वे इस अमोलक जनम-रूपी कीमती शै को जीत लेते हैं। 3। जो मनुष्य जागता ही (माया की नींद में) सोया रहता है। वह मानस जीवन को व्यर्थ गवा लेता है। (क्योंकि) उसका सारा इकट्ठा किया हुआ माल-धन (तो आखिर) बेगाना हो जाता है। हे कबीर ! कह,वे मनुष्य अवसर गवा चुके हैं। वे मिट्टी में ही मिल चुके हैं जिन्होंने परमात्मा पति को बिसारा। 4। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 2: गुरु अंगद देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 792 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।