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अंग 792

अंग
792
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
किउ न मरीजै रोइ जा लगु चिति न आवही ॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: जब तक आप मेरे चित्त में ना बसे।क्यों ना रो रो के मरूँ।(आपको बिसार के दुखों में ही तो खपना है)। 1।
मः 2 ॥
जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी संम॑ालिओइ ॥
नानकु कहै सिआणीए इउ कंत मिलावा होइ ॥2॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ अगर सुख है तो भी पति-प्रभू को याद करें।दुख में भी मालिक को चेते रखें।तो। नानक कहता है।हे समझदार जीव-स्त्री ! इस तरह पति से मेल होता है। 2।
पउड़ी ॥
हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥
तू अगम दइआलु अगंमु है आपि लैहि मिलाई ॥
मै तुझ बिनु बेली को नही तू अंति सखाई ॥
जो तेरी सरणागती तिन लैहि छडाई ॥
नानक वेपरवाहु है तिसु तिलु न तमाई ॥20॥1॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! मैं एक कीड़ा सा हूँ।आपकी महिमा बहुत अपार है।मैं आपके क्या-क्या गुण बयान करूँ। आप बड़ा दयालु हैं।अपहुँच है आप खुद ही अपने साथ मिलाता है। मुझे आपके बिना और कोई बेली नहीं दिखता।आखिर आप ही साथी हैं के पुकारता है। जो जो जीव आपकी शरण आते हैं उनको (आप अहंकार के चक्करों से) बचा लेता है। हे नानक ! प्रभू स्वयं बेमुहताज है।उसको रक्ती भर भी कोई लालच नहीं। 20। 1।
रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥
कबीर के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥
राम को नामु न कबहू लीना ॥1॥
राम न जपहु कवन मति लागे ॥
मरि जइबे कउ किआ करहु अभागे ॥1॥ रहाउ ॥
दुख सुख करि कै कुटंबु जीवाइआ ॥
मरती बार इकसर दुखु पाइआ ॥2॥
कंठ गहन तब करन पुकारा ॥
कहि कबीर आगे ते न संम॑ारा ॥3॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥ कबीर के सतिगुर प्रसादि ॥ (हे भाई !) जगत में आ के जनम ले के तूने किया क्या।(अर्थात।तूने कुछ भी नहीं कमाया)। 1। तूने परमात्मा का नाम (तो) कभी सिमरा नहीं। आप प्रभू का नाम नहीं सिमरता।कौन सी कोझी मति से लगा हुआ है। हे भाग्यहीन बंदे ! आप मरने के वक्त के लिए क्या तैयारी कर रहा है।रहाउ। कई तरह की मुश्किलें सह के आप (सारी उम्र) कुटंब ही पालता रहा। पर मरने के वक्त आपको अकेले ही (अपनी गलतियों के लिए) दुख सहने पड़े (पड़ेंगे)। 2। कबीर कहता है, (जब जमों ने आपको) गले से आ के पकड़ा (भाव।जब मौत सिर पर आ गई)।तब रोने पुकारने (से कोई लाभ नहीं होगा); (उस वक्त के आने से) पहले ही आप क्यों नहीं परमात्मा को याद करता। 3। 1।
सूही कबीर जी ॥
थरहर कंपै बाला जीउ ॥
ना जानउ किआ करसी पीउ ॥1॥
रैनि गई मत दिनु भी जाइ ॥
भवर गए बग बैठे आइ ॥1॥ रहाउ ॥
काचै करवै रहै न पानी ॥
हंसु चलिआ काइआ कुमलानी ॥2॥
कुआर कंनिआ जैसे करत सीगारा ॥
किउ रलीआ मानै बाझु भतारा ॥3॥
काग उडावत भुजा पिरानी ॥
कहि कबीर इह कथा सिरानी ॥4॥2॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: सूही कबीर जी ॥ (इतनी उम्र भक्ति के बिना गुजर जाने के कारण अब) मेरी अंजान जिंद बहुत सहमी हुई है कि पता नहीं पति प्रभू (मेरे साथ) क्या सलूक करेगा। 1। (परमात्मा का नाम जपे बिना ही मेरी) जवानी की उम्र बीत गई है।(मुझे अब ये डर है कि) कहीं (इसी तरह) बुढ़ापा भी ना बीत जाए। (मेरे) काले केश चले गए हैं (उनकी जगह अब) सफेद आ गए हैं।1।रहाउ। (अब तक बेपरवाही में ख्याल ही नहीं किया कि ये शरीर तो कच्चे बर्तन की तरह है) कच्चे कुजे में पानी टिका नहीं रह सकता (सांसें बीतती गई। अब) शरीर कुम्हला रहा है और (जीव-) भवरा उडारी मारने को तैयार है (पर अपना कुछ भी ना सवारा)। 2। जैसे कँवारी कन्या श्रृंगार करती रहे। पति मिलने के बिना (इन श्रृंगारों का) उसको कोई आनंद नहीं आ सकता।(वैसे ही मैं भी सारी उम्र निरे शरीर की खातिर ही आहर-पाहर करती रही।प्रभू को विसारने के कारण कोई आत्मिक सुख ना मिला)। 3। कबीर कहता है, (हे पति-प्रभू ! अब तो आ के मिल।आपके इन्तजार में) कौए उड़ाती-उड़ाती मेरी तो बाँह भी थक चुकी है। (और उधर से मेरी उम्र की) कहानी भी समाप्त होने को आ गई है। 4। 2।
सूही कबीर जीउ ॥
अमलु सिरानो लेखा देना ॥
आए कठिन दूत जम लेना ॥
किआ तै खटिआ कहा गवाइआ ॥
चलहु सिताब दीबानि बुलाइआ ॥1॥
चलु दरहालु दीवानि बुलाइआ ॥
हरि फुरमानु दरगह का आइआ ॥1॥ रहाउ ॥
करउ अरदासि गाव किछु बाकी ॥
लेउ निबेरि आजु की राती ॥
किछु भी खरचु तुम॑ारा सारउ ॥
सुबह निवाज सराइ गुजारउ ॥2॥
साधसंगि जा कउ हरि रंगु लागा ॥ धनु धनु सो जनु पुरखु सभागा ॥
ईत ऊत जन सदा सुहेले ॥
जनमु पदारथु जीति अमोले ॥3॥
जागतु सोइआ जनमु गवाइआ ॥
मालु धनु जोरिआ भइआ पराइआ ॥
कहु कबीर तेई नर भूले ॥
खसमु बिसारि माटी संगि रूले ॥4॥3॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: सूही कबीर जीउ ॥ (हे जीव ! जगत में) नौकरी का समय (उम्र का नियत समय) निकल गया है। (यहाँ जो कुछ करता रहा है) उसका हिसाब देना पड़ेगा; कठोर जमदूत लेने आ गए हैं। यहाँ रह के तूने क्या कमाई की है।और कहाँ गवाया है (वे कहेंगे-) जल्दी चलो।धर्मराज ने बुलाया है। 1। जल्दी चल। धर्मराज ने बुलाया है; प्रभू की दरगाह का हुकम आया है। 1।रहाउ। मैं विनती करता हूँ कि गाँव का कुछ हिसाब-किताब रह गया है। (अगर आज्ञा हो) तो मैं आज की रात ही वह हिसाब समाप्त कर लूँगा। कुछ आपके लिए भी खर्च का प्रबंध कर लूँगा। और सुबह की नमाज़ राह में ही पढ़ लूँगा (भाव।बहुत सुबह ही आपके साथ चल दॅूँगा)। 2। जिस मनुष्य को सत्संग में रह के प्रभू का प्यार प्राप्त होता है। वह मनुष्य धन्य है।भाग्यशाली है। प्रभू के सेवक लोक-परलोक में सुख से रहते हैं क्योंकि वे इस अमोलक जनम-रूपी कीमती शै को जीत लेते हैं। 3। जो मनुष्य जागता ही (माया की नींद में) सोया रहता है।वह मानस जीवन को व्यर्थ गवा लेता है। (क्योंकि) उसका सारा इकट्ठा किया हुआ माल-धन (तो आखिर) बेगाना हो जाता है। हे कबीर ! कह,वे मनुष्य अवसर गवा चुके हैं। वे मिट्टी में ही मिल चुके हैं जिन्होंने परमात्मा पति को बिसारा। 4। 3।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।