हरि हरि भगती काजु सुहेला गुरि सतिगुरि दानु दिवाइआ ॥
खंडि वरभंडि हरि सोभा होई इहु दानु न रलै रलाइआ ॥
होरि मनमुख दाजु जि रखि दिखालहि सु कूड़ु अहंकारु कचु पाजो ॥
हरि प्रभ मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥4॥
हरि राम राम मेरे बाबोला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥
हरि जुगह जुगो जुग जुगह जुगो सद पीड़ी गुरू चलंदी ॥
जुगि जुगि पीड़ी चलै सतिगुर की जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ ॥
हरि पुरखु न कब ही बिनसै जावै नित देवै चड़ै सवाइआ ॥
नानक संत संत हरि एको जपि हरि हरि नामु सोहंदी ॥
हरि राम राम मेरे बाबुला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥5॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा गोबिंद नामु समाले ॥
मन पिआरिआ जी मित्रा हरि निबहै तेरै नाले ॥
संगि सहाई हरि नामु धिआई बिरथा कोइ न जाए ॥
मन चिंदे सेई फल पावहि चरण कमल चितु लाए ॥
जलि थलि पूरि रहिआ बनवारी घटि घटि नदरि निहाले ॥
नानकु सिख देइ मन प्रीतम साधसंगि भ्रमु जाले ॥1॥
मन पिआरिआ जी मित्रा हरि बिनु झूठु पसारे ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा बिखु सागरु संसारे ॥
चरण कमल करि बोहिथु करते सहसा दूखु न बिआपै ॥
गुरु पूरा भेटै वडभागी आठ पहर प्रभु जापै ॥
आदि जुगादी सेवक सुआमी भगता नामु अधारे ॥
नानकु सिख देइ मन प्रीतम बिनु हरि झूठ पसारे ॥2॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि लदे खेप सवली ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि दरु निहचलु मली ॥
हरि दरु सेवे अलख अभेवे निहचलु आसणु पाइआ ॥
तह जनम न मरणु न आवण जाणा संसा दूखु मिटाइआ ॥
चित्र गुपत का कागदु फारिआ जमदूता कछू न चली ॥
नानकु सिख देइ मन प्रीतम हरि लदे खेप सवली ॥3॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा करि संता संगि निवासो ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि नामु जपत परगासो ॥
सिमरि सुआमी सुखह गामी इछ सगली पुंनीआ ॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मुझे हरि का नाम ही (दहेज के) कपड़े दे, मुझे हरि का नाम ही (दहेज के गहने आदिक) धन दे, इसी दहेज से मेरा (प्रभू पति के साथ) विवाह सुंदर लगने लग पड़े।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।