अंग 79

अंग
79
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि कपड़ो हरि सोभा देवहु जितु सवरै मेरा काजो ॥
हरि हरि भगती काजु सुहेला गुरि सतिगुरि दानु दिवाइआ ॥
खंडि वरभंडि हरि सोभा होई इहु दानु न रलै रलाइआ ॥
होरि मनमुख दाजु जि रखि दिखालहि सु कूड़ु अहंकारु कचु पाजो ॥
हरि प्रभ मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥4॥
हरि राम राम मेरे बाबोला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥
हरि जुगह जुगो जुग जुगह जुगो सद पीड़ी गुरू चलंदी ॥
जुगि जुगि पीड़ी चलै सतिगुर की जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ ॥
हरि पुरखु न कब ही बिनसै जावै नित देवै चड़ै सवाइआ ॥
नानक संत संत हरि एको जपि हरि हरि नामु सोहंदी ॥
हरि राम राम मेरे बाबुला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥5॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मुझे हरि का नाम ही (दहेज के) कपड़े दे, मुझे हरि का नाम ही (दहेज के गहने आदिक) धन दे, इसी दहेज से मेरा (प्रभू पति के साथ) विवाह सुंदर लगने लग पड़े। परमात्मा की भक्ति के साथ ही (परमात्मा से) विवाह का उद्यम सुखदाई बनता है। (जिस जीव कन्या को) गुरू ने सतिगुरू ने ये दान (ये दहेज) दिलाया है, हरि नाम के दहेज से उसकी शोभा (उस के) देश में संसार में हो जाती है। यह दहेज ऐसा है कि इससे और कोई बराबरी नहीं कर सकता। अपने मन के पीछे चलने वाले और लोग जो दहेज रख के दिखाते हैं (दिखावा करते हैं) वह झूठा अहंकार (पैदा करने वाले) हैं वह काँच (के समान कच्चे) हैं, वो (निरा) दिखावा ही है। हे मेरे पिता ! मुझे हरि प्रभू का नाम दान दे, मुझे यही दहेज दे।4। हे मेरे पिता ! हरि पति के साथ राम पति के साथ मिल के जीव स्त्री की पीढ़ी चल पड़ती है। अनेकों युगों से सदा से ही गुरू की प्रभू पति की, पीढ़ी चली आती है। हरेक युग में सतिगुरू की पीढ़ी (नादी संतान) चल पड़ती है। जिन्होंने गुरू को मिल के परमात्मा का नाम सिमरा है (वे गुरू की पीढ़ी हैं, वे गुरू की नादी संतान हैं)। परमात्मा ऐसा पति है, जो कभी भी नाश नहीं होता, जो कभी भी नहीं मरता। वह सदा दातें बख्शता है, उसकी दात सदा बढ़ती ही रहती है। हे नानक ! भगत जन और भगतों का (प्यारा) प्रभू एक रूप है। परमात्मा का नाम जप जप के जीव स्त्री सुंदर जीवन वाली बन जाती है। हे मेरे पिता ! हरि पति के साथ राम पति के साथ मिल के जीव स्त्री की पीढ़ी चल पड़ती है (भाव, उसकी संगति में रह कर और अनेकों जीव सिमरन की राह पे पड़ जाते हैं)।5।1।
सिरीरागु महला 5 छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा गोबिंद नामु समाले ॥
मन पिआरिआ जी मित्रा हरि निबहै तेरै नाले ॥
संगि सहाई हरि नामु धिआई बिरथा कोइ न जाए ॥
मन चिंदे सेई फल पावहि चरण कमल चितु लाए ॥
जलि थलि पूरि रहिआ बनवारी घटि घटि नदरि निहाले ॥
नानकु सिख देइ मन प्रीतम साधसंगि भ्रमु जाले ॥1॥
मन पिआरिआ जी मित्रा हरि बिनु झूठु पसारे ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा बिखु सागरु संसारे ॥
चरण कमल करि बोहिथु करते सहसा दूखु न बिआपै ॥
गुरु पूरा भेटै वडभागी आठ पहर प्रभु जापै ॥
आदि जुगादी सेवक सुआमी भगता नामु अधारे ॥
नानकु सिख देइ मन प्रीतम बिनु हरि झूठ पसारे ॥2॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि लदे खेप सवली ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि दरु निहचलु मली ॥
हरि दरु सेवे अलख अभेवे निहचलु आसणु पाइआ ॥
तह जनम न मरणु न आवण जाणा संसा दूखु मिटाइआ ॥
चित्र गुपत का कागदु फारिआ जमदूता कछू न चली ॥
नानकु सिख देइ मन प्रीतम हरि लदे खेप सवली ॥3॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा करि संता संगि निवासो ॥
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि नामु जपत परगासो ॥
सिमरि सुआमी सुखह गामी इछ सगली पुंनीआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 छंत ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे (मेरे) प्यारे मन ! हे (मेरे) मित्र मन ! परमात्मा का नाम (अपने अंदर) संभाल के रख। हे प्यारे मन ! हे मित्र मन ! ये हरि नाम (सदा) आपके साथ निभेगा। (हे मन !) परमात्मा का नाम सिमर, (यही आपके) साथ (रहेगा। जो भी मनुष्य यही हरि नाम सिमरता है) वह दुनिया से खाली (हाथ) नहीं जाता। (हे भाई !) परमात्मा के सुंदर चरणों में चित्त जोड़, आप सारे मन इच्छित फल प्राप्त कर लेगा। (हे मेरे मन !) जगत का मालिक प्रभू जल में धरती में हर जगह मौजूद है। वह हरेक शरीर में (व्यापक हो के मिहर की) निगाह से (हरेक को) देखता है। हे प्यारे मन ! नानक (आपको) शिक्षा देता है,साध-संगति में रह के अपनी भटकना का नाश कर।1। हे मेरे प्यारे मन ! परमात्मा के बिना (और कोई सदा साथ निभाने वाला नहीं है), ये सारा जगत पसारा सदा साथ निभाने वाला नहीं। हे मेरे प्यारे मन ! ये संसार (एक) समुंद्र (है, जो) जहर (से भरा हुआ) है। (हे मन !) करतार के सुंदर चरणों को जहाज बना (इसकी बरकति से) कोई सहम कोई दुख अपना जोर नहीं डाल सकता। (पर जीव के वश की बात नहीं) जिस भाग्यशाली को पूरा गुरू मिलता है, वह प्रभू को आठों पहर सिमरता है। आदि से ही, युगों के आरम्भ से ही, (परमात्मा अपने) सेवकों का रक्षक (चला आ रहा) है, (परमात्मा के) भगतों के लिए परमात्मा का नाम (सदा ही) जिंदगी का सहारा है। हे प्यारे मन ! नानक (आपको) शिक्षा देता है, परमात्मा के नाम के बिना बाकी सारे जगत खिलारे आखिर तक साथ निभाने वाले नहीं हैं। हे प्यारे मन ! हे मित्र ! परमात्मा के नाम का सौदा कर, ये सौदा नफा देने वाला है। हे प्यारे मन ! हे मित्र मन ! परमात्मा के दरवाजे पर डटा रह, यही दरवाजा अटॅल है। जो मनुष्य परमात्मा के दर पर कब्जा करके रखता है, जो अदृष्ट है और जिसका भेद नहीं पाया जा सकता, वह मनुष्य ऐसा (आत्मिक) ठिकाना हासिल कर लेता है जो कभी डोलता नहीं। उस आत्मिक ठिकाने पर पहुँच के जनम मरन के चक्कर खत्म हो जाते हैं, मनुष्य हरेक किस्म के सहम व दुख मिटा लेता है। (उस आत्मिक ठिकाने पे पहुँचा मनुष्य धर्मराज के बनाये हुए) चित्र गुप्त का लेखा फाड़ देता है (भाव, कोई गलत कर्म करता ही नहीं जिसे चित्र गुप्त लिख सकें), यमदूतों का भी कोई जोर उस पर नहीं चलता। (इस वास्ते) हे प्यारे मन ! नानक (आपको) शिक्षा देता है कि परमात्मा के नाम का सौदा कर, यही सौदा नफे वाला है।3। हे प्यारे मन ! हे मित्र मन ! गुरमुखों की संगति में उठना बैठना बना। हे प्यारे मन ! हे मित्र मन ! (गुरमुखों की संगति में) परमात्मा का नाम जपने से अंदर आत्मिक प्रकाश हो जाता है। सुख पहुँचाने वाले मालिक प्रभू को सिमरने से सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं,

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मुझे हरि का नाम ही (दहेज के) कपड़े दे, मुझे हरि का नाम ही (दहेज के गहने आदिक) धन दे, इसी दहेज से मेरा (प्रभू पति के साथ) विवाह सुंदर लगने लग पड़े।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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