सगली रैणि गुदरी अंधिआरी सेवि सतिगुरु चानणु होइ ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥4॥
लिखिआ आइआ गोविंद का वणजारिआ मित्रा उठि चले कमाणा साथि ॥
इक रती बिलम न देवनी वणजारिआ मित्रा ओनी तकड़े पाए हाथ ॥
लिखिआ आइआ पकड़ि चलाइआ मनमुख सदा दुहेले ॥
जिनी पूरा सतिगुरु सेविआ से दरगह सदा सुहेले ॥
करम धरती सरीरु जुग अंतरि जो बोवै सो खाति ॥
कहु नानक भगत सोहहि दरवारे मनमुख सदा भवाति ॥5॥1॥4॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध इआणी पेईअड़ै किउ करि हरि दरसनु पिखै ॥
हरि हरि अपनी किरपा करे गुरमुखि साहुरड़ै कंम सिखै ॥
साहुरड़ै कंम सिखै गुरमुखि हरि हरि सदा धिआए ॥
सहीआ विचि फिरै सुहेली हरि दरगह बाह लुडाए ॥
लेखा धरम राइ की बाकी जपि हरि हरि नामु किरखै ॥
मुंध इआणी पेईअड़ै गुरमुखि हरि दरसनु दिखै ॥1॥
वीआहु होआ मेरे बाबुला गुरमुखे हरि पाइआ ॥
अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ ॥
बलिआ गुर गिआनु अंधेरा बिनसिआ हरि रतनु पदारथु लाधा ॥
हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा आपु आपै गुरमति खाधा ॥
अकाल मूरति वरु पाइआ अबिनासी ना कदे मरै न जाइआ ॥
वीआहु होआ मेरे बाबोला गुरमुखे हरि पाइआ ॥2॥
हरि सति सते मेरे बाबुला हरि जन मिलि जंञ सुहंदी ॥
पेवकड़ै हरि जपि सुहेली विचि साहुरड़ै खरी सोहंदी ॥
साहुरड़ै विचि खरी सोहंदी जिनि पेवकड़ै नामु समालिआ ॥
सभु सफलिओ जनमु तिना दा गुरमुखि जिना मनु जिणि पासा ढालिआ ॥
हरि संत जना मिलि कारजु सोहिआ वरु पाइआ पुरखु अनंदी ॥
हरि सति सति मेरे बाबोला हरि जन मिलि जंञ सोुहंदी ॥3॥
हरि प्रभु मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माया का यह मोह (जिसमें आप फंसा पड़ा है) आपके साथ नहीं जा सकता, तूने इससे झूठा प्यार डाला हुआ है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।