Lulla Family

अंग 78

अंग
78
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इहु मोहु माइआ तेरै संगि न चालै झूठी प्रीति लगाई ॥
सगली रैणि गुदरी अंधिआरी सेवि सतिगुरु चानणु होइ ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥4॥
लिखिआ आइआ गोविंद का वणजारिआ मित्रा उठि चले कमाणा साथि ॥
इक रती बिलम न देवनी वणजारिआ मित्रा ओनी तकड़े पाए हाथ ॥
लिखिआ आइआ पकड़ि चलाइआ मनमुख सदा दुहेले ॥
जिनी पूरा सतिगुरु सेविआ से दरगह सदा सुहेले ॥
करम धरती सरीरु जुग अंतरि जो बोवै सो खाति ॥
कहु नानक भगत सोहहि दरवारे मनमुख सदा भवाति ॥5॥1॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: माया का यह मोह (जिसमें आप फंसा पड़ा है) आपके साथ नहीं जा सकता, तूने इससे झूठा प्यार डाला हुआ है। (हे भाई !) जिंदगी की सारी रात माया के अंधेरे में बीतती जा रही है। गुरू की शरण पड़ (ता कि आपके अंदर परमात्मा के नाम का) प्रकाश हैं जाऐ। हे नानक ! कह, (जिंदगी की) रात के चौथै पहर वह दिन नजदीक आ जाता है (जब यहां से कूच करना होता है)।4। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! जब परमात्मा द्वारा (मौत का) लिखा हुआ (परवाना) आता है, तब (यहां) कमाए हुए (अच्छे बुरे कर्मों के संस्कार जीवात्मा के) साथ चल पड़ते हैं। उस समय यमों ने पक्के हाथ डाले होते हैं, हे वणजारे मित्र ! वे रक्ती मात्र भी समय की टाल मटोल की इजाजत नहीं देते। जब करतार द्वारा (मौत का) लिखा हुआ हुकम आता है (वह यम जीव को) पकड़ के आगे लगा लेते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (फिर) सदा दुखी रहते हैं। जिन्होंने पूरे गुरू का आसरा लिए रखा, वे परमात्मा की दरगाह में सदा सुखी रहते हैं। (हे वणजारे मित्र !) मनुष्य जीवन में (मनुष्य का) शरीर कर्म कमाने के लिए धरती (के समान) है, (जिस में) जैसा (कोई) बीजता है वही खाता है। हे नानक ! कह,परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा के दर पर शोभा पाते हैं, अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा जनम मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं।5।1।4।
सिरीरागु महला 4 घरु 2 छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध इआणी पेईअड़ै किउ करि हरि दरसनु पिखै ॥
हरि हरि अपनी किरपा करे गुरमुखि साहुरड़ै कंम सिखै ॥
साहुरड़ै कंम सिखै गुरमुखि हरि हरि सदा धिआए ॥
सहीआ विचि फिरै सुहेली हरि दरगह बाह लुडाए ॥
लेखा धरम राइ की बाकी जपि हरि हरि नामु किरखै ॥
मुंध इआणी पेईअड़ै गुरमुखि हरि दरसनु दिखै ॥1॥
वीआहु होआ मेरे बाबुला गुरमुखे हरि पाइआ ॥
अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ ॥
बलिआ गुर गिआनु अंधेरा बिनसिआ हरि रतनु पदारथु लाधा ॥
हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा आपु आपै गुरमति खाधा ॥
अकाल मूरति वरु पाइआ अबिनासी ना कदे मरै न जाइआ ॥
वीआहु होआ मेरे बाबोला गुरमुखे हरि पाइआ ॥2॥
हरि सति सते मेरे बाबुला हरि जन मिलि जंञ सुहंदी ॥
पेवकड़ै हरि जपि सुहेली विचि साहुरड़ै खरी सोहंदी ॥
साहुरड़ै विचि खरी सोहंदी जिनि पेवकड़ै नामु समालिआ ॥
सभु सफलिओ जनमु तिना दा गुरमुखि जिना मनु जिणि पासा ढालिआ ॥
हरि संत जना मिलि कारजु सोहिआ वरु पाइआ पुरखु अनंदी ॥
हरि सति सति मेरे बाबोला हरि जन मिलि जंञ सोुहंदी ॥3॥
हरि प्रभु मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 4 घरु 2 छंत ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। अगर जीव-स्त्री पेके घर में (इस मनुष्य जन्म में) अंञाण ही टिकी रहे, तो वह पति प्रभू का दर्शन कैसे कर सकती है? (दर्शन नही कर सकती)। जब परमात्मा अपनी मिहर करता है, तो (जीव स्त्री) गुरू के सन्मुख हो के प्रभू पति के चरणों में पहुँचने वाले काम (करने) सीखती है। गुरू की शरण पड़ कर (जीव स्त्री) वह काम सीखती है, जिनकी सहायता से पति प्रभू की हजूरी में पहुँच सके (वे काम ये हैं कि जीव स्त्री) सदा परमात्मा का नाम सिमरती है, सहेलियों में (सत्संगियों में रह के इस लोक में) आराम से चलती फिरती है (आरामदायक जीवन व्यतीत करती है, और) परमात्मा की हजूरी में बे-फिक्र हो के पहुँचती है। वह जीव स्त्री परमात्मा का नाम सदा जप के धर्मराज का लेखा, धर्मराज के लेखे की बाकी, खत्म कर लेती है। भोली जीव स्त्री पेके घर में (इस मनुष्य जन्म में) गुरू की शरण पड़ के परमात्मा पति का दर्शन कर लेती है।1। हे मेरे पिता ! (प्रभू पति के साथ) मेरा ब्याह हो गया है, गुरू की शरण पड़ के मुझे प्रभू पति मिल गया है। गुरू का बख्शा हुआ ज्ञान (रूपी सूरज इतना) तेज जग मग कर उठा है कि (मेरे अंदर से) बे-समझी का अंधकार दूर हो गया है। गुरू का दिया ज्ञान (मेरे अंदर) चमक पड़ा है (माया मोह का) अंधेरा दूर हो गया है (उस प्रकाश की बरकति से मुझे) परमात्मा का नाम (-रूप) कीमती रत्न मिल गया है। गुरू की मति पे चलने से मेरा अहंकार का रोग दूर हो गया है, अहम् का दुख खत्म हो गया है, स्वै के ज्ञान से स्वै भाव खत्म हो गया है। (गुरू की शरण पड़ने से) मुझे वह पति मिल गया है, जिसकी हस्ती को कभी काल छू नही सकता, जो नाश-रहित है, जो ना कभी मरता है ना पैदा होता है। हे मेरे पिता ! गुरू की शरण पड़ के मेरा (परमात्मा पति के साथ) विवाह हो गया है, मुझे परमात्मा मिल गया है।2। हे मेरे पिता ! प्रभू पति सदा कायम रहने वाला है, सदा कायम रहने वाला है, (उस पति के साथ मिलाप कराने के लिए) उस प्रभू के भगत जन मिल के (मानो) सुंदर बारात बनते हैं। (जीव सि्त्रयां इन सत्संगियों में रह के) पेके घर में (इस मनुष्य जनम में) परमात्मा का नाम जप के सुखी जीवन व्यतीत करती हैं, और परलोक में भी बहुत शोभा पाती हैं। (ये यकीन जानों कि) जिस जीव स्त्री ने पेके घर में परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाया है, वह परलोक में (जरूर) शोभा कमाती है। गुरू की शरण पड़ के उन जीव सि्त्रयों का जीवन कामयाब हो जाता है, जिन्होंने अपना मन जीत के (वश में ला के) चौपड़-रूप ये जीवन खेल खेली है। परमात्मा का भजन करने वाले गुरमुखों के साथ मिल के परमात्मा पति के साथ मधुर मिलाप हो जाता है, वह सर्व-व्यापक और आनन्द का श्रोत पति प्रभू मिल जाता है। हे मेरे पिता ! प्रभू पति सदा कायम रहने वाला है, सदा कायम रहने वाला है, (उस पति से मिलाप कराने के लिए) उस प्रभू के भगत जन मिल के (जैसे) सोहणी बारात बनते हैं।3। हे मेरे पिता ! (मैं तूझसे दहेज मांगती हूँ) मुझे हरि प्रभू के नाम का दान दे, मुझे यही दहेज दे।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माया का यह मोह (जिसमें आप फंसा पड़ा है) आपके साथ नहीं जा सकता, तूने इससे झूठा प्यार डाला हुआ है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।