सतिगुरि मिलिऐ सूहा वेसु गइआ हउमै विचहु मारि ॥
मनु तनु रता लालु होआ रसना रती गुण सारि ॥
सदा सोहागणि सबदु मनि भै भाइ करे सीगारु ॥
नानक करमी महलु पाइआ पिरु राखिआ उर धारि ॥1॥
मुंधे सूहा परहरहु लालु करहु सीगारु ॥
आवण जाणा वीसरै गुर सबदी वीचारु ॥
मुंध सुहावी सोहणी जिसु घरि सहजि भतारु ॥
नानक सा धन रावीऐ रावे रावणहारु ॥2॥
मोहु कूड़ु कुटंबु है मनमुखु मुगधु रता ॥
हउमै मेरा करि मुए किछु साथि न लिता ॥
सिर उपरि जमकालु न सुझई दूजै भरमिता ॥
फिरि वेला हथि न आवई जमकालि वसि किता ॥
जेहा धुरि लिखि पाइओनु से करम कमिता ॥5॥
सतीआ एहि न आखीअनि जो मड़िआ लगि जलंनि॑ ॥
नानक सतीआ जाणीअनि॑ जि बिरहे चोट मरंनि॑ ॥1॥
भी सो सतीआ जाणीअनि सील संतोखि रहंनि॑ ॥
सेवनि साई आपणा नित उठि संम॑ालंनि॑ ॥2॥
कंता नालि महेलीआ सेती अगि जलाहि ॥
जे जाणहि पिरु आपणा ता तनि दुख सहाहि ॥
नानक कंत न जाणनी से किउ अगि जलाहि ॥
भावै जीवउ कै मरउ दूरहु ही भजि जाहि ॥3॥
तुधु दुखु सुखु नालि उपाइआ लेखु करतै लिखिआ ॥
नावै जेवड होर दाति नाही तिसु रूपु न रिखिआ ॥
नामु अखुटु निधानु है गुरमुखि मनि वसिआ ॥
करि किरपा नामु देवसी फिरि लेखु न लिखिआ ॥
सेवक भाइ से जन मिले जिन हरि जपु जपिआ ॥6॥
जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥
चलण सार न जाणनी काज सवारणहार ॥1॥
राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥
नानक नालि न चलई फिरि पछुतावा होइ ॥2॥
बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥
सेती खुसी सवारीऐ नानक कारजु सारु ॥3॥
मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥
तरफ जिणै सत भाउ दे जन नानक सबदु वीचारे ॥4॥
करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥
आपे स्रिसटि उपाईअनु आपे फुनि गोई ॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 12 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इस भड़कीले रंग में (मोह डाल के) कभी किसी ने पति-प्रभू नहीं पाया।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।