Lulla Family

अंग 787

अंग
787
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सूहै वेसि पिरु किनै न पाइओ मनमुखि दझि मुई गावारि ॥
सतिगुरि मिलिऐ सूहा वेसु गइआ हउमै विचहु मारि ॥
मनु तनु रता लालु होआ रसना रती गुण सारि ॥
सदा सोहागणि सबदु मनि भै भाइ करे सीगारु ॥
नानक करमी महलु पाइआ पिरु राखिआ उर धारि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: इस भड़कीले रंग में (मोह डाल के) कभी किसी ने पति-प्रभू नहीं पाया।(ऐसी) मनमर्जी करने वाली मूर्ख स्त्री (इस मोह में ही) जल मरती है। अगर गुरू मिल जाए तो अंदर से अहंकार दूर करने से शोख़-रंग माया का मोह दूर हो जाता है। मन और शरीर (नाम रूपी मजीठ रंग से) सुर्ख लाल हो जाता है।जीभ प्रभू के गुण याद कर के रंगी जाती है। जिस जीव-स्त्री ने प्रभू के डर व प्यार से (अपने मन को) श्रृंगारा है जिस के मन में गुरू-शबद बसता है वह सदा के लिए सोहाग-भाग वाली हो जाती है। हे नानक ! प्रभू की मेहर से प्रभू को दिल में टिकाने से उसकी हजूरी प्राप्त होती है। 1।
मः 3 ॥
मुंधे सूहा परहरहु लालु करहु सीगारु ॥
आवण जाणा वीसरै गुर सबदी वीचारु ॥
मुंध सुहावी सोहणी जिसु घरि सहजि भतारु ॥
नानक सा धन रावीऐ रावे रावणहारु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे जीव स्त्री ! मन को मोहने वाले पदार्थों का प्यार छोड़ के परमात्मा का नाम-श्रृंगार बना।जो (मानो। मजीठ का पक्का) लाल रंग है; गुरू के शबद द्वारा (परमात्मा के नाम का) विचार कर।जनम-मरण का सिलसिला समाप्त हो जाएगा। हे नानक ! वह जीव-स्त्री सोहणी व सुंदर है जिसके हृदय-गृह में अडोल अवस्था बन जाने के कारण पति-प्रभू आ बसता है। उस जीव-स्त्री को चोजी प्रभू अपने साथ मिला लेता है। 2।
पउड़ी ॥
मोहु कूड़ु कुटंबु है मनमुखु मुगधु रता ॥
हउमै मेरा करि मुए किछु साथि न लिता ॥
सिर उपरि जमकालु न सुझई दूजै भरमिता ॥
फिरि वेला हथि न आवई जमकालि वसि किता ॥
जेहा धुरि लिखि पाइओनु से करम कमिता ॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (इस जगत में) मोह।झूठ व जंजाल प्रबल हैं।मूर्ख मनमर्जी करने वाले बिगड़े हुए मनुष्य इसमें गलतान हुए पड़े हैं; ‘मैं मेरी’ में (भाव।‘मैं बड़ा हॅूँ’।‘ये मेरा पदार्थ है’ ये कह,कह के) मनमुख लोग (यहाँ) दुखी होते हैं।(और मरने के वक्त यहाँ से) कुछ साथ नहीं ले के चलते। माया में भटकने के कारण (इनको) सिर पर खड़ी मौत भी नहीं दिखती। और जब मौत ने आ दबोचा तब ये गवाया हुआ समय दोबारा हाथ नहीं आता। (पर मनमुख भी क्या करें।) प्रभू ने (जीवों के पिछले किए कर्मों के अनुसार) जो लेख धुर से माथे पर लिख दिए।वे जीव वैसे ही कर्म कमाते हैं। 5।
सलोकु मः 3 ॥
सतीआ एहि न आखीअनि जो मड़िआ लगि जलंनि॑ ॥
नानक सतीआ जाणीअनि॑ जि बिरहे चोट मरंनि॑ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 वह सि्त्रयाँ सती (हो गई) नहीं कहलवा सकती जो (पति की) लाश के साथ जल के मरती थी। हे नानक ! जो (पति की मौत और) वियोग की चोट से ही मर जाएं उनको ही सती (हो गई) समझना चाहिए। 1।
मः 3 ॥
भी सो सतीआ जाणीअनि सील संतोखि रहंनि॑ ॥
सेवनि साई आपणा नित उठि संम॑ालंनि॑ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ उन सि्त्रयों को भी सती ही समझना चाहिए।जो पतिव्रता धर्म में रहती हैं। जो अपने पति की सेवा करती हैं और सदा उद्यम से अपना ये धर्म याद रखती हैं। 2।
मः 3 ॥
कंता नालि महेलीआ सेती अगि जलाहि ॥
जे जाणहि पिरु आपणा ता तनि दुख सहाहि ॥
नानक कंत न जाणनी से किउ अगि जलाहि ॥
भावै जीवउ कै मरउ दूरहु ही भजि जाहि ॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ (सती) सि्त्रयाँ अपने पति के जीते जी उसकी सेवा करती हैं। पति को ‘अपना’ समझती हैं तभी शरीर के दुख सहती हैं।पर। हे नानक ! जिन्होंने पति को पति ना समझा।वे क्यों दुख सहेंगी। पति चाहे सुखी हो चाहे दुखी हो वह (मुश्किल के वक्त) नजदीक नहीं फटकतीं। 3।
पउड़ी ॥
तुधु दुखु सुखु नालि उपाइआ लेखु करतै लिखिआ ॥
नावै जेवड होर दाति नाही तिसु रूपु न रिखिआ ॥
नामु अखुटु निधानु है गुरमुखि मनि वसिआ ॥
करि किरपा नामु देवसी फिरि लेखु न लिखिआ ॥
सेवक भाइ से जन मिले जिन हरि जपु जपिआ ॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे करतार ! (जगत में जीव पैदा करके) दुख और सुख भी तूने उनके साथ ही पैदा कर दिए।(दुख और सुख के) लेख भी (तूने उनके माथे पर) लिख दिए। जिस प्रभू का ना कोई खास रूप ना रेख है।उसके नाम के बराबर (जीवों के लिए) और कोई बख्शिश नहीं। ‘नाम’ एक ऐसा खजाना है जो कभी खत्म नहीं होता।गुरू के सन्मुख होने पर ये मन में बसता है। जिस मनुष्य पर मेहर करके प्रभू अपना ‘नाम’ देता है।उस (के अच्छे-बुरे कर्मों) का लेख दोबारा नहीं लिखता।पर। वही मनुष्य प्रभू को मिलते हैं जो सेवक भाव में रह के हरी-नाम का जाप करते हैं। 6।
सलोकु मः 2 ॥
जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥
चलण सार न जाणनी काज सवारणहार ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ वह मनुष्य दुनिया के बड़े पसारे नहीं पसारते (भाव।मन को जगत के धंधों में खिलार देते) जिन्होंने ये समझ लिया है कि यहाँ से चले जाना है; पर निरे दुनिया के काम सुलझाने वाले बंदे (यहाँ से आखिर) चले जाने का ख्याल भी नहीं करते। 1।
मः 2 ॥
राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥
नानक नालि न चलई फिरि पछुतावा होइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 2। हे नानक ! अगर सिर्फ रात के कारण धन इकट्ठा करें तो सवेरे (यहाँ से उठ के) चल पड़ना है (चलने के वक्त वह धन) साथ ना जा सके तो हाथ मलने पड़ने हैं। 2।
मः 2 ॥
बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥
सेती खुसी सवारीऐ नानक कारजु सारु ॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ जो मनुष्य कोई काम बेमना हो के (खुशी से ना) करे।तो उसका लाभ ना उसे खुद को ना किसी और को। हे नानक ! वही काम सफल हुआ समझो जो खुशी से (मन लगाकर) किया जाए। 3।
मः 2 ॥
मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥
तरफ जिणै सत भाउ दे जन नानक सबदु वीचारे ॥4॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ चाहे कितनी ही मेहनत मनुष्य करे।ईश्वर वाला पासा मन के हठ से नही जीता जा सकता। हे दास नानक ! वह मनुष्य (यह) पासा जीतता है जो शुभ भावना बरतता है और गुरू के शबद को विचारता है। 4।
पउड़ी ॥
करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥
आपे स्रिसटि उपाईअनु आपे फुनि गोई ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस करतार ने यह जगत बनाया है इसकी संभाल करनी वह खुद ही जानता है; उसने खुद ही सृष्टि पैदा की है। और खुद ही फिर नाश करता है।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 12 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इस भड़कीले रंग में (मोह डाल के) कभी किसी ने पति-प्रभू नहीं पाया।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।